संस्कृति
पुत्रदा एकादशी व्रत से होती है संतान सुख की प्राप्ति
रायपुर – अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
हिन्दू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। साल भर में लौंग महीने को छोड़कर कुल चौबीस एकादशी पड़ती हैं , जिसमें हर माह में दो एकादशी पड़ती है – पहली कृष्ण पक्ष में और दूसरी शुक्ल पक्ष में। सावन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी या पवित्रा एकादशी के नाम से भी जानते हैं , जो आज है। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है। स्कन्द पुराण के वैष्णव खण्ड में एकादशी महात्म्य नाम का एक अध्याय है। इस अध्याय में साल भर की सभी एकादशियों का महत्व , व्रत की विधि और अन्य जानकारी दी गई है। महाभारत काल यानि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने भी युधिष्ठिर को सभी एकादशियों के व्रत और उनके फलों के बारे में बताया था। सावन में एकादशी होने के कारण शिवजी की पूजा करना भी शुभ होगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पुत्रदा एकादशी का व्रत संतान सुख की प्राप्ति के साथ उनकी सेहत के लिये किया जाता है।
पुत्रदा एकादशी व्रत करने से भक्त को संतान सुख मिलता है और संतान को भाग्य का साथ मिलता है यानि संतान उन्नति की राह में चलती है। माना जाता है कि पुत्रदा एकादशी का व्रत करने के साथ विधिवत पूजा करने से संतान की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही इस दिन कुछ खास उपायों को करके अपने मनोकामनाओं की पूर्ति करने के साथ सुख – समृद्धि पा सकते हैं। इस दिन भोलेनाथ को एक सौ आठ बेलपत्र की माला चढ़ायें , माना जाता है कि ऐसा करने से नौकरी-बिजनेस में अपार सफलता के साथ सुख-समृद्धि की प्राप्ति होगी। हर काम में सफलता पाने के साथ हर क्षेत्र में नाम कमाने के लिये पुत्रदा एकादशी के दिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें और महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। इस दिन शाम के समय घी का दीपक जलायें , ऐसा करने से श्रीहरि और शिवजी की कृपा प्राप्त होगी। पुत्रदा एकादशी और सावन के आखिरी सोमवार के दिन जरूरतमंद को अनाज , वस्त्र आदि का दान करें। सच्चे मन से सेवा करने से व्यक्ति की हर इच्छा पूरी हो जाती है। वहीं श्रावण पुत्रदा एकादशी पर पूजा कते समय संतान गोपाल मंत्र – ऊं देवकी सुत गोविंद वासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत:।। का जाप करें।
श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत कथा को सुनने से समस्त पापों का नाश होता है और उस व्यक्ति को मृत्यु के बाद स्वर्ग लोग में स्थान मिलता है। इस दिन भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र का पूजन करने के बाद व्रत रखते हुये द्वादशी को वेदपाठी ब्राह्मणों को भोजन कराने के पश्चात दान आदि देकर संतुष्ट कर उनका आशीर्वाद लेकर विदा करने का नियम है। इस व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी को करते हैं , ध्यान रहे पुत्रदा एकादशी व्रत का पारण करने के बाद ही व्रत को पूरा माना जाता है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित है। इसे दामोदर द्वादशी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु भगवान की विधि-विधान से पूजा करने से जीवन में बहुत खुशी और समृद्धि मिलती है और भक्तों की सभी मनोकामनायें पूरी होती हैं। भगवान विष्णु के बहुत से नामों में एक नाम दामोदर भी है। श्रावण मास में भगवान शिव के साथ भगनान विष्णु की पूजा करना फलदायी माना जाता है।
पुत्रदा एकादशी व्रत
वैसे तो इस व्रत की अनेकों कथायें प्रचलित हैं। जिसमें से एक कथानुसार - एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के महत्व और उसकी कथा के बारे में जानने की इच्छा प्रकट करते हुये उनसे बताने का आग्रह किया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि सावन के शुक्ल पक्ष की एकादशी श्रावण पुत्रदा एकादशी के नाम से जानी जाती है। श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत रखने वाले को इस कथा को पढ़ना या सुनना चाहिये। – द्वापर युग में एक महिष्मति नगर था, जिसका राजा महीजित था। उसे पुत्र ना होने के कारण बड़ा ही दुख था , राजपाट भी उसे अच्छा नहीं लगता था। वह मानता था कि जिसका पुत्र नहीं है , उसे लोक और परलोक में कोई सुख नहीं है। उसने कई उपाय किये लेकिन उसे पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। जब वह राजा वृद्ध हो गया तो एक दिन सभा बुलाई और उसमें प्रजा को भी शामिल किया। उसने कहा कि वह पुत्र ना होने के कारण दुखी है , उसने कभी भी दूसरों को दुख नहीं दिया , प्रजा का पालन अपने पुत्र की तरह किया , इसके बाद भी उसे पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई. ऐसा क्यों है ? राजा के प्रश्न का हल ढूंढने के लिये मंत्री और उनके शुभंचिंतक जंगल में ऋषि मुनियों के पास गये , तब एक स्थान पर उनको लोमश मुनि मिले।उन सभी ने लोमश मुनि को प्रणाम किया तो उन्होंने उनसे आने का कारण पूछा। तब उन सभी ने राजा के कष्ट का कारण बताया।
उन्होंने कहा कि उनके राजा महीजित पुत्रहीन होने के कारण दुखी हैं , जबकि वे प्रजा की देखभाल पुत्र की तरह करते हैं। तब लोमश ऋषि ने अपने तपोबल से राजा महीजित के पूर्वजन्म के बारे में पता किया। उन्होंने बताया कि यह राजा पूर्वजन्म में एक गरीब वैश्य था , धन के लिये इसने कई बुरे कर्म किये। एक बार यह ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी को एक जलाशय पर पानी पीने गया , दो दिन से भूखा था। वहीं पर एक गाय भी पानी पी रही थी , तब इस राजा ने उस गाय को भगाकर स्वयं जल पीने लगा। इस वजह से राजा को इस जन्म में पुत्रहीन होने का दुख सहन करना पड़ रहा है। उन सभी ने लोमश ऋषि से इस पाप से मुक्ति का उपाय पूछा। तब उन्होंने बताया कि श्रावण शुक्ल एकादशी को व्रत करो , इससे अवश्य ही पाप मिट जायेंगे और पुत्र की प्राप्ति होगी। सभी मंत्री और शुभचिंतक वापस आ गये और श्रावण शुक्ल एकादशी के दिन सभी प्रजा ने विधिपूर्वक व्रत रखा और पूजा की , रात्रि जागरण किया। इसके बाद सभी ने श्रावण शुक्ल एकादशी व्रत के पुण्य फल को राजा को प्रदान कर दिया। इस व्रत के पुण्य प्रभाव से रानी ने एक सुंदर बालक को जन्म दिया। इससे राजा खुश हो गया और राज्य में उत्सव मनाया गया श्रावण शुक्ल एकादशी के दिन पुत्र की प्राप्ति हुई , इसलिये इसे पुत्रदा एकादशी कहते हैं।
रायपुर में जैन समाज का पार्श्व जिन मोक्ष कल्याणक आयोजन
रायपुर
राजधानी रायपुर के देवेंद्र नगर सेक्टर-5 देसाई भवन में 1 अगस्त को श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन गुजराती संघ की ओर से धार्मिक आयोजन किए गए। पार्श्व जिन मोक्ष कल्याणक पर "चिंतामणि मारी चिंता चूर" पार्श्व जिन भक्ति और ग्रीन डे का आयोजन किया गया।
जिसमें 108 श्रद्धालुओं ने सामूहिक एकासन किया। इस कार्यक्रम में साध्वी भाविता, साध्वी नमन, साध्वी विहांशी भी मौजूद रहे। 3 अगस्त, रविवार को सुबह 9:15 बजे बाल प्रवचन धारा का आयोजन किया गया है।
पिछले रविवार को 6 वर्षीय अनाया हड़वडीया ने साध्वी दीक्षार्थी का नाटक प्रस्तुत कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। वहीं, 'घर-घर आगम' कार्यक्रम के तहत आगम व कलस समाज के परिवारों में भक्ति और जाप का सिलसिला जारी है।
भक्त शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जयंती समारोह आज
न्यूज़ चांपा
नगर की अग्रणी साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था निराला साहित्य मंडल चांपा द्वारा भक्त शिरोमणि गोस्वामी तुलसी दास जयंती समारोह दिनांक 31जुलाई ,2025 दिन गुरुवार को सायंकाल 4:30 बजें से डीबी वेंचर्स के प्रोप्राइटर धीरेन्द्र बाजपेयी जी के सदर बाजार चांपा स्थित कार्यालय में आयोजित किया गया हैं । इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में गोस्वामी तुलसीदास जी की छायाचित्र पर पूजा-अर्चना करने के बाद आमंत्रित जनों द्वारा मार्गदर्शन दिया जायेगा।
रामचरितमानस, सुंदरकांड एवं विनय पत्रिका जैसे महाकाव्यों के रचयिता एवं हिदी साहित्य के महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में संस्था के संरक्षक तथा पूर्व प्राचार्य पंडित हरिहर प्रसाद तिवारी, भागवताचार्य पंडित दिनेश दुबे, अखिलेश पाण्डेय, रामगोपाल गौरहा, रामकिशोर शुक्ला, डॉ श्रीमति कुमुदिनी द्विवेदी, डॉ रविन्द्र द्विवेदी, धीरेन्द्र बाजपेयी, शशिभूषण सोनी, हेमंत सराफ, धनंजय देवांगन, राजेन्द्र प्रसाद जायसवाल सहित अन्यान्य अपने विचारों से अवगत करायेंगे । इस अवसर पर प्रेस क्लब चांपा अध्यक्ष कुलवंत सिंह सलूजा,अक्षर साहित्य परिषद, ब्राम्हण समाज, स्वर्णकर समाज, अग्रवाल समाज तथा डीवी वेंचर्स के सहयोगी को आमंत्रित किया गया हैं ।
निराला साहित्य मंडल अध्यक्ष राजेश कुमार अग्रवाल, प्रधान सचिव डॉ रविन्द्र द्विवेदी तथा मीडिया प्रभारी शशिभूषण सोनी ने नगर और जांजगीर-चांपा जिले के साहित्यकारों से अनुरोध किया गया हैं कि वे कार्यक्रम में तय समय पर पधारकर सफल बनाएं ।
???? 31 जुलाई को मुंशी प्रेमचंद की कहानी ईदगाह, बूढ़ी काकी और पंच परमेश्वर पर बच्चे बनाएंगे चित्र ???? कक्षा पांचवी से लेकर कक्षा दसवीं तक के स्कूली बच्चे ले सकेंगे भाग
रायपुर.
