27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के दिन नागपुर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का गठन हुआ था, इसके संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार थे जो पहले कांग्रेस में थे पर हिंदुत्व की सोच से प्रभावित हो संघ की स्थापना की। संघ अपने को सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी संगठन कहता है पर यह पंजीकृत संस्था नहीं है। संघ इस साल अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है। इस सफर में उस पर कुल चार बार प्रतिबन्ध लगा, पहली बार आजादी से कुछ ही पहले जनवरी 1947 को और तीन बार प्रतिबन्ध आजादी के बाद लगाया गया है। 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी की नृशंस हत्या के बाद, 1975 को देश में आपातकाल लागू होने के समय, और 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद।
21अक्टूबर 1951 को इस संस्था से राजनैतिक पार्टी के रूप में भारतीय जनसंघ का उदय हुआ जिसके संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी, बलराज मधोक और दीनदयाल उपाध्याय थे। यह दल राजनैतिक रूप से प्रभावी नहीं था पर अपनी विचारधारा का प्रचार प्रसार अनवरत कर रहा था।
देश की राजनीति ने 1974 में करवट ली, केंद्र में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी, जिससे तब के बिखरे विपक्ष की टकराहट तीव्र होती जा रही थी। गुजरात से शुरू हुए छात्र आंदोलन ने बिहार को भी चपेट में ले लिया ऐसे में समाजवादी पार्टीयों ने जयप्रकाश नारायण को अपना चेहरा बनाकर केंद्र सरकार से लोहा लेने का निश्चय किया, जेपी ने वामपंथियों और दक्षिणपंथियों को भी इसमें शामिल होने का न्यौता दिया ताकि विपक्ष की ताकत बढ़े और एक स्वर में सरकार का पुरजोर विरोध किया जा सके। देश में पक्ष, विपक्ष की टकराहट कटुता में बदल गई थी और इसी दरमियान इंदिरा सरकार ने 25 जून 1975 को आंतरिक अशांति के चलते देश में आपातकाल लगा दिया, लोकतांत्रिक अधिकारों को स्थगित कर दिया गया था, उपद्रवी विपक्षियों को मीसा एक्ट के तहत जेलों में बंद किया गया। हालात सामान्य होता देख सरकार ने 21 मार्च 1977 को 21 महीने बाद देश से आपातकाल हटा लिया और सभी राजनैतिक बंदियों को रिहा करते हुए देश में नए आमचुनाव का रास्ता साफ किया। इसी बीच भारतीय जनसंघ का विलय 23 जनवरी 1977 को जनता पार्टी में हो गया। देश में 16 से 20 मार्च 1977 को छठी लोकसभा हेतु चुनाव हुए और जनता ने इंदिरा गांधी के आपातकाल लागू करने के निर्णय के विरोध में जनादेश जनता पार्टी के पक्ष में दिया। जनता पार्टी ने 295 सीटें जीत कर सरकार बनाई और 154 सीटों के साथ कांग्रेस विपक्ष में बैठी, गौरतलब है कि इंदिरा जी स्वयं रायबरेली से और संजय गांधी अमेठी से अपने चुनाव हार गए थे। 81 वर्ष की आयु में पुराने कांग्रेसी रहे मोरारजी देसाई देश के सबसे उम्रदराज प्रधानमंत्री बने। उनकी सरकार में जनसंघ के कोटे से तीन केबिनेट मंत्री बने। अटल बिहारी वाजपेई विदेश मंत्री, लालकृष्ण आडवाणी सूचना एवं प्रसारण मंत्री तथा राजनारायण स्वास्थ्य मंत्री पद पर आसीन हुए। आपसी खींचतान के चलते मोरारजी देसाई को इस्तीफा देना पड़ा और एक अन्य पूर्व कांग्रेसी चौधरी चरण सिंह नए प्रधानमंत्री बने। इस बीच दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर सरकार में फिर खींचतान बढ़ी, पुराने जनसंघी अलग हो गए,अंततः जनता पार्टी की सरकार 15 जुलाई 1979 को गिर गई और देश में 03 से 06 जनवरी 1980 को नए चुनाव संपन्न हुए और इंदिरा कांग्रेस ने 353 सीटों के साथ सरकार बनाई। इस चुनाव में संघ की किसी राजनैतिक शाखा ने चुनाव नहीं लड़ा था यद्यपि दक्षिणपंथी राजनीति के प्रतिनिधि के तौर पर शिवसेना और अखिल भारतीय राम राज्य परिषद ने चुनाव लड़ा पर दोनों का खाता ही नहीं खुला।
