संस्कृति
पश्चिम जोन में साप्ताहिक हनुमान चालीसा एवं सुंदरकाण्ड पाठ संपन्न
अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
रायपुर -
पीठ परिषद रायपुर (पश्चिम) जोन प्रमुख खड़ा नन्द मिश्र के संयोजकत्व में पंडित रविशंकर प्रसाद शास्त्री के आचार्यत्व में उनके ही एकता नगर गुढ़ियारी स्थित निज निवास में आज अतिशीघ्र हिन्दू राष्ट्र बनने एवं गौ हत्या पूर्णत: बंद होने की दृढ़ संकल्प से साप्ताहिकी हनुमान चालीसा - सुंदरकाण्ड पाठ एवं भजन संकीर्तन का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम के पश्चात सभी उपस्थित श्रद्धालुओं के लिये भोजन प्रसाद की भी व्यवस्था की गई थी। इस दिव्य कार्यक्रम में खड़ा नन्द मिश्र , रवि शंकर प्रसाद शास्त्री , घनश्याम द्विवेदी , अजय मिश्रा , प्रमोद अग्रवाल , आयुष मिश्रा , ऋषि पांडेय प्रवल एवं सभी पीठ परिषद , आदित्यवाहिनी - आनंदवाहिनी के सदस्य विशेष रूप से उपस्थित थे।
महाराजश्री के स्वास्थ्य लाभ हेतु दस दिवसीय अनुष्ठान जारी
ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्द्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वतीजी महाराज द्वारा संस्थापित संगठन पीठ परिषद , आदित्यवाहिनी - आनन्दवाहिनी छत्तीसगढ़ द्वारा महाराजश्री के स्वास्थ्य लाभ हेतु हनुमान चालीसा पाठ का व्यापक प्रकल्प चलाया जा रहा है। इसी क्रम में पीठ परिषद रायपुर (पश्चिम) जोन प्रमुख खड़ा नन्द मिश्र एवं गजानन्द अग्रवाल के सौजन्य से विगत 24 जुलाई से 02 अगस्त तक दसदिवसीय हनुमान चालीसा पाठ महाराजश्री के स्वास्थ्य लाभ हेतु शिवरीनारायण से पंद्रह किलोमीटर दूर ग्राम देवरघटा में प्रसिद्ध हनुमान मंदिर में आचार्यों द्वारा किया जा रहा है।
ग्राम बुंदेला में सावनाहिक रामायण चल रही है जिसमें लक्ष्मण राजपूत लोक गायक कथा प्रवचन सुनाए..
बेमेतरा -
ग्राम बुंदेला में सावनाहिक रामायण चल रही है जिसमें लक्ष्मण राजपूत लोक गायक कथा प्रवचन सुनाए. लक्ष्मण राजपूत जी ने बताया कि हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी भगवान श्रीरामचन्द्र जी की कृपा से रामायण की आयोजन हो रहा है सावन की पावन पर्व पर भगवान श्रीरामचन्द्र की पावन कथा मानस गंगा अमृत रूपी कथा की प्रवाह हो रही है
भक्तगण भक्ति में लीन होकर पावन पतित भगवान श्रीरामचन्द्र जी की कथा सुन रहे हैं अंश राजपूत लक्की राजपूत मुन्ना यादव अनुज राजपूत कुंजराम साहु लतेलू यादव प्रेम साहु धनसिंग राजपूत राजा वर्मा बुंदेली वाले आस पास के भक्तगण समस्त ग्रामवासी
स्वामी श्री करपात्रीजी के संदेशों को वर्तमान में आत्मसात करने की आवश्यकता करपात्री जयंती पर विशेष
अरविन्द तिवारी मीडिया प्रभारी पुरी शंकराचार्य आश्रम
जगन्नाथपुरी -
ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्द्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वतीजी महाराज के गुरू सर्वभूतहृदय यतिचक्रचूड़ामणि रामराज्य के प्रणेता धर्मसम्राट स्वामी करपात्रीजी महाराज का आज श्रावण शुक्ल द्वितीया 26 जुलाई शनिवार को 118 वाँ प्राकट्य दिवस है। आज का दिन धर्मसंघ पीठ परिषद , आदित्यवाहिनी – आनंदवाहिनी संगठन के लिये करपात्री जी महाराज को समर्पित है। आज के परिवेश में पूज्य करपात्री जी महाराज के संदेश हमें मार्ग प्रदान करते हैं। सनातन मानबिन्दुओं की रक्षा , गोरक्षा , राजनीति में शुचिता हेतु राम राज्य परिषद की स्थापना जैसे कार्यों के लिये उनका ब्यक्तित्व एवं दर्शन आत्मसात करने योग्य अनुकरणीय है। स्वामी करपात्रीजी भारत के एक सन्त , स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं राजनेता थे। दशनामी परम्परा के सन्यासी स्वामीजी का मूल नाम हरिनारायण ओझा था। दीक्षा के उपरान्त उनका नाम ‘हरिहरानन्द सरस्वती’ पड़ा किन्तु वे ‘करपात्री’ नाम से ही प्रसिद्ध थे। (कर = हाथ , पात्र = बर्तन, करपात्री = हाथ ही बर्तन हैं जिसके)। आप के कर कमलों में जितना भोजन आता आप उतना ही भोजन प्रसाद समझकर प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण कर लेते इसलिये आप करपात्री के नाम से विख्यात हुये। धर्मनियंत्रित , पक्षपातविहिन , शोषण विनिर्मुक्त शासनतंत्र की स्थापना के लिये आपने वर्ष 1948 में अखिल भारतीय रामराज्य परिषद नामक राजनैतिक दल का भी गठन किया था। धर्मशास्त्रों में इनकी अद्वितीय एवं अतुलनीय विद्वता को देखते हुये इन्हें ‘धर्मसम्राट’ की उपाधि प्रदान की गयी थी। आज जो रामराज्य सम्बन्धी विचार गांधी दर्शन तक में दिखाई देते हैं -
धर्म संघ , रामराज्य परिषद् , राममंदिर आन्दोलन , धर्म सापेक्ष राज्य आदि सभी के मूल में स्वामीजी ही हैं। स्वामी करपात्री का जन्म सम्वत् 1964 विक्रमी (सन् 1907 ईस्वी) में श्रावण मास शुक्ल पक्ष द्वितीया को उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के भटनी ग्राम में सनातनधर्मी सरयूपारीण ब्राह्मण रामनिधि ओझा एवं श्रीमती शिवरानी जी के आँगन में हुआ। बचपन में उनका नाम ‘हरिनारायण’ रखा गया। स्वामी जी तीन भाई थे –ज्येष्ठ भ्राता हरिहरप्रसाद , मँझले हरिशंकर और छोटे हरिनारायण आप स्वयं थे। मात्र 09 वर्ष की अल्पायु में प्रतापगढ़ के खंडवा गाँव के पं० रामसुचित की सुपुत्री महादेवी जी के साथ आपका विवाह संपन्न करा दिया गया किन्तु सोलह वर्ष की आयु में एक पुत्री के जन्म लेने के बाद आपने पूरे परिवार को रोता बिलखता छोड़ माता पिता को प्रणाम करके हमेशा के लिये गृहत्याग कर दिया। उसी वर्ष ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती से कांशी के दुर्गाकुण्ड में नैष्ठिक ब्रह्मचारी की दीक्षा लेकर दण्ड ग्रहण कर हरि नारायण से ‘ हरिहर चैतन्य ‘ बने। वे स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती के शिष्य थे। इन्होंने नैष्ठिक ब्रह्मचर्य श्री जीवन दत्त महाराज जी से , संस्कृत अध्ययन षड्दर्शनाचार्य पंडित स्वामी श्री विश्वेश्वराश्रम जी महाराज से , व्याकरण शास्त्र, दर्शन शास्त्र, भागवत, न्यायशास्त्र, वेदांत अध्ययन, श्री अचुत्मुनी जी महाराज से अध्ययन ग्रहण किया। श्री विद्या में दीक्षित होने पर धर्मसम्राट का नाम षोडशानन्द नाम भी पड़ा। सत्रह वर्ष की आयु से हिमालय गमन प्रारंभ कर अखण्ड साधना की और श्रीविद्या में दीक्षित होने पर धर्मसम्राट का नाम षोडशानन्द नाथ पड़ा।