जन संस्कृति मंच ( जसम ) की रायपुर इकाई और शिवम एजुकेशनल एकेडमी के संयुक्त तत्वावधान में प्रेमचंद जयंती के अवसर पर 31 जुलाई 2025 को स्कूली बच्चे चित्र बनाएंगे.
कक्षा पांच से लेकर कक्षा दसवीं तक में पढ़ने वाले बच्चे इस आयोजन में शिरकत कर सकते हैं. स्मरण रहे यह कोई चित्रकला प्रतियोगिता नहीं है, ब्लकि बच्चों के बीच मानवीय मूल्यों और संवेदना से ओतप्रोत प्रेमचंद की कहानियों को परिचित कराने की कोशिश मात्र है.जसम का मानना है कि सभी बच्चों के भीतर कोई न कोई प्रतिभा अवश्य होती है. सभी बच्चे खास होते हैं इसलिए उनके बीच प्रतियोगिता के बजाय मानवीय मूल्यों का रोपण अनिवार्य है. प्रेमचंद की प्रत्येक रचना एक मनुष्य को और अधिक बेहतर मनुष्य बनने के लिए प्रेरित करती है.प्रेमचंद की रचनाओं से न केवल बच्चे बल्कि बड़े भी बहुत कुछ सीख सकते हैं.
कहां होगा आयोजन ?
बच्चों को मुंशी प्रेमचंद की कहानी ' ईदगाह ' ' बूढ़ी काकी ' और पंच परमेश्वर में से किसी एक को पढ़कर उस पर चित्र बनाना होगा. यह आयोजन शिवम एजुकेशनल एकेडमी के प्रांगण में होगा जो भाटागांव रायपुर में स्थित है. पूरा एड्रेस कुछ इस तरह से हैं-शिवम एजुकेशनल एकेडमी / ढेबर सिटी मोड़ पर / अनंत्रा मार्ट के ठीक सामने, अवधपुरी भाटागांव रायपुर छत्तीसगढ़.
बच्चों को क्या करना होगा ?
भाटागांव स्थित शिवम एजुकेशनल एकेडमी में बच्चों को 31 जुलाई को दोपहर दो बजे तक पहुंचना होगा. चित्र बनाने की समय सीमा शाम साढ़े चार बजे तक ही निर्धारित की गई है.
बच्चों को चित्र बनाने के लिए ए-3 साइज़ की वाइट ड्राइंग सीट आयोजन स्थल पर ही दी जाएगी.बच्चों को अपने साथ चित्र बनाने वाली पेंसिल / स्कैच पेन / ब्रश अथवा कलर बाक्स स्वयं लाना होगा. छोटे बच्चे अपने अभिभावक अथवा शिक्षकों के साथ ही पहुंचे तो सुविधा होगी. आयोजन स्थल में बच्चों के लिए पीने का पानी और स्वल्पाहार की व्यवस्था रहेगी.
रजिस्ट्रेशन कराना होगा
आयोजन पूरी तरह से नि: शुल्क है. यानी किसी भी बच्चे अथवा उनके अभिभावक को रजिस्ट्रेशन के लिए कोई शुल्क नहीं देना है, लेकिन बच्चों या उनके अभिभावकों को नीचे दिए गए दो नंबरों में से किसी एक नंबर पर रजिस्ट्रेशन के लिए फोन करना आवश्यक होगा. रजिस्ट्रेशन के दौरान सिर्फ इतना बताना होगा कि छात्र / छात्रा कौन से स्कूल और कौन सी कक्षा में अध्ययनरत है ?
रजिस्ट्रेशन के लिए कला शिक्षिका नूतन साहू के मोबाइल नंबर 79748 29761 अथवा आफीस इंचार्ज अविनाश तेंभरे के नंबर 8823062280 पर संपर्क किया जा सकता है.रजिस्ट्रेशन की अंतिम तिथि 25 जुलाई 2025 निर्धारित की गई है.
एक सुविधा यह भी रहेगी
जो बच्चे आयोजन स्थल पर चित्र नहीं बना सकते हैं. अथवा उन्हें चित्र बनाने के लिए थोड़ा अधिक समय चाहिए होगा तो ऐसे बच्चे 31 जुलाई या उससे पहले भी अपने घर से चित्र बनाकर उसे शिवम एजुकेशनल एकेडमी में जमा कर सकते हैं. सभी बच्चों के चित्र आयोजन स्थल पर ही प्रदर्शित किए जाएंगे. बच्चों को चित्र पर नीचे की तरफ अपना नाम और कक्षा को अंकित करना होगा.
नामचीन साहित्यकार करेंगे
सहभागिता प्रमाण पत्र का वितरण
बच्चों को 31 जुलाई 2025 को ही शाम साढ़े चार बजे से छह बजे के बीच सहभागिता प्रमाण पत्र का वितरण कर दिया जाएगा. आयोजन में देश के नामचीन लेखक-आलोचक सियाराम शर्मा, कथाकार और उपन्यासकार जया जादवानी, वंदना कुमार, रज़ा हैदरी, जावेद नदीम नागपुरी, लेखिका नीलिमा मिश्रा, रूपेंद्र तिवारी, इंद्र कुमार राठौर, समीर दीवान, चित्रकार सुनीता वर्मा, चित्रकार सर्वज्ञ नायर, अजय शुक्ला, सुनीता शुक्ला, डॉ. संजू पूनम, शायर सुखनवर, आरडी अहिरवार, मधु सक्सेना, भुवाल सिंह ठाकुर,आमिर हाशमी, अमित कुमार चौहान, सनियारा खान, मीसम हैदरी, संजीव खुदशाह, दिलशाद सैफी, सुलेमान खान, इमरान अब्बास, वर्षा बोपचे, आफ़ाक अहमद, सुमेधा अग्रश्री, सुरेश वाहने, सिरिल साइमन, नरेश कुमार साहू, नरेश गौतम, नरोत्तम शर्मा, शिवम एजुकेशनल एकेडमी की निदेशिका सुहानी शर्मा, आलिम नकवी, मौली चक्रवर्ती, डॉ.रामेश्वरी दास, शायर मुसय्यब, प्रतीक कश्यप, भागीरथी वर्मा और पत्रकार-संस्कृतिकर्मी राजकुमार सोनी विशेष रुप से मौजूद रहेंगे.
राधाकृष्ण कीर्तन मंडली ने मनाया हरियाली तीजोत्सव
चांपा..
