राज्य

बस्तर दशहरा, आधी रात निभाई गई निशा जात्रा की रस्म:

जगदलपुर

बस्तर दशहरे की अहम रस्मों में शामिल निशा जात्रा विधान शारदीय नवरात्रि की महाष्टमी की देर रात निभाया गया। इस दौरान 12 बकरों की बलि देकर करीब 618 साल पुरानी परंपरा निभाई गई। बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव ने आधी रात मां खमेश्वरी की पूजा-अर्चना की।

उन्होंने देवी से राज्य की खुशहाली और बुरी प्रेत आत्माओं से रक्षा की कामना की। मान्यता है कि निशा जात्रा की शुरुआत करीब 618 साल पहले हुई थी। प्राचीन समय में राजा-महाराजा राज्य को बुरी शक्तियों से बचाने के लिए तांत्रिक विधियों से यह पूजा करवाते थे।

कमलचंद्र भंजदेव के मुताबिक, अष्टमी पर हवन के बाद देवी को प्रसन्न करने के लिए यह पूजा गुप्त रूप से की जाती थी। इसमें केवल राजपरिवार के सदस्य शामिल होते थे। अब लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासनिक अधिकारी और जनप्रतिनिधि भी इस रस्म में शामिल होते हैं।

परंपरा के अनुसार, निशा जात्रा विधान में 12 बकरों की बलि दी गई। इसके बाद मिट्टी के 12 पात्रों में रक्त भरकर पूजा-अर्चना की गई। वहीं आज मावली परघाव की रस्म होगी।

स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस रस्म के जरिए देवी को प्रसन्न कर राज्य की बुरी शक्तियों से रक्षा की प्रार्थना की जाती है। बस्तर के इतिहास और परंपराओं में निशा जात्रा का विशेष महत्व है। समय के साथ इस रस्म में बदलाव आया है। पहले इस विधान में सैकड़ों भैंसों की बलि देने की परंपरा थी, लेकिन अब 12 बकरों की बलि देकर रस्म निभाई जाती है।

निशा जात्रा के बाद अब बस्तर दशहरे की एक और अहम रस्म मावली परघाव की तैयारी है। दंतेवाड़ा से माता की डोली और छत्र जगदलपुर पहुंच गए हैं। आज शाम राजपरिवार के सदस्य माता की डोली और छत्र का स्वागत करेंगे। इस दौरान परंपरागत पूजा-अर्चना कर माता का सम्मानपूर्वक स्वागत किया जाएगा।

माता की डोली और छत्र जिस रास्ते से लाए जाएंगे, वहां पुलिस ने दोनों ओर बैरिकेडिंग की है। इससे भीड़ को नियंत्रित करने और धार्मिक आयोजन को व्यवस्थित तरीके से संपन्न कराने में मदद मिलेगी।

राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव के मुताबिक, मावली परघाव के दौरान सबसे पहले माता को सलामी दी जाएगी और उन्हें विराजमान कराया जाएगा। इसके बाद जिया बाबा के जरिए राजपरिवार को माता की डोली आने की सूचना दी जाएगी।

उन्होंने बताया कि इस अवसर पर जोगी उठाई की रस्म भी निभाई जाती है। बस्तर के देवी-देवताओं के देव विग्रहों के साथ राजपरिवार के सदस्य आयोजन स्थल पर पहुंचते हैं और माता का सम्मानपूर्वक स्वागत करते हैं। इसके बाद राजपरिवार के सदस्य खुद माता की डोली उठाकर राजमहल लेकर आते हैं।

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