संस्कृति

स्वामी श्री करपात्रीजी के संदेशों को वर्तमान में आत्मसात करने की आवश्यकता करपात्री जयंती पर विशेष

अरविन्द तिवारी मीडिया प्रभारी पुरी शंकराचार्य आश्रम  

जगन्नाथपुरी -

ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्द्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वतीजी महाराज के गुरू सर्वभूतहृदय यतिचक्रचूड़ामणि रामराज्य के प्रणेता धर्मसम्राट स्वामी करपात्रीजी महाराज का आज श्रावण शुक्ल द्वितीया 26 जुलाई शनिवार को 118 वाँ प्राकट्य दिवस है। आज का दिन धर्मसंघ पीठ परिषद , आदित्यवाहिनी – आनंदवाहिनी संगठन के लिये करपात्री जी महाराज को समर्पित है। आज के परिवेश में पूज्य करपात्री जी महाराज के संदेश हमें मार्ग प्रदान करते हैं। सनातन मानबिन्दुओं की रक्षा , गोरक्षा , राजनीति में शुचिता हेतु राम राज्य परिषद की स्थापना जैसे कार्यों के लिये उनका ब्यक्तित्व एवं दर्शन आत्मसात करने योग्य अनुकरणीय है। स्वामी करपात्रीजी भारत के एक सन्त , स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं राजनेता थे। दशनामी परम्परा के सन्यासी स्वामीजी का मूल नाम हरिनारायण ओझा था। दीक्षा के उपरान्त उनका नाम ‘हरिहरानन्द सरस्वती’ पड़ा किन्तु वे ‘करपात्री’ नाम से ही प्रसिद्ध थे। (कर = हाथ , पात्र = बर्तन, करपात्री = हाथ ही बर्तन हैं जिसके)। आप के कर कमलों में जितना भोजन आता आप उतना ही भोजन प्रसाद समझकर प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण कर लेते इसलिये आप करपात्री के नाम से विख्यात हुये। धर्मनियंत्रित , पक्षपातविहिन , शोषण विनिर्मुक्त शासनतंत्र की स्थापना के लिये आपने वर्ष 1948 में अखिल भारतीय रामराज्य परिषद नामक राजनैतिक दल का भी गठन किया था। धर्मशास्त्रों में इनकी अद्वितीय एवं अतुलनीय विद्वता को देखते हुये इन्हें ‘धर्मसम्राट’ की उपाधि प्रदान की गयी थी। आज जो रामराज्य सम्बन्धी विचार गांधी दर्शन तक में दिखाई देते हैं -

धर्म संघ , रामराज्य परिषद् , राममंदिर आन्दोलन , धर्म सापेक्ष राज्य आदि सभी के मूल में स्वामीजी ही हैं। स्वामी करपात्री का जन्म सम्वत् 1964 विक्रमी (सन् 1907 ईस्वी) में श्रावण मास शुक्ल पक्ष द्वितीया को उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के भटनी ग्राम में सनातनधर्मी सरयूपारीण ब्राह्मण रामनिधि ओझा एवं श्रीमती शिवरानी जी के आँगन में हुआ। बचपन में उनका नाम ‘हरिनारायण’ रखा गया। स्वामी जी तीन भाई थे –ज्येष्ठ भ्राता हरिहरप्रसाद , मँझले हरिशंकर और छोटे हरिनारायण आप स्वयं थे। मात्र 09 वर्ष की अल्पायु में प्रतापगढ़ के खंडवा गाँव के पं० रामसुचित की सुपुत्री महादेवी जी के साथ आपका विवाह संपन्न करा दिया गया किन्तु सोलह वर्ष की आयु में एक पुत्री के जन्म लेने के बाद आपने पूरे परिवार को रोता बिलखता छोड़ माता पिता को प्रणाम करके हमेशा के लिये गृहत्याग कर दिया। उसी वर्ष ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती से कांशी के दुर्गाकुण्ड में नैष्ठिक ब्रह्मचारी की दीक्षा लेकर दण्ड ग्रहण कर हरि नारायण से ‘ हरिहर चैतन्य ‘ बने। वे स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती के शिष्य थे। इन्होंने नैष्ठिक ब्रह्मचर्य श्री जीवन दत्त महाराज जी से , संस्कृत अध्ययन षड्दर्शनाचार्य पंडित स्वामी श्री विश्वेश्वराश्रम जी महाराज से , व्याकरण शास्त्र, दर्शन शास्त्र, भागवत, न्यायशास्त्र, वेदांत अध्ययन, श्री अचुत्मुनी जी महाराज से अध्ययन ग्रहण किया। श्री विद्या में दीक्षित होने पर धर्मसम्राट का नाम षोडशानन्द नाम भी पड़ा। सत्रह वर्ष की आयु से हिमालय गमन प्रारंभ कर अखण्ड साधना की और श्रीविद्या में दीक्षित होने पर धर्मसम्राट का नाम षोडशानन्द नाथ पड़ा।