राधाकृष्ण मंडली चांपा द्वारा मंडली के सदस्य गायत्री ठाकुर के निवास परिसर मे हरियाली तीज उत्सव मनाया गया. उत्सव को विविधता का रंग देते हुए कीर्तन मंडली के सदस्यों ने एक तरफ छत्तीसगढ़ी खेल फूगड़ी ,अटकन बटकन ,खेल का आनंद उठाया,तो दूसरी ओर उमंग उत्साह के साथ सावन के गीत संगीत और शिव भजन के धुन मे सामुहिक नृत्य किए .साथ ही फूलों से सजे झूला झूलने का भी आनंद लिया.गायत्री ठाकुर के सौजन्य से मंडली के सदस्यों ने दोपहर मे सामूहिक भोज भी किए.
इस अवसर पर उत्तरा थवाईत, कविता थवाईत, सोनी सोनी,किरण थवाईत, पुष्पा थवाईत,मंचू थवाईत,विजय लक्ष्मी सोनी लक्ष्मीन सोनी आदि प्रमुख रूप से उपस्थित थे.
पश्चिम जोन में साप्ताहिक हनुमान चालीसा एवं सुंदरकाण्ड पाठ संपन्न
अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
रायपुर -
पीठ परिषद रायपुर (पश्चिम) जोन प्रमुख खड़ा नन्द मिश्र के संयोजकत्व में पंडित रविशंकर प्रसाद शास्त्री के आचार्यत्व में उनके ही एकता नगर गुढ़ियारी स्थित निज निवास में आज अतिशीघ्र हिन्दू राष्ट्र बनने एवं गौ हत्या पूर्णत: बंद होने की दृढ़ संकल्प से साप्ताहिकी हनुमान चालीसा - सुंदरकाण्ड पाठ एवं भजन संकीर्तन का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम के पश्चात सभी उपस्थित श्रद्धालुओं के लिये भोजन प्रसाद की भी व्यवस्था की गई थी। इस दिव्य कार्यक्रम में खड़ा नन्द मिश्र , रवि शंकर प्रसाद शास्त्री , घनश्याम द्विवेदी , अजय मिश्रा , प्रमोद अग्रवाल , आयुष मिश्रा , ऋषि पांडेय प्रवल एवं सभी पीठ परिषद , आदित्यवाहिनी - आनंदवाहिनी के सदस्य विशेष रूप से उपस्थित थे।
महाराजश्री के स्वास्थ्य लाभ हेतु दस दिवसीय अनुष्ठान जारी
ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्द्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वतीजी महाराज द्वारा संस्थापित संगठन पीठ परिषद , आदित्यवाहिनी - आनन्दवाहिनी छत्तीसगढ़ द्वारा महाराजश्री के स्वास्थ्य लाभ हेतु हनुमान चालीसा पाठ का व्यापक प्रकल्प चलाया जा रहा है। इसी क्रम में पीठ परिषद रायपुर (पश्चिम) जोन प्रमुख खड़ा नन्द मिश्र एवं गजानन्द अग्रवाल के सौजन्य से विगत 24 जुलाई से 02 अगस्त तक दसदिवसीय हनुमान चालीसा पाठ महाराजश्री के स्वास्थ्य लाभ हेतु शिवरीनारायण से पंद्रह किलोमीटर दूर ग्राम देवरघटा में प्रसिद्ध हनुमान मंदिर में आचार्यों द्वारा किया जा रहा है।
ग्राम बुंदेला में सावनाहिक रामायण चल रही है जिसमें लक्ष्मण राजपूत लोक गायक कथा प्रवचन सुनाए..
बेमेतरा -
ग्राम बुंदेला में सावनाहिक रामायण चल रही है जिसमें लक्ष्मण राजपूत लोक गायक कथा प्रवचन सुनाए. लक्ष्मण राजपूत जी ने बताया कि हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी भगवान श्रीरामचन्द्र जी की कृपा से रामायण की आयोजन हो रहा है सावन की पावन पर्व पर भगवान श्रीरामचन्द्र की पावन कथा मानस गंगा अमृत रूपी कथा की प्रवाह हो रही है
भक्तगण भक्ति में लीन होकर पावन पतित भगवान श्रीरामचन्द्र जी की कथा सुन रहे हैं अंश राजपूत लक्की राजपूत मुन्ना यादव अनुज राजपूत कुंजराम साहु लतेलू यादव प्रेम साहु धनसिंग राजपूत राजा वर्मा बुंदेली वाले आस पास के भक्तगण समस्त ग्रामवासी
स्वामी श्री करपात्रीजी के संदेशों को वर्तमान में आत्मसात करने की आवश्यकता करपात्री जयंती पर विशेष
अरविन्द तिवारी मीडिया प्रभारी पुरी शंकराचार्य आश्रम
जगन्नाथपुरी -
ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्द्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वतीजी महाराज के गुरू सर्वभूतहृदय यतिचक्रचूड़ामणि रामराज्य के प्रणेता धर्मसम्राट स्वामी करपात्रीजी महाराज का आज श्रावण शुक्ल द्वितीया 26 जुलाई शनिवार को 118 वाँ प्राकट्य दिवस है। आज का दिन धर्मसंघ पीठ परिषद , आदित्यवाहिनी – आनंदवाहिनी संगठन के लिये करपात्री जी महाराज को समर्पित है। आज के परिवेश में पूज्य करपात्री जी महाराज के संदेश हमें मार्ग प्रदान करते हैं। सनातन मानबिन्दुओं की रक्षा , गोरक्षा , राजनीति में शुचिता हेतु राम राज्य परिषद की स्थापना जैसे कार्यों के लिये उनका ब्यक्तित्व एवं दर्शन आत्मसात करने योग्य अनुकरणीय है। स्वामी करपात्रीजी भारत के एक सन्त , स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं राजनेता थे। दशनामी परम्परा के सन्यासी स्वामीजी का मूल नाम हरिनारायण ओझा था। दीक्षा के उपरान्त उनका नाम ‘हरिहरानन्द सरस्वती’ पड़ा किन्तु वे ‘करपात्री’ नाम से ही प्रसिद्ध थे। (कर = हाथ , पात्र = बर्तन, करपात्री = हाथ ही बर्तन हैं जिसके)। आप के कर कमलों में जितना भोजन आता आप उतना ही भोजन प्रसाद समझकर प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण कर लेते इसलिये आप करपात्री के नाम से विख्यात हुये। धर्मनियंत्रित , पक्षपातविहिन , शोषण विनिर्मुक्त शासनतंत्र की स्थापना के लिये आपने वर्ष 1948 में अखिल भारतीय रामराज्य परिषद नामक राजनैतिक दल का भी गठन किया था। धर्मशास्त्रों में इनकी अद्वितीय एवं अतुलनीय विद्वता को देखते हुये इन्हें ‘धर्मसम्राट’ की उपाधि प्रदान की गयी थी। आज जो रामराज्य सम्बन्धी विचार गांधी दर्शन तक में दिखाई देते हैं -
धर्म संघ , रामराज्य परिषद् , राममंदिर आन्दोलन , धर्म सापेक्ष राज्य आदि सभी के मूल में स्वामीजी ही हैं। स्वामी करपात्री का जन्म सम्वत् 1964 विक्रमी (सन् 1907 ईस्वी) में श्रावण मास शुक्ल पक्ष द्वितीया को उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के भटनी ग्राम में सनातनधर्मी सरयूपारीण ब्राह्मण रामनिधि ओझा एवं श्रीमती शिवरानी जी के आँगन में हुआ। बचपन में उनका नाम ‘हरिनारायण’ रखा गया। स्वामी जी तीन भाई थे –ज्येष्ठ भ्राता हरिहरप्रसाद , मँझले हरिशंकर और छोटे हरिनारायण आप स्वयं थे। मात्र 09 वर्ष की अल्पायु में प्रतापगढ़ के खंडवा गाँव के पं० रामसुचित की सुपुत्री महादेवी जी के साथ आपका विवाह संपन्न करा दिया गया किन्तु सोलह वर्ष की आयु में एक पुत्री के जन्म लेने के बाद आपने पूरे परिवार को रोता बिलखता छोड़ माता पिता को प्रणाम करके हमेशा के लिये गृहत्याग कर दिया। उसी वर्ष ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती से कांशी के दुर्गाकुण्ड में नैष्ठिक ब्रह्मचारी की दीक्षा लेकर दण्ड ग्रहण कर हरि नारायण से ‘ हरिहर चैतन्य ‘ बने। वे स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती के शिष्य थे। इन्होंने नैष्ठिक ब्रह्मचर्य श्री जीवन दत्त महाराज जी से , संस्कृत अध्ययन षड्दर्शनाचार्य पंडित स्वामी श्री विश्वेश्वराश्रम जी महाराज से , व्याकरण शास्त्र, दर्शन शास्त्र, भागवत, न्यायशास्त्र, वेदांत अध्ययन, श्री अचुत्मुनी जी महाराज से अध्ययन ग्रहण किया। श्री विद्या में दीक्षित होने पर धर्मसम्राट का नाम षोडशानन्द नाम भी पड़ा। सत्रह वर्ष की आयु से हिमालय गमन प्रारंभ कर अखण्ड साधना की और श्रीविद्या में दीक्षित होने पर धर्मसम्राट का नाम षोडशानन्द नाथ पड़ा।