केवल 24 वर्ष की आयु में परम तपस्वी 1008 श्री स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वतीजी महाराज से विधिवत दण्ड ग्रहण कर “अभिनवशंकर” के रूप में प्राकट्य हुआ। एक सुन्दर आश्रम की संरचना कर पूर्ण रूप से सन्यासी बन कर “परमहंस परिब्राजकाचार्य 1008 श्री स्वामी हरिहरानंद सरस्वती श्री करपात्री जी महाराज” कहलाये। करपात्रीजी का अधिकांश जीवन वाराणसी में ही बीता , वे अद्वैत दर्शन के अनुयायी एवं शिक्षक भी थे। उन्होने सम्पूर्ण भारत में पैदल यात्रायें करते हुये धर्म प्रचार के लिये सन 1940 ई० में “अखिल भारतीय धर्म संघ” की स्थापना की। धर्मसंघ का दायरा संकुचित नहीं , अत्यन्त विशाल है जो आज भी प्राणी मात्र में सुख-शांति के लिये प्रयत्नशील है। संघ की दृष्टि में समस्त जगत और उसके प्राणी सर्वेश्वर भगवान के अंश हैं या उसके ही रूप हैं। संघ का मानना है कि यदि मनुष्य स्वयं शान्त और सुखी रहना चाहता है तो औरों को भी शान्त और सुखी बनाने का प्रयत्न आवश्यक है। इसलिये धर्मसंघ के हर कार्य के आरम्भ और अन्त में “धर्म की जय हो , अधर्म का नाश हो , प्राणियों में सद्भावना हो , विश्व का कल्याण हो” ऐसे पवित्र जयकारे किये जाते हैं। इसमें अधार्मिकों के नाश के बजाय अधर्म के नाश की कामना की गयी है।
गोरक्षा आन्दोलन –
इंदिरा गांधी के लिये उस समय चुनाव जीतना बहुत मुश्किल था | क्योंकि सबको पता था की करपात्री महाराज के पास वाक सिद्धि (किसी की भविष्यवाणी को सच करने की शक्ति) थी। इसलिये इंदिरा गाँधी ने उनकी शरण ली और उनके सामने प्रधानमंत्री बनने मंशा रखी , करपात्री जी महाराज के आशीर्वाद से इंदिरा गांधी चुनाव जीती। इंदिरा ग़ांधी ने उनसे वादा किया था चुनाव जीतने के बाद गाय के सारे कत्ल खाने बंद हो जायेगें जो अंग्रेजों के समय से चल रहे हैं। लेकिन इंदिरा गांधी मुसलमानों और कम्यूनिस्टों के दबाव में आकर अपने वादे से मुकर गयी थी। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री ने संतों इस मांग को ठुकरा दिया जिसमें संविधान में संशोधन करके देश में गौ वंश की हत्या पर पाबन्दी लगाने की मांग की गयी थी तो संतों ने 07 नवम्बर 1966 को संसद भवन के सामने धरना शुरू कर दिया। हिन्दू पंचांग के अनुसार उस दिन विक्रमी संवत 2012 कार्तिक शुक्ल की अष्टमी थी जिसे ‘गोपाष्टमी’ भी कहा जाता है। इस धरने में भारत साधु-समाज, सनातन धर्म, जैन धर्म आदि सभी भारतीय धार्मिक समुदायों ने इसमें बढ़-चढ़कर भाग लिया।
इस आन्दोलन में चारों शंकराचार्य तथा स्वामी करपात्री जी भी जुटे थे। पुरी के जगद्गुरु शंकराचार्य श्री स्वामी निरंजनदेव तीर्थ तथा महात्मा रामचन्द्र वीर के आमरण अनशन ने आन्दोलन में प्राण फूंक दिये थे। लेकिन इंदिरा गांधी ने उन निहत्थे और शांत संतों पर पुलिस के द्वारा गोली चलवा दी जिससे कई संत , महात्मा और गोभक्त काल कलवित हो गये । इस हत्याकांड से क्षुब्ध होकर तत्कालीन गृहमंत्री ‘गुलजारी लाल नंदा’ ने अपना त्याग पत्र दे दिया और इस कांड के लिये खुद सरकार को जिम्मेदार बताया था। लेकिन संत ‘राम चन्द्र वीर’ अनशन पर डटे रहे जो 166 दिनों के बाद उनकी मौत के बाद ही समाप्त हुआ था। राम चन्द्र वीर के इस अद्वितीय और इतने लम्बे अनशन ने दुनियाँ के सभी रिकार्ड तोड़ दिये है । यह दुनियाँ की पहली ऎसी घटना थी जिसमे एक हिन्दू संत ने गौ माता की रक्षा के लिये 166 दिनों तक भूखे रह कर अपना बलिदान दिया था। गौ रक्षा आंदोलन में गोली चालन से व्यथित करपात्री जी महाराज ने इंदिरा गाँधी को श्राप दिया कि जिस प्रकार आपने इन संतों की हत्या की है उसी प्रकार से आपकी और आपके वंशों की भी हत्या होगी जिसका परिणाम आप सभी जानते ही हैं।
ब्रह्मलीन -
करपात्री जी महाराज माघ शुक्ल चतुर्दशी सम्वत 2038 (07 फरवरी 1982) को केदारघाट वाराणसी में स्वेच्छा से महाप्राण में विलीन हो गये। उनके निर्देशानुसार उनके नश्वर पार्थिव शरीर का केदारघाट स्थित श्री गंगा महारानी को पावन गोद में जल समाधि दी गई। आपने अपने साहित्य सृजन के माध्यम से समाज में जो चेतना जागृत की है वह हमेशा अविस्मरणीय रहेगी। आपने वेदार्थ पारिजात , रामायण मीमांसा , विचार पीयूष , पूँजीवाद , समाजवाद , मार्क्सवाद जैसे अनेकों ग्रँथ लिखे। आपके ग्रन्थों में भारतीय परम्परा का बड़ा ही अद्भुत व प्रामाणिक अनुभव प्राप्त होता है। आपने सदैव ही विशुद्ध भारतीय दर्शन को बड़ी दृढ़ता से प्रस्तुत किया है। आपके लिखित ग्रंथों से यह प्रेरणा मिलती है कि लोकतंत्र मे राष्ट्र को समृद्धशाली बनाने में अध्यात्मवाद आवश्यकता है। आपने हिन्दू धर्म की बहुत सेवा की। आपका नाम विश्व के इतिहास में युगपुरुष के रूप में सदैव अमर रहेगा। स्वामीजी का प्राकट्य दिवस मनाना तभी सफल हो सकता है जब हम उनके बताये मार्गों पर चलने की प्रेरणा लें और भव्य राष्ट्र की संरचना में अपनी सहभागिता निश्चित करें।
5-13 साल के बच्चे फर्राटे से बोलते हैं गीता के श्लोक भगवद गीता की शिक्षा दे रहा ‘गीता परिवार
रायपुर
,राजधानी की रहने वाली कक्षा तीसरी में पढऩे वाली 7 साल की श्रीनिधि को भगवद् गीता के कई श्लोक कंठस्थ याद हैं। वो फर्राटे से श्लोक बिना देखे ही बोल देती है। श्रीनिधि ‘लर्न गीता’ केंद्र से जुड़ी है जहां बच्चों को गीता का पाठ पढ़ाया जाता है। रायपुर के मोवा में गीता परिवार ‘लर्न गीता’ कार्यक्रम के माध्यम से बच्चों को भगवद् गीता की शिक्षा दे रहा है। बाद में 5 अलग-अलग विषयों में उनकी परीक्षा भी ली जाती है। यहां पढऩे वाले बच्चे एक साल में गीता के 12वें, 15वें और 16वें अध्याय के 85 से ज्यादा श्लोक याद कर चुके हैं और पूरे 18 अध्याय के 700 श्लोक याद करने में लगे हैं। ऐसा नहीं है कि वे सिर्फ श्लोक याद कर रहे हैं, इसे अपने जीवन में उतार रहे हैं। बच्चे इसकी नियमित शिक्षा लेने पहुंच रहे हैं।
मोवा में बच्चों को गीता की शिक्षा दे रहीं 65 साल की संगीता पांडेय बताती हैं कि एक साल पहले 1 बच्चे से इसकी शुरुआत हुई थी। आज 5 से 13 साल तक के 22 बच्चे हैं। रायपुर के अशोका हाइट्स सोसाइटी, रोहणीपुरम में रोजाना और गुढिय़ारी स्कूल, डागा कॉलेज के अनाथालय में हफ्ते में एक दिन गीता का पाठ पढ़ाया जा रहा है।
गीता परिवार छत्तीसगढ़ ‘लर्न गीता’ कार्यक्रम के माध्यम से बाल संस्कार केंद्र के तहत बच्चों को भगवद् गीता की शिक्षा दे रही है। संगीता पांडेय बताती हैं कि करीब पांच साल पहले कोरोना के दौरान इसकी शुरुआत प्रदेश में हुई थी। बच्चों को अध्यात्म से जोडऩे का प्रयास किया जा रहा है। इससे लगातार बच्चे जुड़ते जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि 40 मिनट की कक्षा होती है। यहां आने वालों में डॉक्टर, इंजीनियर, बिजनेसमैन के बच्चे भी शामिल हैं। इसके अलावा बच्चों को बुधवार को योगा-ध्यान और शुक्रवार को कहानी सुनाई जाती है। इसमें अध्यात्म और महापुरुषों से जुड़ी कहानियां होती हैं।
