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नेपाल की सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम: पांच अमूर्त विरासतें राष्ट्रीय सूची में शामिल सरकार बोली— संस्कृति की रक्षा और भावी पीढ़ियों तक उसका संरक्षण हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता

काठमांडू नेपाल सरकार ने देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित और सुरक्षित रखने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। संस्कृति, पर्यटन एवं नागरिक उड्डयन मंत्रालय के सचिव प्रसाद निरौला ने कहा कि सरकार नेपाल की मौलिक अमूर्त सांस्कृतिक विरासतों के संरक्षण, संवर्धन और उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

सोमवार को आयोजित अमूर्त सांस्कृतिक विरासत दिवस–२०८३ एवं राष्ट्रीय सूचीकरण सम्मान समारोह को संबोधित करते हुए सचिव निरौला ने कहा कि नेपाल संयुक्त राष्ट्र की सांस्कृतिक संस्था के संरक्षण संबंधी अंतरराष्ट्रीय समझौते के अनुरूप अपनी सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण का कार्य लगातार कर रहा है।सोमवार को आयोजित अमूर्त सांस्कृतिक विरासत दिवस–२०८३ एवं राष्ट्रीय सूचीकरण सम्मान समारोह को संबोधित करते हुए सचिव निरौला ने कहा कि नेपाल संयुक्त राष्ट्र की सांस्कृतिक संस्था के संरक्षण संबंधी अंतरराष्ट्रीय समझौते के अनुरूप अपनी सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण का कार्य लगातार कर रहा है।

उन्होंने बताया कि सरकार ने अमूर्त सांस्कृतिक विरासतों की पहचान, सूचीकरण, दस्तावेजीकरण और संरक्षण के लिए व्यवस्थित प्रक्रिया शुरू की है। इसी उद्देश्य से प्रत्येक वर्ष आषाढ़ १ को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत दिवस के रूप में मनाया जाता है।

सचिव निरौला ने जानकारी दी कि आर्थिक वर्ष २०८२–८३ से राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूचीकरण प्रणाली लागू की गई है। इसके तहत विभिन्न समुदायों से प्राप्त प्रस्तावों तथा विशेषज्ञ समिति की अनुशंसा के आधार पर सांस्कृतिक धरोहरों को राष्ट्रीय सूची में शामिल किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि हाल ही में चयनित १२ सांस्कृतिक परंपराओं में से पाँच महत्वपूर्ण विरासतों को राष्ट्रीय सूची में स्थान दिया गया है। इनमें नेवार समुदाय का 'योमरी पुन्हि', माझी समुदाय की 'कोशी पूजा' तथा मगर समुदाय की 'भूमे पूजा' सहित कई महत्वपूर्ण सांस्कृतिक परंपराएं शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि नेपाल के विभिन्न समुदायों में सदियों से प्रचलित लोक परंपराएं, धार्मिक अनुष्ठान, जात्राएं और सांस्कृतिक मान्यताएं आज भी जीवंत हैं। इनकी पहचान, अभिलेखीकरण और संरक्षण समय की आवश्यकता है।

सचिव निरौला ने कहा कि आधुनिक जीवनशैली के बढ़ते प्रभाव के कारण अनेक पारंपरिक सांस्कृतिक परंपराएं विलुप्त होने के खतरे का सामना कर रही हैं। उन्होंने कहा कि "ये धरोहरें हमारी सभ्यता, इतिहास और सांस्कृतिक पहचान की अमूल्य विरासत हैं। इन्हें सुरक्षित रखना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हम सभी का साझा दायित्व है।"
उन्होंने बताया कि देश के विभिन्न क्षेत्रों में अभी भी अनेक ऐसी सांस्कृतिक धरोहरें हैं, जिन्हें राष्ट्रीय सूची में शामिल किया जाना बाकी है। उनकी खोज, अध्ययन, अभिलेखीकरण और संरक्षण का कार्य निरंतर जारी रहेगा।

सरकार आदिवासी जनजाति आयोग, स्थानीय निकायों, सांस्कृतिक संस्थाओं और संबंधित संगठनों के सहयोग से इस अभियान को और अधिक प्रभावी बनाएगी।
कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रीय सूची में शामिल सांस्कृतिक विरासतों से जुड़े समुदायों के प्रतिनिधियों को सम्मानित भी किया गया। सचिव निरौला ने उन्हें बधाई देते हुए विश्वास जताया कि भविष्य में और भी अधिक सांस्कृतिक धरोहरों को राष्ट्रीय सूची में शामिल किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि मौलिक संस्कृति का संरक्षण केवल सरकार का दायित्व नहीं, बल्कि समाज, स्थानीय समुदायों, शोधकर्ताओं और जनसंचार माध्यमों की भी समान जिम्मेदारी है। यदि हमारी परंपराएं, संस्कार और सांस्कृतिक धरोहरें जीवित रहेंगी, तभी हमारी राष्ट्रीय पहचान भी सुरक्षित और सशक्त बनी रहेगी।

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