केवल 24 वर्ष की आयु में परम तपस्वी 1008 श्री स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वतीजी महाराज से विधिवत दण्ड ग्रहण कर “अभिनवशंकर” के रूप में प्राकट्य हुआ। एक सुन्दर आश्रम की संरचना कर पूर्ण रूप से सन्यासी बन कर “परमहंस परिब्राजकाचार्य 1008 श्री स्वामी हरिहरानंद सरस्वती श्री करपात्री जी महाराज” कहलाये। करपात्रीजी का अधिकांश जीवन वाराणसी में ही बीता , वे अद्वैत दर्शन के अनुयायी एवं शिक्षक भी थे। उन्होने सम्पूर्ण भारत में पैदल यात्रायें करते हुये धर्म प्रचार के लिये सन 1940 ई० में “अखिल भारतीय धर्म संघ” की स्थापना की। धर्मसंघ का दायरा संकुचित नहीं , अत्यन्त विशाल है जो आज भी प्राणी मात्र में सुख-शांति के लिये प्रयत्नशील है। संघ की दृष्टि में समस्त जगत और उसके प्राणी सर्वेश्वर भगवान के अंश हैं या उसके ही रूप हैं। संघ का मानना है कि यदि मनुष्य स्वयं शान्त और सुखी रहना चाहता है तो औरों को भी शान्त और सुखी बनाने का प्रयत्न आवश्यक है। इसलिये धर्मसंघ के हर कार्य के आरम्भ और अन्त में “धर्म की जय हो , अधर्म का नाश हो , प्राणियों में सद्भावना हो , विश्व का कल्याण हो” ऐसे पवित्र जयकारे किये जाते हैं। इसमें अधार्मिकों के नाश के बजाय अधर्म के नाश की कामना की गयी है।
गोरक्षा आन्दोलन –
इंदिरा गांधी के लिये उस समय चुनाव जीतना बहुत मुश्किल था | क्योंकि सबको पता था की करपात्री महाराज के पास वाक सिद्धि (किसी की भविष्यवाणी को सच करने की शक्ति) थी। इसलिये इंदिरा गाँधी ने उनकी शरण ली और उनके सामने प्रधानमंत्री बनने मंशा रखी , करपात्री जी महाराज के आशीर्वाद से इंदिरा गांधी चुनाव जीती। इंदिरा ग़ांधी ने उनसे वादा किया था चुनाव जीतने के बाद गाय के सारे कत्ल खाने बंद हो जायेगें जो अंग्रेजों के समय से चल रहे हैं। लेकिन इंदिरा गांधी मुसलमानों और कम्यूनिस्टों के दबाव में आकर अपने वादे से मुकर गयी थी। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री ने संतों इस मांग को ठुकरा दिया जिसमें संविधान में संशोधन करके देश में गौ वंश की हत्या पर पाबन्दी लगाने की मांग की गयी थी तो संतों ने 07 नवम्बर 1966 को संसद भवन के सामने धरना शुरू कर दिया। हिन्दू पंचांग के अनुसार उस दिन विक्रमी संवत 2012 कार्तिक शुक्ल की अष्टमी थी जिसे ‘गोपाष्टमी’ भी कहा जाता है। इस धरने में भारत साधु-समाज, सनातन धर्म, जैन धर्म आदि सभी भारतीय धार्मिक समुदायों ने इसमें बढ़-चढ़कर भाग लिया।
इस आन्दोलन में चारों शंकराचार्य तथा स्वामी करपात्री जी भी जुटे थे। पुरी के जगद्गुरु शंकराचार्य श्री स्वामी निरंजनदेव तीर्थ तथा महात्मा रामचन्द्र वीर के आमरण अनशन ने आन्दोलन में प्राण फूंक दिये थे। लेकिन इंदिरा गांधी ने उन निहत्थे और शांत संतों पर पुलिस के द्वारा गोली चलवा दी जिससे कई संत , महात्मा और गोभक्त काल कलवित हो गये । इस हत्याकांड से क्षुब्ध होकर तत्कालीन गृहमंत्री ‘गुलजारी लाल नंदा’ ने अपना त्याग पत्र दे दिया और इस कांड के लिये खुद सरकार को जिम्मेदार बताया था। लेकिन संत ‘राम चन्द्र वीर’ अनशन पर डटे रहे जो 166 दिनों के बाद उनकी मौत के बाद ही समाप्त हुआ था। राम चन्द्र वीर के इस अद्वितीय और इतने लम्बे अनशन ने दुनियाँ के सभी रिकार्ड तोड़ दिये है । यह दुनियाँ की पहली ऎसी घटना थी जिसमे एक हिन्दू संत ने गौ माता की रक्षा के लिये 166 दिनों तक भूखे रह कर अपना बलिदान दिया था। गौ रक्षा आंदोलन में गोली चालन से व्यथित करपात्री जी महाराज ने इंदिरा गाँधी को श्राप दिया कि जिस प्रकार आपने इन संतों की हत्या की है उसी प्रकार से आपकी और आपके वंशों की भी हत्या होगी जिसका परिणाम आप सभी जानते ही हैं।
ब्रह्मलीन -
करपात्री जी महाराज माघ शुक्ल चतुर्दशी सम्वत 2038 (07 फरवरी 1982) को केदारघाट वाराणसी में स्वेच्छा से महाप्राण में विलीन हो गये। उनके निर्देशानुसार उनके नश्वर पार्थिव शरीर का केदारघाट स्थित श्री गंगा महारानी को पावन गोद में जल समाधि दी गई। आपने अपने साहित्य सृजन के माध्यम से समाज में जो चेतना जागृत की है वह हमेशा अविस्मरणीय रहेगी। आपने वेदार्थ पारिजात , रामायण मीमांसा , विचार पीयूष , पूँजीवाद , समाजवाद , मार्क्सवाद जैसे अनेकों ग्रँथ लिखे। आपके ग्रन्थों में भारतीय परम्परा का बड़ा ही अद्भुत व प्रामाणिक अनुभव प्राप्त होता है। आपने सदैव ही विशुद्ध भारतीय दर्शन को बड़ी दृढ़ता से प्रस्तुत किया है। आपके लिखित ग्रंथों से यह प्रेरणा मिलती है कि लोकतंत्र मे राष्ट्र को समृद्धशाली बनाने में अध्यात्मवाद आवश्यकता है। आपने हिन्दू धर्म की बहुत सेवा की। आपका नाम विश्व के इतिहास में युगपुरुष के रूप में सदैव अमर रहेगा। स्वामीजी का प्राकट्य दिवस मनाना तभी सफल हो सकता है जब हम उनके बताये मार्गों पर चलने की प्रेरणा लें और भव्य राष्ट्र की संरचना में अपनी सहभागिता निश्चित करें।
5-13 साल के बच्चे फर्राटे से बोलते हैं गीता के श्लोक भगवद गीता की शिक्षा दे रहा ‘गीता परिवार
रायपुर
,राजधानी की रहने वाली कक्षा तीसरी में पढऩे वाली 7 साल की श्रीनिधि को भगवद् गीता के कई श्लोक कंठस्थ याद हैं। वो फर्राटे से श्लोक बिना देखे ही बोल देती है। श्रीनिधि ‘लर्न गीता’ केंद्र से जुड़ी है जहां बच्चों को गीता का पाठ पढ़ाया जाता है। रायपुर के मोवा में गीता परिवार ‘लर्न गीता’ कार्यक्रम के माध्यम से बच्चों को भगवद् गीता की शिक्षा दे रहा है। बाद में 5 अलग-अलग विषयों में उनकी परीक्षा भी ली जाती है। यहां पढऩे वाले बच्चे एक साल में गीता के 12वें, 15वें और 16वें अध्याय के 85 से ज्यादा श्लोक याद कर चुके हैं और पूरे 18 अध्याय के 700 श्लोक याद करने में लगे हैं। ऐसा नहीं है कि वे सिर्फ श्लोक याद कर रहे हैं, इसे अपने जीवन में उतार रहे हैं। बच्चे इसकी नियमित शिक्षा लेने पहुंच रहे हैं।
मोवा में बच्चों को गीता की शिक्षा दे रहीं 65 साल की संगीता पांडेय बताती हैं कि एक साल पहले 1 बच्चे से इसकी शुरुआत हुई थी। आज 5 से 13 साल तक के 22 बच्चे हैं। रायपुर के अशोका हाइट्स सोसाइटी, रोहणीपुरम में रोजाना और गुढिय़ारी स्कूल, डागा कॉलेज के अनाथालय में हफ्ते में एक दिन गीता का पाठ पढ़ाया जा रहा है।