भगवद गीता का ज्ञान ले रहे बच्चों को गीता गुंजन, गीता जिज्ञासु, गीता पाठक, गीता पथिक और गीता व्रती की परीक्षाएं देनी पड़ती है। गीता पथिक में पूरा श्लोक याद कर शंकराचार्य के सामने परीक्षा देनी होती है। अशोका हाइट्स सोसाइटी में चल रही कक्षा के 7 बच्चों ने हाल ही में गीता जिज्ञासु की परीक्षा दी है। पांडेय कहती हैं कि स्कूलों में भी बच्चों को गीता का पाठ नियमित पढ़ाना चाहिए। इसके लिए सरकार को पहल करने की जरूरत है। गीता परिवार छत्तीसगढ़, स्वामी गोविंद देव गिरिजी महाराज द्वारा स्थापित एक संस्था है। इसका उद्देश्य बच्चों के विकास और संस्कार के लिए काम करना है। यह संगठन श्रीमद्भागवत गीता और नैतिक मूल्यों के माध्यम से लोगों को शिक्षित करता है।
छत्तीसगढ़ में गीता परिवार सक्रिय भूमिका निभा रहा है। बता दें कि गीता परिवार की स्थापना 1986 में महाराष्ट्र के संगमनेर में हुई थी। ऑनलाइन के माध्यम से 180 देशों में 12 लाख से अधिक लोग श्रीमद भगवत गीता का शुद्ध संस्कृत उच्चारण सहित निशुल्क ज्ञान ले रहे हैं।
गीता परिवार छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष गीत गोविंद साहू ने बताया कि ‘लर्न गीता’ की ऑनलाइन शुरुआत पांच साल पहले हुई थी। छत्तीसगढ़ के रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़, जगदलपुर, दुर्ग और भिलाई में ऑनलाइन और ऑफलाइन कक्षाएं लग रही हैं। इससे प्रदेशभर में 10 हजार से अधिक साधक जुड़े हैं। सेंट्रल जेल में कैदी ऑनलाइन गीता का श्लोक याद कर रहे हैं। यहां के करीब पांच कैदियों को गीता कंठस्थ याद है।
अंततः अध्यात्म ही सबकी मंजिल है...! (स्वामी सुरेन्द्र नाथ)
अध्यात्म को मंजिल मानने का अर्थ है आत्म-ज्ञान, शांति और सच्चे आनंद की प्राप्ति को जीवन का लक्ष्य बनाना,भौतिक उपलब्धियाँ क्षणिक संतोष दे सकती हैं, लेकिन आत्मिक संतुलन और आंतरिक शांति ही स्थायी सुख का स्रोत होती हैं, अध्यात्म केवल धर्म या पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्वयं को समझने,अपनी सीमाओं को पार करने और उच्चतर चेतना से जुड़ने की प्रक्रिया है
जीवन दो स्तरों पर जिया जाता है, एक सांसारिक जीवन, दुसरा आध्यात्मिक जीवन। जन्म से प्रारंभ होकर मृत्यु पर समाप्त होने वाला जीवन अनवरत है, जो हमें मृत्यु के साथ समाप्त होता दिखता है, किन्तु मृत्यु अंत नहीं, मृत्यु भी आरम्भ है। ये जीवन चक्र कभी समाप्त नहीं होता, संसार को जो अंत होता दिखता है, अध्यात्म में डुबने पर समझ आता है, कि अंत ही प्रारंभ का बीजारोपण है। यहां कुछ भी समाप्त नहीं होता, केवल रूप परिवर्तित होता है। विज्ञान भी मानता है कि ब्रह्मांड ऊर्जा से बना है, जो कभी समाप्त नहीं होता, ऊर्जा का रूप परिवर्तन होता है।
अक्सर लोगों को लगता है, कि अध्यात्म में जाने के लिए सन्यास लेना अनिवार्य है। सन्यास एक व्यक्ति का निजी निर्णय होता है, आध्यात्मिक स्तर को पाने के लिए सन्यासी होना मापदंड नहीं है। अध्यात्म हमें अहंकार, मोह और भटकाव से मुक्त कर सही दिशा में चलना सिखाता है। जैसे-जैसे आध्यात्मिक परिपक्वता आती है, व्यक्ति मूर्ति पूजा, विधि विधान और पाखंड से दूर होते जाता है और ध्यान में लीन होते जाता है, अध्यात्म ही वो स्थान है, जहाँ आपके सभी प्रश्नों के उत्तर मिल जाते हैं, वस्तुतः अध्यात्म ही आपकी मंजिल है।
हमारी सनातन संस्कृति में गृहस्थ जीवन में रहते हुए परमात्मा प्राप्ति का मार्ग बताया गया है, किन्तु हम में से, कितने लोग हैं जो वेदों का अध्ययन करते हैं, कितनों ने रामायण का अध्ययन किया है, कौन गीता का पाठ करता है, और गीता का सार समझता है..? ये यक्ष प्रश्न की तरह है, हम अति भाग्यशाली हैं कि हमें दुनिया का सर्वश्रेष्ठ ज्ञान उपलब्ध तो है, लेकिन विडंबना है, कि हम इस ज्ञान को अपने जीवन में नहीं उतारते, और आज हमारे भटकाव का मुख्य कारण यही है। जीवन के हर पहलू को समझना हो, तो अध्यात्म की शरण लेनी चाहिए।
हममें से ज्यातर लोग केवल पूजा-पाठ या मंदिर जाने को अध्यात्म समझ लेते हैं, किन्तु ऐसा नहीं है। ये एक दिनचर्या हो सकती है, अच्छी आदत है, किंतु अध्यात्म आपकी समझ को परिपक्व करता है। संसार में रहकर संसार से विरक्त रहने की कला सिखाता है, अध्यात्म प्रेम और समर्पण सिखाता है, आपको सामान्य से विशेष की ओर लेकर जाता है, शांति और आनन्द की अनुभूति कराता है।
अध्यात्म को मंजिल मानने का अर्थ है आत्म-ज्ञान, शांति और सच्चे आनंद की प्राप्ति को जीवन का लक्ष्य बनाना। भौतिक उपलब्धियाँ क्षणिक संतोष दे सकती हैं, लेकिन आत्मिक संतुलन और आंतरिक शांति ही स्थायी सुख का स्रोत होती हैं।
अध्यात्म केवल धर्म या पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्वयं को समझने, अपनी सीमाओं को पार करने और उच्चतर चेतना से जुड़ने की प्रक्रिया है। यह हमें अहंकार, मोह और भटकाव से मुक्त कर सही दिशा में चलना सिखाता है। जब हम बाहरी दुनिया की अस्थिरता से ऊपर उठकर, अपने भीतर स्थिरता पाते हैं, तभी सच्चे अर्थों में मंजिल पर पहुँचते हैं, अगर अध्यात्म को जीवन की मंजिल बनाते हैं, तो हर अनुभव हमें सीखने और आगे बढ़ने का अवसर देता है। तब जीवन केवल संघर्ष नहीं रहता, बल्कि आत्म-विकास और शांति का एक सतत प्रवाह बन जाता है। इसका मुख्य संदेश यह है कि अच्छे और पुण्य कर्म करने से व्यक्ति की प्रतिष्ठा और यश बढ़ता है, और उसका जीवन सार्थक और सफल बनता है। यह जीवन को सही दिशा में जीने और समाज में अच्छा योगदान देने की प्रेरणा देता है, और व्यक्ति को आत्मशांति, परमानन्द की अनुभूति कराता है।
जगन्नाथ रथयात्रा अद्भूत अलौकिक अकल्पनीय श्रद्धा उत्साह और भक्ति से सराबोर हुई चांपा की गलियां
चाम्पा,
जगन्नाथ रथयात्रा इस समय चाम्पा नगरी में इतिहास में पहली बार बहुत ही धूमधाम से मनाया गया है,धन्य है हमारी वृंदावन भक्ति कुटीर जांजगीर और धन्य है हमारी रुकमणी-कन्हैया धाम चांपा और धन्य है वह तमाम सहयोगी जिन्होने हमारी इस असाधारण निर्णय को चरितार्थ कर दिखाया ! और चाम्पा में इस जगन्नाथ रथयात्रा के माध्यम से भक्ति की एक नई उमंग पैदा कर दी। जहां-जहां से यह रथयात्रा निकली वहां-वहां से भक्तगण अपनी तमाम गृहस्थ उलझनों को एक तरफ दरकिनार करते हुए हरे कृष्णा हरे रामा की धुन में डूबकर भावविभोर होकर झुमने को मजबूर हो गये।