06 अप्रैल 1980 को आरएसएस से नई राजनैतिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी का जन्म हुआ। अटल बिहारी वाजपेई, लालकृष्ण आडवाणी, राम जेठमलानी, विजया राजे सिंधिया, सिकंदर बख्त इसके संस्थापक सदस्य थे और वाजपेई जी इसके पहले अध्यक्ष थे। पार्टी ने 1984 में लोकसभा का चुनाव लड़ा पर उसे केवल दो सीटें मिली एक गुजरात से दूसरी आंध्र प्रदेश से। तमाम बड़े चेहरे चुनाव हार गए थे। पार्टी ने रणनीति बदली तथा उग्र हिंदुत्व की राजनीति को अपनाया और आडवाणी को नया राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया। यह सारी कवायद पर्दे के पीछे से संघ कर रहा था। 1989 के चुनाव में इस रणनीति का लाभ मिलना भाजपा को शुरू हो गया और वह दो सीटों से सीधे 85 सीटों पर पहुंच किंग मेकर की भूमिका में आ गई। भाजपा ने वी पी सिंह सरकार को बाहर से समर्थन दे अपनी पैठ बनाने में जुट गई। जनता दल सरकार भी वी पी सिंह और चंद्रशेखर सिंह के रूप में दो पीएम देने के बाद भी कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई। देश फिर 1991 में चुनाव में चला गया। राजीव गांधी जी की दुखद हत्या के चलते कांग्रेस की सरकार बनी तथा पी वी नरसिंहराव देश के पीएम बने। संघ की जमीनी तैयारियों के चलते भाजपा 85 से 120 सीटों पर पहुंच प्रमुख विपक्षी दल बन गई। 1996 के आम चुनाव में कांग्रेस सरकार की अलोकप्रियता के चलते भाजपा 161 सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी, कांग्रेस को 140 सीटों पर संतोष करना पड़ा। किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला और वाजपई जी ने अल्पमत सरकार बनाई जो बहुमत सिद्ध नहीं कर पाई तथा एच डी देवगौड़ा के नेतृत्व में यूनाइटेड फ्रंट ने साझा सरकार बनाई, इसी सरकार में मतभेद के चलते देवेगौड़ा के बदले इंद्र कुमार गुजराल को पीएम बनाया गया पर सरकार ने कार्यकाल पूरा नहीं किया। देश फिर 1998 में चुनाव में गया। 182 सीटों के साथ भाजपा ने वाजपेई जी के नेतृत्व में फिर गठबन्धन की सरकार बनाई पर तेरह माह बाद जयललिता के समर्थन वापसी से सरकार गिर गई और देश 1999 में फिर मध्यावधि चुनाव में चला गया। भाजपा को 182 सीटें ही मिली और NDA की सामान्य बहुमत वाली वाजपेई सरकार सत्ता में आ गई। इस सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया, संघ की जमीनी मेहनत से भाजपा ने यह मुकाम हासिल किया। इस अवधि तक भाजपा पूरी तरह से संघ द्वारा संचालित रही।