गीता परिवार छत्तीसगढ़ ‘लर्न गीता’ कार्यक्रम के माध्यम से बाल संस्कार केंद्र के तहत बच्चों को भगवद् गीता की शिक्षा दे रही है। संगीता पांडेय बताती हैं कि करीब पांच साल पहले कोरोना के दौरान इसकी शुरुआत प्रदेश में हुई थी। बच्चों को अध्यात्म से जोडऩे का प्रयास किया जा रहा है। इससे लगातार बच्चे जुड़ते जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि 40 मिनट की कक्षा होती है। यहां आने वालों में डॉक्टर, इंजीनियर, बिजनेसमैन के बच्चे भी शामिल हैं। इसके अलावा बच्चों को बुधवार को योगा-ध्यान और शुक्रवार को कहानी सुनाई जाती है। इसमें अध्यात्म और महापुरुषों से जुड़ी कहानियां होती हैं।
भगवद गीता का ज्ञान ले रहे बच्चों को गीता गुंजन, गीता जिज्ञासु, गीता पाठक, गीता पथिक और गीता व्रती की परीक्षाएं देनी पड़ती है। गीता पथिक में पूरा श्लोक याद कर शंकराचार्य के सामने परीक्षा देनी होती है। अशोका हाइट्स सोसाइटी में चल रही कक्षा के 7 बच्चों ने हाल ही में गीता जिज्ञासु की परीक्षा दी है। पांडेय कहती हैं कि स्कूलों में भी बच्चों को गीता का पाठ नियमित पढ़ाना चाहिए। इसके लिए सरकार को पहल करने की जरूरत है। गीता परिवार छत्तीसगढ़, स्वामी गोविंद देव गिरिजी महाराज द्वारा स्थापित एक संस्था है। इसका उद्देश्य बच्चों के विकास और संस्कार के लिए काम करना है। यह संगठन श्रीमद्भागवत गीता और नैतिक मूल्यों के माध्यम से लोगों को शिक्षित करता है।
छत्तीसगढ़ में गीता परिवार सक्रिय भूमिका निभा रहा है। बता दें कि गीता परिवार की स्थापना 1986 में महाराष्ट्र के संगमनेर में हुई थी। ऑनलाइन के माध्यम से 180 देशों में 12 लाख से अधिक लोग श्रीमद भगवत गीता का शुद्ध संस्कृत उच्चारण सहित निशुल्क ज्ञान ले रहे हैं।
गीता परिवार छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष गीत गोविंद साहू ने बताया कि ‘लर्न गीता’ की ऑनलाइन शुरुआत पांच साल पहले हुई थी। छत्तीसगढ़ के रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़, जगदलपुर, दुर्ग और भिलाई में ऑनलाइन और ऑफलाइन कक्षाएं लग रही हैं। इससे प्रदेशभर में 10 हजार से अधिक साधक जुड़े हैं। सेंट्रल जेल में कैदी ऑनलाइन गीता का श्लोक याद कर रहे हैं। यहां के करीब पांच कैदियों को गीता कंठस्थ याद है।
अंततः अध्यात्म ही सबकी मंजिल है...! (स्वामी सुरेन्द्र नाथ)
अध्यात्म को मंजिल मानने का अर्थ है आत्म-ज्ञान, शांति और सच्चे आनंद की प्राप्ति को जीवन का लक्ष्य बनाना,भौतिक उपलब्धियाँ क्षणिक संतोष दे सकती हैं, लेकिन आत्मिक संतुलन और आंतरिक शांति ही स्थायी सुख का स्रोत होती हैं, अध्यात्म केवल धर्म या पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्वयं को समझने,अपनी सीमाओं को पार करने और उच्चतर चेतना से जुड़ने की प्रक्रिया है
जीवन दो स्तरों पर जिया जाता है, एक सांसारिक जीवन, दुसरा आध्यात्मिक जीवन। जन्म से प्रारंभ होकर मृत्यु पर समाप्त होने वाला जीवन अनवरत है, जो हमें मृत्यु के साथ समाप्त होता दिखता है, किन्तु मृत्यु अंत नहीं, मृत्यु भी आरम्भ है। ये जीवन चक्र कभी समाप्त नहीं होता, संसार को जो अंत होता दिखता है, अध्यात्म में डुबने पर समझ आता है, कि अंत ही प्रारंभ का बीजारोपण है। यहां कुछ भी समाप्त नहीं होता, केवल रूप परिवर्तित होता है। विज्ञान भी मानता है कि ब्रह्मांड ऊर्जा से बना है, जो कभी समाप्त नहीं होता, ऊर्जा का रूप परिवर्तन होता है।
अक्सर लोगों को लगता है, कि अध्यात्म में जाने के लिए सन्यास लेना अनिवार्य है। सन्यास एक व्यक्ति का निजी निर्णय होता है, आध्यात्मिक स्तर को पाने के लिए सन्यासी होना मापदंड नहीं है। अध्यात्म हमें अहंकार, मोह और भटकाव से मुक्त कर सही दिशा में चलना सिखाता है। जैसे-जैसे आध्यात्मिक परिपक्वता आती है, व्यक्ति मूर्ति पूजा, विधि विधान और पाखंड से दूर होते जाता है और ध्यान में लीन होते जाता है, अध्यात्म ही वो स्थान है, जहाँ आपके सभी प्रश्नों के उत्तर मिल जाते हैं, वस्तुतः अध्यात्म ही आपकी मंजिल है।
हमारी सनातन संस्कृति में गृहस्थ जीवन में रहते हुए परमात्मा प्राप्ति का मार्ग बताया गया है, किन्तु हम में से, कितने लोग हैं जो वेदों का अध्ययन करते हैं, कितनों ने रामायण का अध्ययन किया है, कौन गीता का पाठ करता है, और गीता का सार समझता है..? ये यक्ष प्रश्न की तरह है, हम अति भाग्यशाली हैं कि हमें दुनिया का सर्वश्रेष्ठ ज्ञान उपलब्ध तो है, लेकिन विडंबना है, कि हम इस ज्ञान को अपने जीवन में नहीं उतारते, और आज हमारे भटकाव का मुख्य कारण यही है। जीवन के हर पहलू को समझना हो, तो अध्यात्म की शरण लेनी चाहिए।
हममें से ज्यातर लोग केवल पूजा-पाठ या मंदिर जाने को अध्यात्म समझ लेते हैं, किन्तु ऐसा नहीं है। ये एक दिनचर्या हो सकती है, अच्छी आदत है, किंतु अध्यात्म आपकी समझ को परिपक्व करता है। संसार में रहकर संसार से विरक्त रहने की कला सिखाता है, अध्यात्म प्रेम और समर्पण सिखाता है, आपको सामान्य से विशेष की ओर लेकर जाता है, शांति और आनन्द की अनुभूति कराता है।
अध्यात्म को मंजिल मानने का अर्थ है आत्म-ज्ञान, शांति और सच्चे आनंद की प्राप्ति को जीवन का लक्ष्य बनाना। भौतिक उपलब्धियाँ क्षणिक संतोष दे सकती हैं, लेकिन आत्मिक संतुलन और आंतरिक शांति ही स्थायी सुख का स्रोत होती हैं।
अध्यात्म केवल धर्म या पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्वयं को समझने, अपनी सीमाओं को पार करने और उच्चतर चेतना से जुड़ने की प्रक्रिया है। यह हमें अहंकार, मोह और भटकाव से मुक्त कर सही दिशा में चलना सिखाता है। जब हम बाहरी दुनिया की अस्थिरता से ऊपर उठकर, अपने भीतर स्थिरता पाते हैं, तभी सच्चे अर्थों में मंजिल पर पहुँचते हैं, अगर अध्यात्म को जीवन की मंजिल बनाते हैं, तो हर अनुभव हमें सीखने और आगे बढ़ने का अवसर देता है। तब जीवन केवल संघर्ष नहीं रहता, बल्कि आत्म-विकास और शांति का एक सतत प्रवाह बन जाता है। इसका मुख्य संदेश यह है कि अच्छे और पुण्य कर्म करने से व्यक्ति की प्रतिष्ठा और यश बढ़ता है, और उसका जीवन सार्थक और सफल बनता है। यह जीवन को सही दिशा में जीने और समाज में अच्छा योगदान देने की प्रेरणा देता है, और व्यक्ति को आत्मशांति, परमानन्द की अनुभूति कराता है।
जगन्नाथ रथयात्रा अद्भूत अलौकिक अकल्पनीय श्रद्धा उत्साह और भक्ति से सराबोर हुई चांपा की गलियां