अंर्तराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ जिसे इस्कॉन के नाम से भी लोग जानते है इसी का एक सेंटर का नाम है वृंदावन भक्ति कुटीर, जांजगीर। एक छोटे से जगह से अपना सेंटर चलाते हुए इनके अनुयायी एक विशाल जनसमूह के हृदयों में अपनी छाप छोडती आगे बढ़ रही है, अब वृंदावन भक्ति कुटीर के भक्त जांजगीर से बाहर निकलकर चांपा के रुकमणी-कन्हैया धाम में बच्चों के लिए अपनी वेल्यू एजुकेशन का कोर्स के साथ-साथ इंग्लिस स्पीकिंग का भी कोर्स कराती हैं। यहां भी 40-50 बच्चों की एक टीम बन चुकी हैं, जिनके सहयोग से इस वर्ष जगन्नाथ रथयात्रा निकालने के लिए मंथन किया। लेकिन यह काम इतना आसान भी नहीं था और योजना बनाते-बनाते रथयात्रा का समय भी नजदीक आ गया था ,चूंकि जांजगीर में यह रथयात्रा प्रतिवर्ष निकलती है जो बड़े ही भव्य व विशाल जनसमूह का नेतृत्व भी करती है इसलिए भक्तों का सारा समय जांजगीर में ही व्यतित हो गया। अपने निर्धारित समय में जांजगीर की रथयात्रा भी बहुत ही जबरदस्त रही। जांजगीर के बाद सभी भक्त बिलासपुर के रथयात्रा में शामिल होने के लिए व्यस्त हो गये। अब और बेचैनी होने लगी कि चांपा के लिए साल भर से सिर्फ योजना ही बना रहे हैं लेकिन धरातल पर कुछ भी नजर नही आ रहा है। थोड़े हताश भी हुए कि शायद ही अब चांपा में रथयात्रा का आयोजन कर पाएंगे। तभी दशमी तिथि के आखिरी तीन दिन पहले जगन्नाथ प्रभु की ऐसी कृपा हुई और यह तय हुआ कि दशमी तिथि को ही चांपा में पहली बार इस्कान के भक्तों द्वारा एक भव्य रथयात्रा निकलेगी माने निकलेगी! परन्तु दो दिन का समय और तैयारी कुछ भी नही और ऊपर से वर्षा भी लगातार तीन दिन से अनवरत बरस रही थी, तो थोड़ा चिंता होना भी स्वाभाविक है लेकिन यह तो तय था कि अब चाहे पानी गिरे या फिर ओले पड़े हमारी रथयात्रा निकलेगी माने निकलेगी। यहां प्रभु की फिर एक बार कृपा हुई कि पूरी रथयात्रा के दौरान अचानक आसमान एकाएक साफ होकर मौसम एकदम से खिल गयी। और रथयात्रा के समापन के पश्चात पुनः वर्षा अपनी असली रुप में आकर झमाझम बरसने लगी।
अब बारी है इस यात्रा के दौरान अनुभव की। सोचकर चले थे कि यह पहला प्रयास है अगली बार से हम बड़े ही धूमधाम व पूर्ण तैयारी के साथ निकालेंगे, परन्तु जैसे ही रथ यात्रा प्रारंभ हुई तो ऐसा लगा जैसे हम ही नही पूरे चांपा के लोगों को भी हमारी इस रथयात्रा का इंतजार रहा हो. एकाएक भक्तों की संख्या बढ़ने लगी, सभी भक्त भगवान जगन्नाथ के रथ की रस्सी को खीचने के लिए उतावले होकर प्रत्येक गली के हर घर से लोग निकलने लगे, कोई भगवान जगन्नाथ के रथ के आगे झाडू लगाने को उत्साहित थे तो कोई जयकारा लगाने के लिए उत्साहित थे,
यह सब देखकर मन अति उत्साह से भर गया। और ऐसा लगा जैसे मेहनत रंग लायी। इस दौरान भगवान के प्रति बच्चों की मस्ती भी देखने लायक रही, कोई झूम रहा है तो कोई नाच रहा है ऐसा दृश्य देखकर मन तो मानों जैसे आनंद से भर गया हो।
चांपा में रथयात्रा के दौरान वह जो आनंद के क्षण थे उसे शायद किसी शब्दों में न बांध पांऐ। उस क्षण का आनंद तो वही बता सकता है जो वहां मौजूद रहा हो। माताएं बहनों का वह भगवान के प्रति सर्मपण व नृत्य को देखकर तो पूरा नगर झूम उठा और हमको बार-बार लोग पूछने लगे कि ये लोग कौन है कहां से आएं है हमने तो ऐसा चांपा में इन्हें पहले कभी नही देखा शायद ये लोग वृंदावन से आए होंगे इत्यादि तमाम तरह की चर्चाएं पूरी रथयात्रा के दौरान होती रही और नगरवासी भी अपने को रोक नही सके और भगवान जगन्नाथ रथयात्रा के सहभागी बनते गये। जैसे -जैसे हमारी यात्रा आगे बढ़ती गयी मानो हमारा उमंग भी बढ़ती गयी, फिर क्या था हमारे वृंदावन भक्ति कुटीर के भक्तों की कीर्तन मंडली के टीम की गायन, वादन व नृत्य की अपनी एक अलग ही छटा देखने को मिली। इस दौरान अत्यधिक भीड होने के कारण रोड जाम तक की नौबत आने लगी तब पुलिस प्रशासन का भी सहयोग जबरदस्त रहा जो हमारी यात्रा को भी आगे बढ़ाते रही और लोगों को भी कोई परेशानी न हो इसकी भी बराबर ध्यान रखती रही।
भगवान जगन्नाथ, भैया बलभद्र व माता सुभद्रा जी के स्वागत के लिए हर घर से आरती के दीप जलाकर व नारियल, फल, मिठाई इत्यादि पकवान भगवान को भेट स्वरुप समर्पण करते भक्तजन अपने-अपने घर के द्वार में इंतजार करते भी देखे गये, तो वही अनेक भक्तजन झुमते नाचते गाते भगवान के अनुयायियों का थकान दूर करने के लिए जगह-जगह पानी, शरबत व जूस का स्टाल लगाकर उन्हें अपने हाथों से पिलाते नजर भी आए, जो हमारी आनंद व उमंग को और भी बढ़ाने का कार्य कर रही थी।
अब यात्रा अपने अंतिम पड़ाव की ओर पहुँचने वाली थी। तब भक्तों का उत्साह और भी चरम को छुने लगी, रुकमणी-कन्हैया धाम के सामने वे रोड पर ही बैठ गये व झूम-झूम कर नाचने लगे, तत्पश्चात भगवान की आरती उतारी गई फिर भगवान जगन्नाथ, भैया बलभद्र व माता सुभद्रा जी को रुकमणी-कन्हैया धाम में कुछ समय के लिए आराम स्वरुप आसन पर बैठाया गया। उसके बाद तमाम भक्तजनों के लिए महाप्रसाद की व्यवस्था की गयी थी। सो वे सभी महाप्रसाद पाते गये।
कार्यकम की अत्यधिक सफलता को देखते हुए अनेक संगठनों ने इस प्रयास को सराहा भी और अगली रथयात्रा में अपनी सहभगिता देने का भी प्रतिबद्धता जताई। जो आने वाले समय में उत्साह को और भी दुगना करेगी। इस कार्यक्रम को सफल बनाने में सबसे बड़ा योगदान आर. के .ज्वेलर्स के रविन्द्र सोनी भारत एवं उनके परिवार एवं अनुयायियों का रहा है, जिसके सभी जगह तारीफ हो रही है ।
भक्तों को दर्शन देने के लिए द्वार-द्वार पहुंचे जग के नाथ जगन्नाथ स्वामी ! भगवान श्रीजगन्नाथ रथयात्रा श्रद्धा ,भक्ति और आस्था पूर्वक निकाली गई
जांजगीर-चांपा । हिंदु पंचाग के अनुसार संपूर्ण देश-भर में आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया ( इस बार दिनांक 27 जून 2025 से 5 जुलाई ) के दिन विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथयात्रा आरंभ हो रही हैं । 9 दिनों तक चलने वाली यह पारंपरिक रथयात्रा भारतवर्ष के विभिन्न शहरों की तरह कोसां,कांसा एवं कंचन की नगरी चांपा में आस्था, श्रद्धा और भक्ति पूर्वक निकाली गई ।