1999 - 2004 वाली वाजपेई सरकार के दरमियान ही भाजपा और संघ के रिश्तों में खिंचाव आने शुरू हो गए थे। वाजपेई जी भी यद्यपि कठोर अनुशासित संघ प्रचारक थे पर वह अपनी उदार छवि के प्रति भी सजग रहते थे, जबकि संघ ने आडवाणी के नेतृत्व में कट्टर हिंदुत्व एजेंडे पर काम कर भाजपा को इस मुकाम तक पहुंचाया था। यहीं से गठबन्धन सरकार चला रहे वाजपेई जी और अपने एजेंडों पर अडिग संघ में दूरियां बढ़ने लगीं। पहला उदाहरण है, 2001में संघ द्वारा नामित भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जना कृष्णामूर्ति को प्रधानमंत्री वाजपेई से मतभेदों के चलते इस्तीफा देना पड़ा और संघ को मजबूरन वाजपेई जी के करीबी वैंकैया नायडू को भाजपा अध्यक्ष के रूप में स्वीकारना पड़ा। दूसरा उदाहरण 2002 के गुजरात दंगों से उपजे हालात, एक ओर जहां पीएम गुजरात के तात्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का राजधर्म का पालन करने में विफल होने पर इस्तीफा चाहते थे वहीं संघ परिवार पूरी तरह से मोदी के साथ था और उसने आडवाणी जी के माध्यम से पीएम को साफ संदेश दिया कि मोदी का त्यागपत्र नहीं होगा। इस मसले पर पार्टी दो मतों में विभाजित भी दिखी। इन्हीं अंदरूनी टकराहटों के चलते भाजपा 2004 के चुनाव में फील गुड और शाइनिंग इंडिया के जुमलों के बाद भी हारकर सत्ता से बाहर हो गई। 2004 - 2014 तक केंद्र में कांग्रेस नीत डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में गठबन्धन सरकार रही। दस वर्षों तक विपक्ष में रहने के बावजूद संघ ने सत्ता हेतु अपनी जमीनी तैयारियों को जारी रखा और इसके लिए कई प्रयोग भी ऊपर से नीचे तक किए। इसी रणनीति के तहत सितम्बर 2013 में गोवा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को एनडीए का पीएम उम्मीदवार घोषित किया। मई 2014 के आमचुनाव में मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने प्रचंड अलोकप्रिय यूपीए सरकार को 282 सीटें लेकर बुरी तरह से परास्त किया। पहली बार बीजेपी ने स्वयं के दम पर बहुमत के आंकड़े को पार किया इस तरह से आरएसएस ने पूर्ण बहुमत की भगवा सरकार के बरसों पुराने अपने सपने को पूरा किया। 2019 के आमचुनाव में भाजपा ने पिछले रिकॉर्ड को भी पार करते हुए 303 सीटें जीत पुनः सरकार बनाई। यहां तक मोदी और संघ के संबंध सामान्य रूप से चलते रहे। मोदी सरकार ने संघ के सारे एजेंडों को आगे बढ़ाते हुए पूरे करने की दिशा में चल रही थी। राम मंदिर निर्माण, धारा 370 का उन्मूलन, समान नागरिक संहिता, भारतीय इतिहास को नए सिरे से गढ़ना, शैक्षणिक संस्थाओं को अपनी विचारधारा अनुसार बनाना उनके प्रमुख एजेंडे थे। राम मंदिर निर्माण और धारा 370 पर काम कर चुके। भारतीय इतिहास और शैक्षणिक संस्थाओं पर काम अनवरत जारी है तथा यूसीसी पर भी सरकार अग्रसर है अर्थात मोदी सरकार संघ के सारे प्रमुख एजेंडों को पूरा कर रही है। परंतु संघ और मोदी के रिश्तों में अजीब सा ठंडापन साफ दिखता है। ध्यान रखें कि मोदी ने गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए संघ से एक निश्चित दूरी बनाए रखी थी, वह संघ को वहां कोई तवज्जो नहीं देते थे। केशुभाई पटेल, शंकर सिंह वाघेला, संजय जोशी, सुरेश मेहता, कांसीराम राणा, प्रवीण तोगड़िया, हरेन पांड्या, गोवर्धन झड़ापिया जैसे तपे हुए संघीयों की उन्होंने घोर उपेक्षा कर सबको राजनैतिक ठिकाने लगा दिया था। बतौर मुख्यमंत्री मोदी ने गुजरात में संघ के कार्यकर्ता के रूप में नहीं बल्कि कॉर्पोरेट के ढंग से शासन चलाया था। केंद्र में भी बतौर कॉर्पोरेट सीईओ ही शासन चला रहे। एक तरफ भले ही वह संघ के एजेंडों को पूरा कर रहे पर दूरी बनाकर, उसे निर्णय लेने की प्रक्रिया से दूर रखकर। भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा ने तो बीजेपी को संघ की जरूरत ही नहीं है तक कहा है, स्वाभाविक है नड्डा अपने से तो ऐसा