चाम्पा,
जगन्नाथ रथयात्रा इस समय चाम्पा नगरी में इतिहास में पहली बार बहुत ही धूमधाम से मनाया गया है,धन्य है हमारी वृंदावन भक्ति कुटीर जांजगीर और धन्य है हमारी रुकमणी-कन्हैया धाम चांपा और धन्य है वह तमाम सहयोगी जिन्होने हमारी इस असाधारण निर्णय को चरितार्थ कर दिखाया ! और चाम्पा में इस जगन्नाथ रथयात्रा के माध्यम से भक्ति की एक नई उमंग पैदा कर दी। जहां-जहां से यह रथयात्रा निकली वहां-वहां से भक्तगण अपनी तमाम गृहस्थ उलझनों को एक तरफ दरकिनार करते हुए हरे कृष्णा हरे रामा की धुन में डूबकर भावविभोर होकर झुमने को मजबूर हो गये।
अंर्तराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ जिसे इस्कॉन के नाम से भी लोग जानते है इसी का एक सेंटर का नाम है वृंदावन भक्ति कुटीर, जांजगीर। एक छोटे से जगह से अपना सेंटर चलाते हुए इनके अनुयायी एक विशाल जनसमूह के हृदयों में अपनी छाप छोडती आगे बढ़ रही है, अब वृंदावन भक्ति कुटीर के भक्त जांजगीर से बाहर निकलकर चांपा के रुकमणी-कन्हैया धाम में बच्चों के लिए अपनी वेल्यू एजुकेशन का कोर्स के साथ-साथ इंग्लिस स्पीकिंग का भी कोर्स कराती हैं। यहां भी 40-50 बच्चों की एक टीम बन चुकी हैं, जिनके सहयोग से इस वर्ष जगन्नाथ रथयात्रा निकालने के लिए मंथन किया। लेकिन यह काम इतना आसान भी नहीं था और योजना बनाते-बनाते रथयात्रा का समय भी नजदीक आ गया था ,चूंकि जांजगीर में यह रथयात्रा प्रतिवर्ष निकलती है जो बड़े ही भव्य व विशाल जनसमूह का नेतृत्व भी करती है इसलिए भक्तों का सारा समय जांजगीर में ही व्यतित हो गया। अपने निर्धारित समय में जांजगीर की रथयात्रा भी बहुत ही जबरदस्त रही। जांजगीर के बाद सभी भक्त बिलासपुर के रथयात्रा में शामिल होने के लिए व्यस्त हो गये। अब और बेचैनी होने लगी कि चांपा के लिए साल भर से सिर्फ योजना ही बना रहे हैं लेकिन धरातल पर कुछ भी नजर नही आ रहा है। थोड़े हताश भी हुए कि शायद ही अब चांपा में रथयात्रा का आयोजन कर पाएंगे। तभी दशमी तिथि के आखिरी तीन दिन पहले जगन्नाथ प्रभु की ऐसी कृपा हुई और यह तय हुआ कि दशमी तिथि को ही चांपा में पहली बार इस्कान के भक्तों द्वारा एक भव्य रथयात्रा निकलेगी माने निकलेगी! परन्तु दो दिन का समय और तैयारी कुछ भी नही और ऊपर से वर्षा भी लगातार तीन दिन से अनवरत बरस रही थी, तो थोड़ा चिंता होना भी स्वाभाविक है लेकिन यह तो तय था कि अब चाहे पानी गिरे या फिर ओले पड़े हमारी रथयात्रा निकलेगी माने निकलेगी। यहां प्रभु की फिर एक बार कृपा हुई कि पूरी रथयात्रा के दौरान अचानक आसमान एकाएक साफ होकर मौसम एकदम से खिल गयी। और रथयात्रा के समापन के पश्चात पुनः वर्षा अपनी असली रुप में आकर झमाझम बरसने लगी।
अब बारी है इस यात्रा के दौरान अनुभव की। सोचकर चले थे कि यह पहला प्रयास है अगली बार से हम बड़े ही धूमधाम व पूर्ण तैयारी के साथ निकालेंगे, परन्तु जैसे ही रथ यात्रा प्रारंभ हुई तो ऐसा लगा जैसे हम ही नही पूरे चांपा के लोगों को भी हमारी इस रथयात्रा का इंतजार रहा हो. एकाएक भक्तों की संख्या बढ़ने लगी, सभी भक्त भगवान जगन्नाथ के रथ की रस्सी को खीचने के लिए उतावले होकर प्रत्येक गली के हर घर से लोग निकलने लगे, कोई भगवान जगन्नाथ के रथ के आगे झाडू लगाने को उत्साहित थे तो कोई जयकारा लगाने के लिए उत्साहित थे,
यह सब देखकर मन अति उत्साह से भर गया। और ऐसा लगा जैसे मेहनत रंग लायी। इस दौरान भगवान के प्रति बच्चों की मस्ती भी देखने लायक रही, कोई झूम रहा है तो कोई नाच रहा है ऐसा दृश्य देखकर मन तो मानों जैसे आनंद से भर गया हो।
चांपा में रथयात्रा के दौरान वह जो आनंद के क्षण थे उसे शायद किसी शब्दों में न बांध पांऐ। उस क्षण का आनंद तो वही बता सकता है जो वहां मौजूद रहा हो। माताएं बहनों का वह भगवान के प्रति सर्मपण व नृत्य को देखकर तो पूरा नगर झूम उठा और हमको बार-बार लोग पूछने लगे कि ये लोग कौन है कहां से आएं है हमने तो ऐसा चांपा में इन्हें पहले कभी नही देखा शायद ये लोग वृंदावन से आए होंगे इत्यादि तमाम तरह की चर्चाएं पूरी रथयात्रा के दौरान होती रही और नगरवासी भी अपने को रोक नही सके और भगवान जगन्नाथ रथयात्रा के सहभागी बनते गये। जैसे -जैसे हमारी यात्रा आगे बढ़ती गयी मानो हमारा उमंग भी बढ़ती गयी, फिर क्या था हमारे वृंदावन भक्ति कुटीर के भक्तों की कीर्तन मंडली के टीम की गायन, वादन व नृत्य की अपनी एक अलग ही छटा देखने को मिली। इस दौरान अत्यधिक भीड होने के कारण रोड जाम तक की नौबत आने लगी तब पुलिस प्रशासन का भी सहयोग जबरदस्त रहा जो हमारी यात्रा को भी आगे बढ़ाते रही और लोगों को भी कोई परेशानी न हो इसकी भी बराबर ध्यान रखती रही।
भगवान जगन्नाथ, भैया बलभद्र व माता सुभद्रा जी के स्वागत के लिए हर घर से आरती के दीप जलाकर व नारियल, फल, मिठाई इत्यादि पकवान भगवान को भेट स्वरुप समर्पण करते भक्तजन अपने-अपने घर के द्वार में इंतजार करते भी देखे गये, तो वही अनेक भक्तजन झुमते नाचते गाते भगवान के अनुयायियों का थकान दूर करने के लिए जगह-जगह पानी, शरबत व जूस का स्टाल लगाकर उन्हें अपने हाथों से पिलाते नजर भी आए, जो हमारी आनंद व उमंग को और भी बढ़ाने का कार्य कर रही थी।
अब यात्रा अपने अंतिम पड़ाव की ओर पहुँचने वाली थी। तब भक्तों का उत्साह और भी चरम को छुने लगी, रुकमणी-कन्हैया धाम के सामने वे रोड पर ही बैठ गये व झूम-झूम कर नाचने लगे, तत्पश्चात भगवान की आरती उतारी गई फिर भगवान जगन्नाथ, भैया बलभद्र व माता सुभद्रा जी को रुकमणी-कन्हैया धाम में कुछ समय के लिए आराम स्वरुप आसन पर बैठाया गया। उसके बाद तमाम भक्तजनों के लिए महाप्रसाद की व्यवस्था की गयी थी। सो वे सभी महाप्रसाद पाते गये।
कार्यकम की अत्यधिक सफलता को देखते हुए अनेक संगठनों ने इस प्रयास को सराहा भी और अगली रथयात्रा में अपनी सहभगिता देने का भी प्रतिबद्धता जताई। जो आने वाले समय में उत्साह को और भी दुगना करेगी। इस कार्यक्रम को सफल बनाने में सबसे बड़ा योगदान आर. के .ज्वेलर्स के रविन्द्र सोनी भारत एवं उनके परिवार एवं अनुयायियों का रहा है, जिसके सभी जगह तारीफ हो रही है ।
भक्तों को दर्शन देने के लिए द्वार-द्वार पहुंचे जग के नाथ जगन्नाथ स्वामी ! भगवान श्रीजगन्नाथ रथयात्रा श्रद्धा ,भक्ति और आस्था पूर्वक निकाली गई