केवल 24 वर्ष की आयु में परम तपस्वी 1008 श्री स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वतीजी महाराज से विधिवत दण्ड ग्रहण कर “अभिनवशंकर” के रूप में प्राकट्य हुआ। एक सुन्दर आश्रम की संरचना कर पूर्ण रूप से सन्यासी बन कर “परमहंस परिब्राजकाचार्य 1008 श्री स्वामी हरिहरानंद सरस्वती श्री करपात्री जी महाराज” कहलाये। करपात्रीजी का अधिकांश जीवन वाराणसी में ही बीता , वे अद्वैत दर्शन के अनुयायी एवं शिक्षक भी थे। उन्होने सम्पूर्ण भारत में पैदल यात्रायें करते हुये धर्म प्रचार के लिये सन 1940 ई० में “अखिल भारतीय धर्म संघ” की स्थापना की। धर्मसंघ का दायरा संकुचित नहीं , अत्यन्त विशाल है जो आज भी प्राणी मात्र में सुख-शांति के लिये प्रयत्नशील है। संघ की दृष्टि में समस्त जगत और उसके प्राणी सर्वेश्वर भगवान के अंश हैं या उसके ही रूप हैं। संघ का मानना है कि यदि मनुष्य स्वयं शान्त और सुखी रहना चाहता है तो औरों को भी शान्त और सुखी बनाने का प्रयत्न आवश्यक है। इसलिये धर्मसंघ के हर कार्य के आरम्भ और अन्त में “धर्म की जय हो , अधर्म का नाश हो , प्राणियों में सद्भावना हो , विश्व का कल्याण हो” ऐसे पवित्र जयकारे किये जाते हैं। इसमें अधार्मिकों के नाश के बजाय अधर्म के नाश की कामना की गयी है। 

गोरक्षा आन्दोलन –

इंदिरा गांधी के लिये उस समय चुनाव जीतना बहुत मुश्किल था | क्योंकि सबको पता था की करपात्री महाराज के पास वाक सिद्धि  (किसी की भविष्यवाणी को सच करने की शक्ति) थी।  इसलिये इंदिरा गाँधी ने उनकी शरण ली और उनके सामने प्रधानमंत्री बनने मंशा रखी , करपात्री जी महाराज के आशीर्वाद से इंदिरा गांधी चुनाव जीती। इंदिरा ग़ांधी ने उनसे वादा किया था चुनाव जीतने के बाद गाय के सारे कत्ल खाने बंद हो जायेगें जो अंग्रेजों के समय से चल रहे हैं। लेकिन इंदिरा गांधी मुसलमानों और कम्यूनिस्टों के दबाव में आकर अपने वादे से मुकर गयी थी। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री ने संतों इस मांग को ठुकरा दिया जिसमें संविधान में संशोधन करके देश में गौ वंश की हत्या पर पाबन्दी लगाने की मांग की गयी थी तो संतों ने 07 नवम्बर 1966 को संसद भवन के सामने धरना शुरू कर दिया। हिन्दू पंचांग के अनुसार उस दिन विक्रमी संवत 2012 कार्तिक शुक्ल की अष्टमी थी जिसे ‘गोपाष्टमी’ भी कहा जाता है। इस धरने में भारत साधु-समाज, सनातन धर्म, जैन धर्म आदि सभी भारतीय धार्मिक समुदायों ने इसमें बढ़-चढ़कर भाग लिया।