यह वह महान पर्व हैं , जहां भगवान जगन्नाथ स्वामी दर्शन देने के लिए असंख्य श्रद्धालु भक्तों के द्वार-द्वार तक पहुंचते हैं और रथ पर सवार होकर नर-नारी, बच्चें और बड़े-बुजुर्ग भगवान के रथ को खींचकर स्वयं के जीवन को धन्य मानते हैं । ढोल , गाजे-बाजे और शंखनाद करते हुए भक्त गण इन रथों को ढकेलते हुए आगे बढ़ाते जाते हैं। कहा जाता है कि जिन व्यक्तियों को रथ को धक्का देने का सौभाग्य मिलता हैं वह भवसागर के पार पहुंच जाता हैं । आठ दिनों तक भगवान जगन्नाथ स्वामी भाई-बहन के साथ अपने मौसी के अस्थायी घर पर पहुंच आराम करते हैं , उड़िया भाषा में आड़प दर्शन कहा जाता हैं। आषाढ़ मास के दशमी तिथि को यह रथ पुनः अपने स्थायी मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं । गौरतलब हैं कि रथयात्रा का यह पर्व हर साल आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को ही मनाया जाता हैं, शुक्रवार को सायंकाल 5 बजें एक रथ सोनार पारा और ब्राह्मण पारा स्थित जगन्नाथ बड़े मठ मंदिर से तो दुसरी रथ पाड़ी घाट स्थित जगन्नाथ मंदिर से निकली गई । यह यात्रा लोहार पारा, कदंब चौक, समलेश्वरी देवस्थान, देवांगन पारा होते हुए नवनिर्मित एक रथ जयश्री ज्वेलर्स तो दूसरी रथ नारायण प्रसाद सोनी के सदर बाजार चांपा में रुकेंगे ।
मालपुआ की खूब बिक्री देर-रात तक होती रही ।
भगवान श्री जगन्नाथ की रथयात्रा हर्षोल्लास पूर्वक निकाली गई । दोनों देवस्थान से सुसज्जित रथ पर भगवान जगन्नाथ स्वामी के तीनों विग्रहों को सजा-धजा धर बैठाया गया और विश्राम स्थल रात तक पहुंचा । रथयात्रा के दिन चांपा नगर के विभिन्न चौक-चौराहे पर मालपुआ की खूब बिक्री रही । श्रद्धालु भक्त भगवान जगन्नाथ स्वामी का दर्शन-पूजन करने के बाद मालपुआ, गजामुग ,नारियल फल-फूल को अपने घर ले जाकर मिल-बांटकर खाते हैं । मालपुआ से लोग भगवान जगन्नाथ स्वामी जी को भोग लगाते हैं और बांटते भी हैं । श्रीमति सत्यप्रभा स्वर्णकार, नेहा -अविनाश अग्रवाल, श्रीमति ममता पाण्डेय, आंकाक्षा तिवारी, विमलेश तिवारी और सुश्री नैंसी पाण्डेय को पूर्व पार्षद श्रीमति शशिप्रभा सोनी ने मालपुआ महाप्रसाद के रुप में भिजवाईं ।
पुरी की तर्ज पर छोटे शहरों में परंपरा का निर्वाहन किया जा रहा हैं ।
साहित्यकार शशिभूषण सोनी ने बताया कि जगन्नाथ पुरी में रथयात्रा की शुरुआत 12 वीं सदी में हुई थी । यह मंदिर भारतवर्ष के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक हैं । इस मंदिर की सबसे बड़ी प्रधानता समता की भावना हैं । मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए आये हुए भक्तों में यहां जाति-पाति का कोई महत्व नहीं हैं, ब्राम्हण के साथ शुद्र भी यहां पर पंक्ति में बैठकर मैंने भोजन करते हुए देखा हैं । इसीलिए कहावत कही जाती हैं कि - जगन्नाथ के भात को जगत पसारत हाथ !
भगवान जगन्नाथ स्वामी का समदर्शी स्वरुप आज़ भी जगन्नाथ मंदिर में दिखाई पड़ता हैं -।
इस रथयात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह हैं कि सबसे प्रथम बार जगन्नाथ पुरी के राजा जिन्हें गजपति की उपाधि से भी जाना जाता हैं वह इस दौरान साधारण वस्त्रों में पहुंचते हैं और सोने की मूठ वाली झाड़ूं से रथ और रथ मार्ग बुहारते हैं , यह परंपरा अब छोटे-बड़े शहरों में भी किया जाने लगा हैं । भगवान जगन्नाथ स्वामी का समदर्शी स्वरुप आज़ भी जगन्नाथ मंदिरों में दिखाई देता हैं । ईश्वर का अंश हर प्राणियों में विद्यमान हैं । इस करुणानिधान के लिए कोई ऊंच-नीच, छोटा-बड़ा, पवित्र-अपवित्र और धर्म और आध्यात्म के दायरे में हुआ नहीं हैं । हम-सबको इस रथयात्रा के माध्यम से यही सीख लेनी चाहिए ।
CG में गूंजा जय जगन्नाथ:राज्यपाल और CM ने लगाई सोने की झाड़ू, पुरी की तरह रायपुर में रथयात्रा
रायपुर
छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रामेन डेका और CM विष्णुदेव साय ने सोने की झाड़ू लगाई। वो महाप्रभु जगन्नाथ के लिए रास्ता साफ कर रहे थे। ओडिशा के जगन्नाथ पुरी की तरह रायपुर में भी रथयात्रा का आयोजन हो रहा है। शहर के गायत्री नगर स्थित मंदिर में VVIPs भव्य पूजा कार्यक्रम में शामिल हुए।
सोने की झाड़ू से रास्ता साफ करने की रस्म को छेरापहरा कहा जाता है। रायपुर के गायत्री नगर स्थित जगन्नाथ मंदिर में विधि-विधान के साथ महाप्रभु जगन्नाथ जी की रथ यात्रा निकाली गई। रथ यात्रा प्रारंभ करने से पूर्व भगवान की प्रतिमाओं को मंदिर से रथ तक लाया गया और मार्ग को सोने की झाड़ू से स्वच्छ किया गया।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने सभी प्रदेशवासियों को रथ यात्रा की बधाई देते हुए कहा कि यह पर्व ओडिशा के लिए जितना बड़ा उत्सव है, उतना ही बड़ा उत्सव छत्तीसगढ़ के लिए भी है। साय ने कहा कि भगवान जगन्नाथ किसानों के रक्षक हैं। उन्हीं की कृपा से वर्षा होती है, धान की बालियों में दूध भरता है और किसानों के घरों में समृद्धि आती है। मैं भगवान जगन्नाथ से प्रार्थना करता हूं कि इस वर्ष भी छत्तीसगढ़ में भरपूर फसल हो। उन्होंने कहा कि भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा से मेरी विनती है कि वे हम सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें और हमें शांति, समृद्धि एवं खुशहाली की ओर अग्रसर करें।
वृंदावन परिक्रमा मार्ग का नगर आयुक्त ने किया निरीक्षण:साफ-सफाई, जलभराव और अतिक्रमण पर दिए कड़े निर्देश,
मथुरा
मथुरा-वृंदावन नगर निगम के नगर आयुक्त जग प्रवेश ने वृंदावन जोन के संपूर्ण परिक्रमा मार्ग का स्थलीय निरीक्षण किया। उन्होंने श्रद्धालुओं की सुविधा और नगर की मूलभूत व्यवस्थाओं को मजबूत बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए।
नगर आयुक्त ने मार्ग की सफाई व्यवस्था का जायजा लिया। उन्होंने जलभराव की स्थिति और ठेले-खोमचे वालों की अव्यवस्था की जांच की। साथ ही अतिक्रमण की वास्तविक स्थिति का निरीक्षण किया।
उन्होंने कहा कि परिक्रमा मार्ग में उच्च स्तरीय साफ-सफाई अनिवार्य है। यह मार्ग लाखों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा है। जलभराव वाले स्थानों पर मशीनों से तत्काल पानी की निकासी के आदेश दिए गए।
सहायक नगर आयुक्त अनुज कौशिक को नियमित रूप से अतिक्रमण हटाने का अभियान चलाने के निर्देश मिले। ठेले-खोमचे वालों को केवल निर्धारित बेंडिंग जोन में ही लगाने की अनुमति दी गई। यातायात सुचारु रखने के लिए उन्हें प्रमुख मार्गों पर रोकने की मनाही की गई।
नगर निगम का लक्ष्य वृंदावन की सांस्कृतिक और धार्मिक गरिमा को बनाए रखना है। परिक्रमा मार्ग स्थानीय और विदेशी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है। इसलिए इसे स्वच्छ और सुव्यवस्थित रखना निगम की प्राथमिकता है।
खाना खाते समय करें इन नियमों का पालन.... प्रेमानंद जी महाराज
