संस्कृति

भक्तों को दर्शन देने के लिए द्वार-द्वार पहुंचे जग के नाथ जगन्नाथ स्वामी ! भगवान श्रीजगन्नाथ रथयात्रा श्रद्धा ,भक्ति और आस्था पूर्वक निकाली गई

जांजगीर-चांपा । हिंदु पंचाग के अनुसार संपूर्ण देश-भर में आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया ( इस बार दिनांक 27 जून 2025 से 5 जुलाई ) के दिन विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथयात्रा आरंभ हो रही हैं । 9 दिनों तक चलने वाली यह पारंपरिक रथयात्रा भारतवर्ष के विभिन्न शहरों की तरह कोसां,कांसा एवं कंचन की नगरी चांपा में आस्था, श्रद्धा और भक्ति पूर्वक निकाली गई ।
यह वह महान पर्व हैं , जहां भगवान जगन्नाथ स्वामी दर्शन देने के लिए असंख्य श्रद्धालु भक्तों के द्वार-द्वार तक पहुंचते हैं और रथ पर सवार होकर नर-नारी, बच्चें और बड़े-बुजुर्ग भगवान के रथ को खींचकर स्वयं के जीवन को धन्य मानते हैं । ढोल , गाजे-बाजे और शंखनाद करते हुए भक्त गण इन रथों को ढकेलते हुए आगे बढ़ाते जाते हैं। कहा जाता है कि जिन व्यक्तियों को रथ को धक्का देने का सौभाग्य मिलता हैं वह भवसागर के पार पहुंच जाता हैं । आठ दिनों तक भगवान जगन्नाथ स्वामी भाई-बहन के साथ अपने मौसी के अस्थायी घर पर पहुंच आराम करते हैं , उड़िया भाषा में आड़प दर्शन कहा जाता हैं। आषाढ़ मास के दशमी तिथि को यह रथ पुनः अपने स्थायी मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं । गौरतलब हैं कि रथयात्रा का यह पर्व हर साल आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को ही मनाया जाता हैं, शुक्रवार को सायंकाल 5 बजें एक रथ सोनार पारा और ब्राह्मण पारा स्थित जगन्नाथ बड़े मठ मंदिर से तो दुसरी रथ पाड़ी घाट स्थित जगन्नाथ मंदिर से निकली गई । यह यात्रा लोहार पारा, कदंब चौक, समलेश्वरी देवस्थान, देवांगन पारा होते हुए नवनिर्मित एक रथ जयश्री ज्वेलर्स तो दूसरी रथ नारायण प्रसाद सोनी के सदर बाजार चांपा में रुकेंगे ।

मालपुआ की खूब बिक्री देर-रात तक होती रही ।

भगवान श्री जगन्नाथ की रथयात्रा हर्षोल्लास पूर्वक निकाली गई । दोनों देवस्थान से सुसज्जित रथ पर भगवान जगन्नाथ स्वामी के तीनों विग्रहों को सजा-धजा धर बैठाया गया और विश्राम स्थल रात तक पहुंचा । रथयात्रा के दिन चांपा नगर के विभिन्न चौक-चौराहे पर मालपुआ की खूब बिक्री रही । श्रद्धालु भक्त भगवान जगन्नाथ स्वामी का दर्शन-पूजन करने के बाद मालपुआ, गजामुग ,नारियल फल-फूल को अपने घर ले जाकर मिल-बांटकर खाते हैं । मालपुआ से लोग भगवान जगन्नाथ स्वामी जी को भोग लगाते हैं और बांटते भी हैं । श्रीमति सत्यप्रभा स्वर्णकार, नेहा -अविनाश अग्रवाल, श्रीमति ममता पाण्डेय, आंकाक्षा तिवारी, विमलेश तिवारी और सुश्री नैंसी पाण्डेय को पूर्व पार्षद श्रीमति शशिप्रभा सोनी ने मालपुआ महाप्रसाद के रुप में भिजवाईं ।

पुरी की तर्ज पर छोटे शहरों में परंपरा का निर्वाहन किया जा रहा हैं ।

 साहित्यकार शशिभूषण सोनी ने बताया कि जगन्नाथ पुरी में रथयात्रा की शुरुआत 12 वीं सदी में हुई थी । यह मंदिर भारतवर्ष के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक हैं । इस मंदिर की सबसे बड़ी प्रधानता समता की भावना हैं । मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए आये हुए भक्तों में यहां जाति-पाति का कोई महत्व नहीं हैं, ब्राम्हण के साथ शुद्र भी यहां पर पंक्ति में बैठकर मैंने भोजन करते हुए देखा हैं । इसीलिए कहावत कही जाती हैं कि - जगन्नाथ के भात को जगत पसारत हाथ ! 

भगवान जगन्नाथ स्वामी का समदर्शी स्वरुप आज़ भी जगन्नाथ मंदिर में दिखाई पड़ता हैं -। 


इस रथयात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह हैं कि सबसे प्रथम बार जगन्नाथ पुरी के राजा जिन्हें गजपति की उपाधि से भी जाना जाता हैं वह इस दौरान साधारण वस्त्रों में पहुंचते हैं और सोने की मूठ वाली झाड़ूं से रथ और रथ मार्ग बुहारते हैं , यह परंपरा अब छोटे-बड़े शहरों में भी किया जाने लगा हैं । भगवान जगन्नाथ स्वामी का समदर्शी स्वरुप आज़ भी जगन्नाथ मंदिरों में दिखाई देता हैं । ईश्वर का अंश हर प्राणियों में विद्यमान हैं । इस करुणानिधान के लिए कोई ऊंच-नीच, छोटा-बड़ा, पवित्र-अपवित्र और धर्म और आध्यात्म के दायरे में हुआ नहीं हैं । हम-सबको इस रथयात्रा के माध्यम से यही सीख लेनी चाहिए ।

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