जांजगीर-चांपा । हिंदु पंचाग के अनुसार संपूर्ण देश-भर में आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया ( इस बार दिनांक 27 जून 2025 से 5 जुलाई ) के दिन विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथयात्रा आरंभ हो रही हैं । 9 दिनों तक चलने वाली यह पारंपरिक रथयात्रा भारतवर्ष के विभिन्न शहरों की तरह कोसां,कांसा एवं कंचन की नगरी चांपा में आस्था, श्रद्धा और भक्ति पूर्वक निकाली गई ।
यह वह महान पर्व हैं , जहां भगवान जगन्नाथ स्वामी दर्शन देने के लिए असंख्य श्रद्धालु भक्तों के द्वार-द्वार तक पहुंचते हैं और रथ पर सवार होकर नर-नारी, बच्चें और बड़े-बुजुर्ग भगवान के रथ को खींचकर स्वयं के जीवन को धन्य मानते हैं । ढोल , गाजे-बाजे और शंखनाद करते हुए भक्त गण इन रथों को ढकेलते हुए आगे बढ़ाते जाते हैं। कहा जाता है कि जिन व्यक्तियों को रथ को धक्का देने का सौभाग्य मिलता हैं वह भवसागर के पार पहुंच जाता हैं । आठ दिनों तक भगवान जगन्नाथ स्वामी भाई-बहन के साथ अपने मौसी के अस्थायी घर पर पहुंच आराम करते हैं , उड़िया भाषा में आड़प दर्शन कहा जाता हैं। आषाढ़ मास के दशमी तिथि को यह रथ पुनः अपने स्थायी मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं । गौरतलब हैं कि रथयात्रा का यह पर्व हर साल आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को ही मनाया जाता हैं, शुक्रवार को सायंकाल 5 बजें एक रथ सोनार पारा और ब्राह्मण पारा स्थित जगन्नाथ बड़े मठ मंदिर से तो दुसरी रथ पाड़ी घाट स्थित जगन्नाथ मंदिर से निकली गई । यह यात्रा लोहार पारा, कदंब चौक, समलेश्वरी देवस्थान, देवांगन पारा होते हुए नवनिर्मित एक रथ जयश्री ज्वेलर्स तो दूसरी रथ नारायण प्रसाद सोनी के सदर बाजार चांपा में रुकेंगे ।
मालपुआ की खूब बिक्री देर-रात तक होती रही ।
भगवान श्री जगन्नाथ की रथयात्रा हर्षोल्लास पूर्वक निकाली गई । दोनों देवस्थान से सुसज्जित रथ पर भगवान जगन्नाथ स्वामी के तीनों विग्रहों को सजा-धजा धर बैठाया गया और विश्राम स्थल रात तक पहुंचा । रथयात्रा के दिन चांपा नगर के विभिन्न चौक-चौराहे पर मालपुआ की खूब बिक्री रही । श्रद्धालु भक्त भगवान जगन्नाथ स्वामी का दर्शन-पूजन करने के बाद मालपुआ, गजामुग ,नारियल फल-फूल को अपने घर ले जाकर मिल-बांटकर खाते हैं । मालपुआ से लोग भगवान जगन्नाथ स्वामी जी को भोग लगाते हैं और बांटते भी हैं । श्रीमति सत्यप्रभा स्वर्णकार, नेहा -अविनाश अग्रवाल, श्रीमति ममता पाण्डेय, आंकाक्षा तिवारी, विमलेश तिवारी और सुश्री नैंसी पाण्डेय को पूर्व पार्षद श्रीमति शशिप्रभा सोनी ने मालपुआ महाप्रसाद के रुप में भिजवाईं ।
पुरी की तर्ज पर छोटे शहरों में परंपरा का निर्वाहन किया जा रहा हैं ।
साहित्यकार शशिभूषण सोनी ने बताया कि जगन्नाथ पुरी में रथयात्रा की शुरुआत 12 वीं सदी में हुई थी । यह मंदिर भारतवर्ष के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक हैं । इस मंदिर की सबसे बड़ी प्रधानता समता की भावना हैं । मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए आये हुए भक्तों में यहां जाति-पाति का कोई महत्व नहीं हैं, ब्राम्हण के साथ शुद्र भी यहां पर पंक्ति में बैठकर मैंने भोजन करते हुए देखा हैं । इसीलिए कहावत कही जाती हैं कि - जगन्नाथ के भात को जगत पसारत हाथ !
भगवान जगन्नाथ स्वामी का समदर्शी स्वरुप आज़ भी जगन्नाथ मंदिर में दिखाई पड़ता हैं -।
इस रथयात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह हैं कि सबसे प्रथम बार जगन्नाथ पुरी के राजा जिन्हें गजपति की उपाधि से भी जाना जाता हैं वह इस दौरान साधारण वस्त्रों में पहुंचते हैं और सोने की मूठ वाली झाड़ूं से रथ और रथ मार्ग बुहारते हैं , यह परंपरा अब छोटे-बड़े शहरों में भी किया जाने लगा हैं । भगवान जगन्नाथ स्वामी का समदर्शी स्वरुप आज़ भी जगन्नाथ मंदिरों में दिखाई देता हैं । ईश्वर का अंश हर प्राणियों में विद्यमान हैं । इस करुणानिधान के लिए कोई ऊंच-नीच, छोटा-बड़ा, पवित्र-अपवित्र और धर्म और आध्यात्म के दायरे में हुआ नहीं हैं । हम-सबको इस रथयात्रा के माध्यम से यही सीख लेनी चाहिए ।
CG में गूंजा जय जगन्नाथ:राज्यपाल और CM ने लगाई सोने की झाड़ू, पुरी की तरह रायपुर में रथयात्रा
रायपुर
छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रामेन डेका और CM विष्णुदेव साय ने सोने की झाड़ू लगाई। वो महाप्रभु जगन्नाथ के लिए रास्ता साफ कर रहे थे। ओडिशा के जगन्नाथ पुरी की तरह रायपुर में भी रथयात्रा का आयोजन हो रहा है। शहर के गायत्री नगर स्थित मंदिर में VVIPs भव्य पूजा कार्यक्रम में शामिल हुए।
सोने की झाड़ू से रास्ता साफ करने की रस्म को छेरापहरा कहा जाता है। रायपुर के गायत्री नगर स्थित जगन्नाथ मंदिर में विधि-विधान के साथ महाप्रभु जगन्नाथ जी की रथ यात्रा निकाली गई। रथ यात्रा प्रारंभ करने से पूर्व भगवान की प्रतिमाओं को मंदिर से रथ तक लाया गया और मार्ग को सोने की झाड़ू से स्वच्छ किया गया।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने सभी प्रदेशवासियों को रथ यात्रा की बधाई देते हुए कहा कि यह पर्व ओडिशा के लिए जितना बड़ा उत्सव है, उतना ही बड़ा उत्सव छत्तीसगढ़ के लिए भी है। साय ने कहा कि भगवान जगन्नाथ किसानों के रक्षक हैं। उन्हीं की कृपा से वर्षा होती है, धान की बालियों में दूध भरता है और किसानों के घरों में समृद्धि आती है। मैं भगवान जगन्नाथ से प्रार्थना करता हूं कि इस वर्ष भी छत्तीसगढ़ में भरपूर फसल हो। उन्होंने कहा कि भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा से मेरी विनती है कि वे हम सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें और हमें शांति, समृद्धि एवं खुशहाली की ओर अग्रसर करें।
वृंदावन परिक्रमा मार्ग का नगर आयुक्त ने किया निरीक्षण:साफ-सफाई, जलभराव और अतिक्रमण पर दिए कड़े निर्देश,
मथुरा
मथुरा-वृंदावन नगर निगम के नगर आयुक्त जग प्रवेश ने वृंदावन जोन के संपूर्ण परिक्रमा मार्ग का स्थलीय निरीक्षण किया। उन्होंने श्रद्धालुओं की सुविधा और नगर की मूलभूत व्यवस्थाओं को मजबूत बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए।
नगर आयुक्त ने मार्ग की सफाई व्यवस्था का जायजा लिया। उन्होंने जलभराव की स्थिति और ठेले-खोमचे वालों की अव्यवस्था की जांच की। साथ ही अतिक्रमण की वास्तविक स्थिति का निरीक्षण किया।
उन्होंने कहा कि परिक्रमा मार्ग में उच्च स्तरीय साफ-सफाई अनिवार्य है। यह मार्ग लाखों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा है। जलभराव वाले स्थानों पर मशीनों से तत्काल पानी की निकासी के आदेश दिए गए।