राधारानी के परम भक्त संत प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि भोजन केवल शरीर की भूख मिटाने का साधन नहीं, बल्कि यह एक आध्यात्मिक क्रिया है। भोजन को प्रसाद मानकर खाने से ना केवल शरीर स्वस्थ रहता है, बल्कि मन और आत्मा को भी शांति मिलती है। आइए जानते हैं खाना खाते समय किन नियमों का पालन करना चाहिए।
प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि भोजन शुरू करने से पहले भगवान का नाम लेना चाहिए और इसे प्रसाद मानकर ग्रहण करना चाहिए। इससे भोजन पवित्र होता है और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। भोजन से पहले प्रार्थना करने से आत्मा शुद्ध होती है। प्रेमानंद जी कहते हैं भोजन से पहले हाथ धोएं, साफ स्थान पर बैठें और शांत मन से भगवान को धन्यवाद दें।
प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, भोजन हमेशा भूख से कम खाना चाहिए। भोजन और पानी के साथ ही पेट में कुछ हिस्सा वायु के लिए छोड़ें। इससे अपच, पेट फूलना और एसिडिटी जैसी समस्याएं नहीं होती हैं। अधिक खाने से शरीर भारी और मन अशांत हो जाता है। हल्का भोजन आध्यात्मिक शक्ति बढ़ाता है और शरीर को स्वस्थ रखता है। महाराज जी कहते हैं कि भोजन सात्विक और हल्का होना चाहिए। प्याज, लहसुन, और तामसिक भोजन से बचें। खीर, पूड़ी, दाल और सात्विक सब्जियां खाएं। सात्विक भोजन मन को शांत और शरीर को हल्का रखता है।
प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि रात का भोजन शाम 6 बजे तक कर लें। देर रात भारी भोजन से नींद और पाचन पर बुरा असर पड़ता है। भोजन शांत वातावरण में, मौन रहकर करें। इस दौरान टीवी, मोबाइल या झगड़े से बचें। वास्तु शास्त्र के अनुसार, पूर्व या उत्तर दिशा में मुख करके खाना शुभ है। इससे सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर चार दिवसीय एडवांस मेडिटेशन प्रोग्राम आयोजित । ध्यान, ज्ञान और आत्मबोध के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं।
न्यूज़ जांजगीर-चांपा । गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर मड़वा कालोनी जांजगीर-चांपा में एडवांस मेडिटेशन प्रोग्राम का आयोजन किया जा रहा हैं । यह प्रोग्राम ज्ञान, ध्यान और मौन का एक अद्भुत संगम होगा जो कि दिनांक 3 से 6 जुलाई , 2025 तक धर्म-कर्म और आध्यात्मिक में रूचि रखने वालों के लिए अनुभवी प्रशिक्षक आर्ट ऑफ लिविंग प्रभात कुमार जी के मार्गदर्शन में किया जा रहा हैं । पवन कुमार अग्रवाल एवं शशिभूषण सोनी से चर्चा करते हुए बताया , जिसे प्रेस को साझा किया गया हैं ।
इस प्रोग्राम की कुछ मुख्य विशेषताएं -:
ध्यान और विश्राम - गहरा ध्यान और विश्राम के माध्यम से शारीरिक और मानसिक हीलिंग होती हैं ।
ऊर्जावान शरीर और प्रसन्न होता हैं मन - प्रोग्राम का मुख्य उद्देश्य शरीर को ऊर्जावान और मन को प्रसन्न बनाना हैं ।
ज्ञान और आत्म-बोध - प्रोग्राम में भाग लेने मात्र से ही ज्ञान और आत्म-बोध के माध्यम से स्वयं का बोध कराया जाएगा ।
प्रोग्राम में शामिल होने से सात्त्विक भोजन का प्रावधान हैं, और इससे जुड़ने वाले व्यक्ति लाभान्वित होते हैं ।
3 से 6 जुलाई 2025 को मड़वा कालोनी, जांजगीर-चांपा में कार्यक्रम आयोजित किया गया हैं, इसके लिए रिपोर्टिंग 2 जुलाई 2025 से शुरू हो जायेग
आर्ट ऑफ लिविंग के मुख्य प्रशिक्षक-प्रभात कुमार जी हैं । इसके लिए रजिस्ट्रेशन फीस रुपया 3500 रुपया निर्धारित किया गया हैं ।
आध्यात्मिक भूख को शांत करने के लिए व्यक्ति को ध्यान की आवश्यकता पड़ती हैं - श्रद्धेय रविशंकर जी उवाच ।
प्रश्नकर्ता - आदरणीय श्रीयुत गुरुदेव, जब मैं आर्ट ऑफ़ लिविंग एडवांस मेडिटेशन प्रोग्राम करता हूं तो मैं खोखला और खाली महसूस करता हूँ । लेकिन एक हफ़्ते बाद फिर से मैं पाता हूँ कि मैं इच्छाओं और परेशानियों से भरा हुआ हूँ। मैं हर समय खोखला और खाली कैसे रह सकता हूं ?
सदगुरु श्री-श्री आध्यात्मिक गुरु रविशंकर जी - यह पूछने जैसा ही हैं कि 'मैं इस जीवन में एक बार कैसे खा सकता हूं और हर दिन खाना न खाऊ ! ' आप जानते हैं यह बहुत उबाऊ काम हैं । हर दिन आपको खाना बनाना और खाना पड़ता हैं । अगर आप आज़ खाते हैं तो कल फिर आपको भूख लगती हैं । अगर आप सुबह खाते हैं, तो शाम को फिर आपको भूख लगती हैं। आप सिर्फ़ एक बार खाकर संतुष्ट नहीं हो सकते क्योंकि शरीर का अपना स्वभाव होता हैं। यही आपके मन के साथ भी हैं। एक बार मनोरंजन करना पर्याप्त नहीं हैं । क्या आप मेरी बात मानेंगे अगर मैं आपसे कहूं कि आपके जीवन में सिर्फ़ एक फ़िल्म देखना ही पर्याप्त हैं ? आपको बार-बार मनोरंजन की ज़रूरत होती हैं । शरीर को बार-बार पोषण की ज़रूरत होती हैं । भूख मिटाने के लिए हम खाना खाते हैं । प्यास बुझाने के लिए हम पानी पीते । थक जाने पर हम आराम करते हैं । इसी तरह अध्यात्म भी ऐसा ही हैं । आध्यात्मिक भूख को संतुष्ट करने के लिए हमें बार-बार ध्यान करने की ज़रूरत पड़ती हैं ।
SECR जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए चलाएगा स्पेशल ट्रेन:
रायपुर
जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए SECR गोंदिया से खुरदा के बीच 18 कोच वाली स्पेशल ट्रेन चलाएगा। पैसेंजर्स की सुविधाओं और होने वाली भीड़ को मैनेज करने के लिए यह फैसला लिया गया है। ये स्पेशल ट्रेन 26 जून से 7 जुलाई तक चलेगी।
इस दौरान श्रद्धालुओं को खुरदा रोड स्थित जगन्नाथ मंदिर के दर्शन के लिए सीधी ट्रेन सेवा उपलब्ध होगी। छत्तीसगढ़ के 9 स्टेशनों पर इस स्पेशल ट्रेन का स्टॉपेज हाेगा।
गोंदिया, डोंगरगढ़, राजनांदगांव, दुर्ग, रायपुर, मंदिर हसौद, महासमुंद, बागबहरा, खरीयार रोड, नवापारा रोड, हरीशंकर रोड, कांटाभंजी, टीटलागढ़, बढ़मल, बलांगीर, लुईसिंगा, डूंगरीपाली, बरपाली, बरगढ़ रोड, संबलपुर, रेराखोल, बोविंडा, केरेजंगा, अंगुल, तालचेर रोड, ढेंकनाल, भुवनेश्वर और खुरदा रोड।
भगवान जगन्नाथ का स्नान यात्रा महोत्सव:
भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ हुआ महास्नान, 27 जून को देश भर में निकलेगी रथयात्रा
11 जून को स्नान पूर्णिमा मनाई जा रही है। इस दिन भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ श्री मंदिर में भक्तों के सामने स्नान करते हैं। उड़ीसा की पुरी में पूरे साल में सिर्फ इसी दिन भगवान जगन्नाथ को मंदिर में ही बने सोने के कुंए के पानी से नहलाया जाता है, इसलिए इसे स्नान पूर्णिमा कहते हैं।
वहीं, अहमदाबाद में साबरमती नदी के जल से भगवान को स्नान कराया जाता है। भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा 27 जून को निकलेगी।