बयान नहीं दे सकते। इन्हीं ठंडे गर्म रिश्तों के बीच अबकी बार 350 पार के नारे के साथ भाजपा 2024 के आमचुनाव में गई और बहुमत से दूर रहते हुए 240 सीटों पर सिमट गई। अपने राजनैतिक सफर में पहली बार मोदी जी को बिना बहुमत की गठबंधन आश्रित सरकार चलानी पड़ रही है। विपक्ष भी इस बार बेहद मजबूत है और सरकार को लगातार हर मुद्दे पर तगड़े से घेरकर परेशान कर रहा है। ऐसे में मोदी जी को मजबूरीवश संघ के शरण में जाना पड़ रहा। अपने ग्यारह वर्षों के कार्यकाल में पहली बार उन्हें संघ मुख्यालय नागपुर जाना पड़ा। संघ के व्यक्ति को उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार घोषित करना पड़ा, पहली बार लाल किले की प्राचीर से संघ को संबोधित करना पड़ा। यह सारी कवायद अपने को राजनैतिक रूप से सुरक्षित रखने की है।
मेरा मानना है कि भागवत जी और मोदी जी के संबंध जितने भी उतार चढ़ाव वाले रहें पर सरकार पर दुष्प्रभाव तक नहीं जायेंगे। संघ को सत्ता की ताकत का एहसास भी है और आवश्यकता भी है , ऐसे में सरसरी तौर पर नूराकुश्ती जारी रहेगी पर सरकार, सत्ता को खतरे में नहीं डाला जाएगा। संघ भलीभांति जानता है कि उसके विपक्षी के तौर पर सामने राहुल गांधी हैं जो सत्ता की नहीं बल्कि विचारधारा की लड़ाई लड़ रहे और वह सत्ता में आते हैं तो केवल और केवल संघ को सबसे बड़ा नुकसान होगा, बिना किसी जवाबदेही के सत्ता पर उसकी यह पकड़ लंबे समय तक छूट जाएगी। उसे यह भी ज्ञात है कि मोदी जी अपनी लोकप्रियता के ढलान पर हैं और उनका पद पर बने रहना अन्ततः संघ के लिए आत्मघाती हो सकता है इसलिए वह सारे बदलाव क्रमशः अपनी पकड़ मजबूत करते हुए ले रहा है। उपराष्ट्रपति पद पर अपने स्वयं सेवक की नियुक्ति के फौरन बाद ही बहुप्रतीक्षित भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर भी 2029 को ध्यान में रखते हुए अपने अनुयाई को लाएगा। इसके बाद वह संगठन में आमूलचूल परिवर्तन करेगा। केंद्रीय सरकार में भी कायापलट की जायेगी। चार से पांच पर्ची वाले मुख्यमंत्रियों को निश्चित ही हटाया जाएगा, और अंत में मोदी जी को पीएम पद से रिटायर किया जाएगा।
संघ की कार्यप्रणाली किसी एक को सर्वशक्तिशाली बनाने की नहीं है बल्कि वह भविष्य को ध्यान में रखते हुए हमेशा विकल्प तैयार रखता है। अटल बिहारी वाजपेई, लालकृष्ण आडवाणी का विकल्प भी उसी ने दिया है तो उसने मोदी और शाह का विकल्प भी तैयार किया हुआ है। संघ की पहली और एकमात्र प्राथमिकता स्वयं का अस्तित्व सुरक्षित रखने की है, शेष मुद्दे गौण हैं। उसे भलीभांति समझ है कि देश के वर्तमान राजनैतिक परिवेश में उसके पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं और उसे इसी लोकसभा में ही मोदी का विकल्प देना होगा अन्यथा उसे ही इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। हां यह भी सच है कि मोदी जी पर 75 वर्ष पर पद त्याग का नियम लागू नहीं होगा। उन्हें 2026 के मध्य में पद छोड़ने हेतु तैयार किया जाएगा।
आशय यह है कि, संघ और भाजपा के रिश्ते सत्ता हासिल करने तक तो काफी मधुर रहते हैं पर सत्ता प्राप्ति होते ही हितों और अहम के टकराव के चलते रिश्ते कटुता की ओर मुड़ जाते हैं। चूंकि संघ में किसी व्यक्ति का कद संगठन से बड़ा रखने का प्रचलन नहीं है, इस वजह से संघ की उपयोगिता, महत्ता और फैसले ही सर्वोपरि होते हैं।
परमजीत बॉबी सलूजा,
नया रायपुर, छत्तीसगढ़।