इस आन्दोलन में चारों शंकराचार्य तथा स्वामी करपात्री जी भी जुटे थे। पुरी के जगद्‍गुरु शंकराचार्य श्री स्वामी निरंजनदेव तीर्थ तथा महात्मा रामचन्द्र वीर के आमरण अनशन ने आन्दोलन में प्राण फूंक दिये थे। लेकिन इंदिरा गांधी ने उन निहत्थे और शांत संतों पर पुलिस के द्वारा गोली चलवा दी जिससे कई संत , महात्मा और गोभक्त काल कलवित हो गये । इस हत्याकांड से क्षुब्ध होकर तत्कालीन गृहमंत्री ‘गुलजारी लाल नंदा’ ने अपना त्याग पत्र दे दिया और इस कांड के लिये खुद सरकार को जिम्मेदार बताया था। लेकिन संत ‘राम चन्द्र वीर’ अनशन पर डटे रहे जो 166 दिनों के बाद उनकी मौत के बाद ही समाप्त हुआ था। राम चन्द्र वीर के इस अद्वितीय और इतने लम्बे अनशन ने दुनियाँ के सभी रिकार्ड तोड़ दिये है । यह दुनियाँ की पहली ऎसी घटना थी जिसमे एक हिन्दू संत ने गौ माता की रक्षा के लिये 166 दिनों तक भूखे रह कर अपना बलिदान दिया था। गौ रक्षा आंदोलन में गोली चालन से व्यथित करपात्री जी महाराज ने इंदिरा गाँधी को श्राप दिया कि जिस प्रकार आपने इन संतों की हत्या की है उसी प्रकार से आपकी और आपके वंशों की भी हत्या होगी जिसका परिणाम आप सभी जानते ही हैं।

ब्रह्मलीन - 

करपात्री जी महाराज माघ शुक्ल चतुर्दशी सम्वत 2038 (07 फरवरी 1982) को केदारघाट वाराणसी में स्वेच्छा से महाप्राण में विलीन हो गये। उनके निर्देशानुसार उनके नश्वर पार्थिव शरीर का केदारघाट स्थित श्री गंगा महारानी को पावन गोद में जल समाधि दी गई। आपने अपने साहित्य सृजन के माध्यम से समाज में जो चेतना जागृत की है वह हमेशा अविस्मरणीय रहेगी। आपने वेदार्थ पारिजात , रामायण मीमांसा , विचार पीयूष , पूँजीवाद , समाजवाद , मार्क्सवाद जैसे अनेकों ग्रँथ लिखे। आपके ग्रन्थों में भारतीय परम्परा का बड़ा ही अद्भुत व प्रामाणिक अनुभव प्राप्त होता है। आपने सदैव ही विशुद्ध भारतीय दर्शन को बड़ी दृढ़ता से प्रस्तुत किया है। आपके लिखित ग्रंथों से यह प्रेरणा मिलती है कि लोकतंत्र मे राष्ट्र को समृद्धशाली बनाने में अध्यात्मवाद आवश्यकता है। आपने हिन्दू धर्म की बहुत सेवा की। आपका नाम विश्व के इतिहास में युगपुरुष के रूप में सदैव अमर रहेगा। स्वामीजी का प्राकट्य दिवस मनाना तभी सफल हो सकता है जब हम उनके बताये मार्गों पर चलने की प्रेरणा लें और भव्य राष्ट्र की संरचना में अपनी सहभागिता निश्चित करें।

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