स्नान के लिए सोने के 108 घड़ों में पानी भरा जाता है, उनमें कस्तूरी, केसर, चंदन और कई तरह की औषधियां मिलाई जाती हैं। स्नान मंडप में तीन बड़ी चौकियों पर भगवानों को विराजित किया जाता है। भगवान पर कई तरह के सूती कपड़े लपेटते हैं, ताकि उनकी काष्ठ काया पानी से बची रहे। फिर भगवान जगन्नाथ को 35, बलभद्र जी को 33, सुभद्राजी को 22 घड़ों के पानी से नहलाया जाता है। इस महा-स्नान के बाद भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं।
अत्यधिक स्नान के बाद भगवान को ज्वर आ जाता है और वे "अनवसर" या एकांतवास में चले जाते हैं। पंद्रह दिनों तक मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं। इस दौरान केवल वैद्य रूपी कुछ सेवक भगवान की सेवा करते हैं। भगवान जगन्नाथ को आरामदायक श्वेत सूती वस्त्र पहनाए जाते हैं, आभूषण हटा दिए जाते हैं और आहार में केवल फल, जूस व तरल पदार्थ दिए जाते हैं।
पांचवें दिन उड़िया मठ से विशेष फुलेरी तेल आता है, जिससे हल्की मालिश की जाती है। भगवान पर रक्त चंदन व कस्तूरी का लेप भी किया जाता है। दशमूलारिष्ट नामक औषधीय काढ़े में नीम, हल्दी, हरड़, बहेड़ा, लौंग आदि जड़ी-बूटियों को मिलाकर मोदक बनाकर भगवान को अर्पित किए जाते हैं। यह आयुर्वेदिक उपचार भगवान को पूर्ण स्वस्थ करता है, जिससे वे रथयात्रा के लिए पुनः तैयार हो जाते हैं।
यह 4-5 फीट चौड़ा वर्गाकार कुआं है। ये जगन्नाथ मंदिर प्रांगण में ही देवी शीतला और उनके वाहन सिंह की मूर्ति के ठीक बीच में बना है। इसमें नीचे की तरफ दीवारों पर पांड्य राजा इंद्रद्युम्न ने सोने की ईंटें लगवाईं थीं। मंदिर के पुजारियों का कहना है कि इस इस कुएं में कई तीर्थों का जल है।
सीमेंट-लोहे से बना इसका ढक्कन करीब डेढ़ से दो टन वजनी है, जिसे 12 से 15 सेवक मिलकर हटाते हैं। जब भी कुआं खोलते हैं, इसमें स्वर्ण ईंटें नजर आ जाती हैं। ढक्कन में एक छेद है, जिससे श्रद्धालु सोने की वस्तुएं इसमें डाल देते हैं। बीमार होने पर पर भगवान को मुख्य सिंहासन पर न बैठाकर मंदिर में ही बांस की लकड़ी से बने कक्ष में रखा जाएगा। 15 दिनों तक 56 भोग की जगह औषधियों से युक्त सामग्री, दूध, शहद आदि चीजों का भोग लगता है। इसे ही भगवान की अनवसर पूजा कहा जाता है।
- 20 तारीख को अनवसर दशमी रहेगी इस दिन भगवान रत्न सिंहासन पर विराजमान हो जाएंगे।
- 21 को भगवान के शरीर पर विशेष औषधियां लगेंगी। उसको खलि लागि कहते हैं।
- 25 तारीख को भगवान के विग्रह को ठीक कर के सजाया जाएगा।
- 26 जून को नव यौवन दर्शन होंगे। इस दिन रथयात्रा के लिए भगवान से आज्ञा ली जाएगी।
- 27 जून को सुबह गुंडिचा रथयात्रा शुरू होगी।
संस्कार दिए बिना सुविधाए देना पतन का कारण है - - आचार्य नंदकुमार शर्मा -------------------------------------------
सौरभ यादव,/ बिहान छत्तीसगढ़
तिल्दा नेवरा - -
समीपस्थ ग्राम मोहरा मे चल रही है तीसरे दिन रविवार को भागवत भूषण आचार्य पंडित नंदकुमार शर्मा जी निनवा वाले ने भागवत कथा के माध्यम से कहा कि आज के परिवेश और परिस्थितियों को देखते हुए अपनी सन्तान को अच्छा संस्कार और अच्छी परवरिश देना अत्यंत आवश्यक है. सबसे बड़ा धनवान वहीं माता पिता है जिनकी सन्तान सुयोग्य और संस्कारी है. उन्होंने कहा कि सन्तान को सुविधाएं देने के साथ साथ संस्कार देना भी आवश्यक है आचार्य जी ने राजा बेन की कथा मे बताया कि राजा अंग का पुत्र बेन हुआ जो चार साल की उम्र ही बड़ा अत्याचारी और दुराचारी बन गया है. एकलौता पुत्र जानकर राजा अंग अपने पुत्र बेन को अधिक प्रेम प्यार देने लगा लेकिन संस्कार नहीं दे पाए जिसके कारण बेन बड़ा ही अत्याचारी हो गया. संतों के अपमान करने के कारण संतों ने उन्हें श्राप देकर मृत्यु दंड दे दिया. आचार्य श्री ने कहा कि संस्कार देने से सन्तान मे अच्छे गुणो का विकास होता है. अनुशासन और ज़िम्मेदारी की भावना का विकास होता है. उन्होंने कहा कि सन्तान को संस्कार दिए बिना सुविधा देना पतन का कारण है. संस्कार और सुविधाए दोनों ही जीवन के लिए महत्वपूर्ण है लेकिन इनके बीच एक संतुलन का होना भी जरूरी है. यदि हम अपने बच्चों को केवल सुविधाएं देते है तो वे जीवन मे असफल हो सकते है परंतु बच्चों को अच्छे संस्कार देते है तो वे जीवन के हर चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहेंगे.
आगे आचार्य जी ने अजामिल की कथा मे बताया मे कि अजामिल ब्राह्मण कुसंगति मे आकर मदिरा पान करके अपने जीवन को बर्बाद कर दिया.. अनेक प्रकार के पाप कर्म और दुष्कर्म मे लिप्त होता गया. आचार्य शर्मा ने कहा कि मदिरा व्यक्ति के जीवन को नरक बना देती है. मदिरा के कारण व्यक्ति का धन, दौलत शरीर, मान सम्मान और चरित्र सब कुछ चला जाता है. इसीलिए मनुष्य को मदिरा का सेवन कभी नहीं करना चाहिए. अजामिल ब्राह्मण मरने के समय एक बार नारायण नाम लिया और भव सागर से पार हो गया.. उन्होंने बताया जो जीव मरण काल मे एक बार भगवान के किसी भी नाम का उच्चारण करता है तो वह पापी से पापी व्यक्ति भी सीधे भवसागर से पार होकर परम गति को प्राप्त कर लेता.. आचार्य शर्मा ने कहा कि माता पिता का कर्तव्य होना चाहिए कि अपने बच्चों का नाम देवी देवताओं के नाम पर रखे.. व्यक्ति जैसी संगति में बैठता है, जैसे लोगों से मित्रता करता है, वह भी वैसा ही बन जाता है। अच्छे व्यक्ति की संगति पारस मणि की भाँति होती है,यदि व्यक्ति स्वार्थ की भावना को त्याग कर हमेशा परमार्थ भाव से जीवन यापन करे तो निश्चित रूप से वह एक अच्छा इंसान है। परमार्थ की भावना ही व्यक्ति को महान बनाती है। व्यक्तियों को अपने जीवन में क्रोध, लोभ, मोह, हिंसा, संग्रह आदि का त्याग करके विवेक के साथ श्रेष्ठ कर्म करने चाहिए। उन्होंने ईश्वर आराधना के साथ अच्छे कर्म करने का आह्वान किया. अपने विचारों पर पैनी नजर रखते हुए बुरे विचारों को अच्छे विचारों से जीतते हुए अपने मानव जीवन को सुखमय एवं आनंद मय बनाना चाहिए। मानव जीवन सभी प्राणियों में श्रेष्ठ है। भगवान की कृपा होने पर ही मानव जीवन प्राप्त होता है। मनुष्य अपने कर्म फल को श्रेष्ठ बनाकर देवता भी बन सकता है। आचार्य जी ने कहा कि जब मनुष्य जीवन मे स्वार्थ आता है तो वह केवल अपने लाभ और स्वार्थ पूर्ति के बारे मे ही सोचता है. दूसरे को हानि पहुचा कर भी स्वार्थ पूरा करने मे लगा रहता है. । कथा सुनने के लिए श्रद्धालुओं की अपार भीड़ बढ़ती जा रही है
प्रेमानंद महाराज जी से कैसे मिल सकते है?, वृंदावन में दर्शन और सत्संग, आइये जानते है