सहायक नगर आयुक्त अनुज कौशिक को नियमित रूप से अतिक्रमण हटाने का अभियान चलाने के निर्देश मिले। ठेले-खोमचे वालों को केवल निर्धारित बेंडिंग जोन में ही लगाने की अनुमति दी गई। यातायात सुचारु रखने के लिए उन्हें प्रमुख मार्गों पर रोकने की मनाही की गई।
नगर निगम का लक्ष्य वृंदावन की सांस्कृतिक और धार्मिक गरिमा को बनाए रखना है। परिक्रमा मार्ग स्थानीय और विदेशी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है। इसलिए इसे स्वच्छ और सुव्यवस्थित रखना निगम की प्राथमिकता है।
खाना खाते समय करें इन नियमों का पालन.... प्रेमानंद जी महाराज
राधारानी के परम भक्त संत प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि भोजन केवल शरीर की भूख मिटाने का साधन नहीं, बल्कि यह एक आध्यात्मिक क्रिया है। भोजन को प्रसाद मानकर खाने से ना केवल शरीर स्वस्थ रहता है, बल्कि मन और आत्मा को भी शांति मिलती है। आइए जानते हैं खाना खाते समय किन नियमों का पालन करना चाहिए।
प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि भोजन शुरू करने से पहले भगवान का नाम लेना चाहिए और इसे प्रसाद मानकर ग्रहण करना चाहिए। इससे भोजन पवित्र होता है और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। भोजन से पहले प्रार्थना करने से आत्मा शुद्ध होती है। प्रेमानंद जी कहते हैं भोजन से पहले हाथ धोएं, साफ स्थान पर बैठें और शांत मन से भगवान को धन्यवाद दें।
प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, भोजन हमेशा भूख से कम खाना चाहिए। भोजन और पानी के साथ ही पेट में कुछ हिस्सा वायु के लिए छोड़ें। इससे अपच, पेट फूलना और एसिडिटी जैसी समस्याएं नहीं होती हैं। अधिक खाने से शरीर भारी और मन अशांत हो जाता है। हल्का भोजन आध्यात्मिक शक्ति बढ़ाता है और शरीर को स्वस्थ रखता है। महाराज जी कहते हैं कि भोजन सात्विक और हल्का होना चाहिए। प्याज, लहसुन, और तामसिक भोजन से बचें। खीर, पूड़ी, दाल और सात्विक सब्जियां खाएं। सात्विक भोजन मन को शांत और शरीर को हल्का रखता है।
प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि रात का भोजन शाम 6 बजे तक कर लें। देर रात भारी भोजन से नींद और पाचन पर बुरा असर पड़ता है। भोजन शांत वातावरण में, मौन रहकर करें। इस दौरान टीवी, मोबाइल या झगड़े से बचें। वास्तु शास्त्र के अनुसार, पूर्व या उत्तर दिशा में मुख करके खाना शुभ है। इससे सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर चार दिवसीय एडवांस मेडिटेशन प्रोग्राम आयोजित । ध्यान, ज्ञान और आत्मबोध के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं।
न्यूज़ जांजगीर-चांपा । गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर मड़वा कालोनी जांजगीर-चांपा में एडवांस मेडिटेशन प्रोग्राम का आयोजन किया जा रहा हैं । यह प्रोग्राम ज्ञान, ध्यान और मौन का एक अद्भुत संगम होगा जो कि दिनांक 3 से 6 जुलाई , 2025 तक धर्म-कर्म और आध्यात्मिक में रूचि रखने वालों के लिए अनुभवी प्रशिक्षक आर्ट ऑफ लिविंग प्रभात कुमार जी के मार्गदर्शन में किया जा रहा हैं । पवन कुमार अग्रवाल एवं शशिभूषण सोनी से चर्चा करते हुए बताया , जिसे प्रेस को साझा किया गया हैं ।
इस प्रोग्राम की कुछ मुख्य विशेषताएं -:
ध्यान और विश्राम - गहरा ध्यान और विश्राम के माध्यम से शारीरिक और मानसिक हीलिंग होती हैं ।
ऊर्जावान शरीर और प्रसन्न होता हैं मन - प्रोग्राम का मुख्य उद्देश्य शरीर को ऊर्जावान और मन को प्रसन्न बनाना हैं ।
ज्ञान और आत्म-बोध - प्रोग्राम में भाग लेने मात्र से ही ज्ञान और आत्म-बोध के माध्यम से स्वयं का बोध कराया जाएगा ।
प्रोग्राम में शामिल होने से सात्त्विक भोजन का प्रावधान हैं, और इससे जुड़ने वाले व्यक्ति लाभान्वित होते हैं ।
3 से 6 जुलाई 2025 को मड़वा कालोनी, जांजगीर-चांपा में कार्यक्रम आयोजित किया गया हैं, इसके लिए रिपोर्टिंग 2 जुलाई 2025 से शुरू हो जायेग
आर्ट ऑफ लिविंग के मुख्य प्रशिक्षक-प्रभात कुमार जी हैं । इसके लिए रजिस्ट्रेशन फीस रुपया 3500 रुपया निर्धारित किया गया हैं ।
आध्यात्मिक भूख को शांत करने के लिए व्यक्ति को ध्यान की आवश्यकता पड़ती हैं - श्रद्धेय रविशंकर जी उवाच ।
प्रश्नकर्ता - आदरणीय श्रीयुत गुरुदेव, जब मैं आर्ट ऑफ़ लिविंग एडवांस मेडिटेशन प्रोग्राम करता हूं तो मैं खोखला और खाली महसूस करता हूँ । लेकिन एक हफ़्ते बाद फिर से मैं पाता हूँ कि मैं इच्छाओं और परेशानियों से भरा हुआ हूँ। मैं हर समय खोखला और खाली कैसे रह सकता हूं ?
सदगुरु श्री-श्री आध्यात्मिक गुरु रविशंकर जी - यह पूछने जैसा ही हैं कि 'मैं इस जीवन में एक बार कैसे खा सकता हूं और हर दिन खाना न खाऊ ! ' आप जानते हैं यह बहुत उबाऊ काम हैं । हर दिन आपको खाना बनाना और खाना पड़ता हैं । अगर आप आज़ खाते हैं तो कल फिर आपको भूख लगती हैं । अगर आप सुबह खाते हैं, तो शाम को फिर आपको भूख लगती हैं। आप सिर्फ़ एक बार खाकर संतुष्ट नहीं हो सकते क्योंकि शरीर का अपना स्वभाव होता हैं। यही आपके मन के साथ भी हैं। एक बार मनोरंजन करना पर्याप्त नहीं हैं । क्या आप मेरी बात मानेंगे अगर मैं आपसे कहूं कि आपके जीवन में सिर्फ़ एक फ़िल्म देखना ही पर्याप्त हैं ? आपको बार-बार मनोरंजन की ज़रूरत होती हैं । शरीर को बार-बार पोषण की ज़रूरत होती हैं । भूख मिटाने के लिए हम खाना खाते हैं । प्यास बुझाने के लिए हम पानी पीते । थक जाने पर हम आराम करते हैं । इसी तरह अध्यात्म भी ऐसा ही हैं । आध्यात्मिक भूख को संतुष्ट करने के लिए हमें बार-बार ध्यान करने की ज़रूरत पड़ती हैं ।
SECR जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए चलाएगा स्पेशल ट्रेन:
रायपुर
जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए SECR गोंदिया से खुरदा के बीच 18 कोच वाली स्पेशल ट्रेन चलाएगा। पैसेंजर्स की सुविधाओं और होने वाली भीड़ को मैनेज करने के लिए यह फैसला लिया गया है। ये स्पेशल ट्रेन 26 जून से 7 जुलाई तक चलेगी।
इस दौरान श्रद्धालुओं को खुरदा रोड स्थित जगन्नाथ मंदिर के दर्शन के लिए सीधी ट्रेन सेवा उपलब्ध होगी। छत्तीसगढ़ के 9 स्टेशनों पर इस स्पेशल ट्रेन का स्टॉपेज हाेगा।
गोंदिया, डोंगरगढ़, राजनांदगांव, दुर्ग, रायपुर, मंदिर हसौद, महासमुंद, बागबहरा, खरीयार रोड, नवापारा रोड, हरीशंकर रोड, कांटाभंजी, टीटलागढ़, बढ़मल, बलांगीर, लुईसिंगा, डूंगरीपाली, बरपाली, बरगढ़ रोड, संबलपुर, रेराखोल, बोविंडा, केरेजंगा, अंगुल, तालचेर रोड, ढेंकनाल, भुवनेश्वर और खुरदा रोड।