प्रेमानंद महाराज जी वृंदावन के फेमस रासिक संत हैं, जिनके सत्संग और दर्शन के लिए देश-विदेश से लोग आते हैं। श्री हित राधा केली कुंज आश्रम में कोई भी भक्त फ्री में उनके सत्संग और दर्शन का हिस्सा बन सकता है। बस कुछ आसान स्टेप्स फॉलो करने होंगे।
महाराज जी से मिलने के लिए वृंदावन के परिक्रमा मार्ग पर भक्ति वेदांत हॉस्पिटल के सामने बने श्री हित राधा केली कुंज आश्रम जाना होगा। दर्शन या सत्संग के लिए एक दिन पहले सुबह 9:30 बजे आश्रम में रजिस्ट्रेशन कराना पड़ता है। ये रजिस्ट्रेशन फ्री है और आपको अगले दिन सत्संग, कीर्तन या एकांतिक वार्तालाप के लिए टोकन मिलेगा। महाराज जी की हेल्थ और बढ़ती भीड़ को देखते हुए ये सिस्टम बनाया गया है। प्रेमानंद महाराज जी से मिलने के लिए सबसे पहले वृंदावन पहुंचें। आश्रम परिक्रमा मार्ग पर वाराह घाट के पास, भक्ति वेदांत हॉस्पिटल के सामने है। एक दिन पहले सुबह 9:30 बजे आश्रम जाकर रजिस्ट्रेशन करें। आपको सत्संग, कीर्तन या एकांतिक वार्तालाप के लिए टोकन मिलेगा। सत्संग के लिए सुबह 3:30 बजे तक आश्रम पहुंचें, क्योंकि ये 4:15 बजे शुरू होकर 6:30 बजे खत्म होता है। कीर्तन के लिए सुबह 7 बजे और एकांतिक वार्तालाप के लिए 5:30 बजे एंट्री होती है, जो 6:30 बजे शुरू होता है। साफ कपड़े पहनें और आश्रम के नियम फॉलो करें।
अगर आप सिर्फ महाराज जी की झलक पाना चाहते हैं, तो सुबह 2:30 बजे परिक्रमा मार्ग पर भक्ति वेदांत हॉस्पिटल के पास पहुंचें। महाराज जी इस टाइम अपनी कुटिया से निकलकर करीब 250 मीटर पैदल चलते हैं। ये जगह भक्तों में “दर्शन पॉइंट” के नाम से पॉपुलर है। हजारों लोग उनकी एक झलक के लिए जमा होते हैं। इस दौरान उनसे बात करने या डिस्टर्ब करने से बचें, क्योंकि ये उनका स्पिरिचुअल टाइम होता है। भक्त मानते हैं कि इस वक्त उनके चरणों की धूल लेने से राधा रानी की कृपा मिलती है। शांति बनाए रखें।
आश्रम का शेड्यूल फिक्स है, जिसे फॉलो करने से आपका एक्सपीरियंस बेहतर होगा। सुबह 4:10 से 5:30 बजे सत्संग, 5:30 से 6:30 बजे मंगला आरती और वन विहार होता है। 8:15 से 9:15 बजे श्रृंगार आरती और राधा नाम संकीर्तन होता है। शाम को 4:00 बजे धूप आरती, 4:15 से 5:35 बजे वाणी पाठ और 6:00 बजे संध्या आरती होती है। कम से कम दो दिन का प्लान बनाएं, क्योंकि भीड़ की वजह से मिलने की गारंटी नहीं होती। होली या जन्माष्टमी जैसे फेस्टिवल में पहले अपॉइंटमेंट लें। कोई फीस नहीं है, और महाराज जी डोनेशन भी नहीं लेते। वृंदावन पहुंचने के लिए मथुरा जंक्शन से ऑटो या टैक्सी लें, जो 15 किमी दूर है।
श्रीकृष्ण की सीख:रिश्तों में वाद-विवाद हो जाए तो धैर्य से काम लें, क्रोध और जल्दबाजी से रिश्ते टूट सकते हैं
पौराणिक कथा है कि श्रीकृष्ण के यदुवंश के एक राजकुमार अनिरुद्ध का विवाह हो रहा था। श्रीकृष्ण पूरे यदुवंश के साथ भोजकट नगर में बारात लेकर पहुंचे थे, तब विवाह की खुशियां हर ओर थीं।
विवाह में श्रीकृष्ण की पत्नी रुक्मिणी के भाई रुक्मी ने बलराम को चौसर खेलने के लिए आमंत्रित कर लिया। बलराम को ये खेल अधिक नहीं आता था, लेकिन खेलना उन्हें पसंद था। इसलिए वे खेलने बैठ गए। शुरू में बलराम खेल में हारते रहे और हर बार रुक्मी उनकी हार का उपहास उड़ाता रहा।
बलराम ने अंत में खेल में जीत हासिल की तो रुक्मी ने उन्हें अपमानजनक शब्द कहे और बोला कि तुम ग्वाले क्या जीतोगे? वहां मौजूद अधिकतर राजा रुक्मी का ही साथ दे रहे थे और बलराम का उपहार उड़ा रहे ते।
ये बात बलराम को चुभ गई। उनका गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने अपने मुद्गर से रुक्मी को मार डाला। पलभर में विवाह का उत्सव शोक में बदल गया। हर्ष का माहौल पलभर में भय, संकोच और चिंता में परिवर्तित हो गया।
वह समय श्रीकृष्ण के लिए सबसे कठिन था। एक ओर पत्नी रुक्मिणी थीं, जिनका भाई मारा गया था, और दूसरी ओर भाई बलराम थे, जो अपमानित होकर उग्र हो गए थे।
श्रीकृष्ण जानते थे कि किसी एक का पक्ष लेने से परिवार में दरार पड़ सकती है। उन्होंने तत्काल कुछ भी नहीं कहा, उन्होंने न किसी का समर्थन किया और न ही विरोध। वे मौन रह गए।
कुछ समय बीता और जब रुक्मिणी और बलराम का मन शांत हुआ, तब श्रीकृष्ण ने एक-एक करके दोनों से बात की। उन्होंने बलराम से कहा कि विवाह जैसे शुभ अवसर पर आपको जुए जैसे कर्म से दूर रहना था।
श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी से कहा कि हम आपके भाई के घर मेहमान बनकर आए थे, पर उन्होंने हमारे सम्मान का ध्यान नहीं रखा। मेहमानों का अपमान नहीं होना चाहिए।
इस तरह श्रीकृष्ण ने अपने भाई और पत्नी के बीच की स्थिति को शांत किया। इस प्रसंग से श्रीकृष्ण हमें यह सिखाते हैं कि रिश्तों में जब टकराव हो जाए तो तुरंत प्रतिक्रिया देने की जगह मौन और धैर्य से काम लेना चाहिए। समय बीतने के बाद ही सही बात कही जाए, ताकि किसी का अहंकार नहीं टूटे और संबंधों की डोर भी न कटे।
बहेसर में भव्य शोभायात्रा में माँ महाकाली की झांकी देखने के लिए उमड़ी भक्तों की भीड़ ------------------------------------------- कार्यक्रम में भव्य भंड़ार का भी आयोजन किया गया था, -------------------------------------------
सौरभ यादव/ बिहान छत्तीसगढ़
तिल्दा नेवरा :- ग्राम बहेसर में समाधान से परिवार द्वारा कई महीनों से तैयारी में टीम समाधान सेना लगी हुई थी, तब जाके सफल रही हैं, हनुमान मंदिर स्थापना दिवस के अवसर में प्रतिवर्ष कर्यक्रम व भव्य शोभायात्रा निकाली जाती थी, लेकिन इस बार कुछ आंखों प्रकार के कार्यक्रम किया गया, जिसमें सबसे पहले हनुमानजी की पूजा अर्चना कर उसके पश्चात भव्य भंड़ार का आयोजन किया गया ,और आपको बता दें कि बहेसर के 10वी व 12वी में प्रथम व दूसरा स्थान जो बच्चे प्राप्त किये हैं उन्हें समाधान सेना परिवार व कार्यकम के मुख्यअतिथि शैल महेंद्र साहू जिला पंचायत सदस्य , जनपद सदस्य नरसिंग वर्मा व सरपंच ग्राम बहेसर सविता सेवक बर्मन,ओम ठाकुर समाज सेवक, उपसरपंच उमेश निर्मलकर,के द्वारा पुरुस्कार वितरण किया गया और वृद्धा सम्मान समारोह भी रखा गया था,उसके बाद भव्य शोभायात्रा दैहान चौक से प्रारभम किया गया, जिसमें आपको बता दें कि पहली बार बहेसर मे इतना भीड़ नागपुर महाराष्ट्र से आये सतीष साहू की टीम अपने माँ महाकाली की झाँकी लेकर ग्राम पहुंचे हुए थे, जिसमें भक्तों लगी रही कतार,व बहुत ही शांति पुनः समाधान सेना परिवार कार्यक्रम को सफल बनाया गया,