राजधानी

हितग्राही को पहले पीएम आवास का 'पात्र' बताया, तीन किस्तें जारी कर घर बनवाया और अब उसी पर एफआईआर की तलवार सिस्टम ने कहा बनाओ, सिस्टम ने पैसा दिया... अब सिस्टम ही कह रहा तुम दोषी हो ?

बलौदाबाजार

 प्रधानमंत्री आवास योजना से जुड़ा एक मामला इन दिनों जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है। ग्राम दतान (प.) के निवासी गोविन्द रात्रे ने आरोप लगाया है कि जिन अधिकारियों और कर्मचारियों ने स्वयं उन्हें पीएम आवास योजना का पात्र हितग्राही बताया, उनके खाते में किस्तें जारी कराईं, निर्माण की प्रत्येक प्रक्रिया पूरी कराई और मकान बनवाया, वही अब पूरी जिम्मेदारी उन पर डालते हुए राशि वसूली और एफआईआर की कार्रवाई की बात कर रहे हैं।


मामले ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। आखिर यदि कोई व्यक्ति पात्र नहीं था तो उसका चयन किसने किया? उसके नाम से पोर्टल में प्रविष्टि किसने की? बैंक खाते में पहली, दूसरी और तीसरी किस्त किसके अनुमोदन से जारी हुई? जियो टैगिंग, तकनीकी सत्यापन और निर्माण का निरीक्षण किसने किया? यदि शिकायत पहले से थी तो निर्माण पूरा होने से पहले कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
गोविन्द रात्रे का कहना है कि उन्होंने शुरुआत में ही संबंधित कर्मचारियों को बता दिया था कि उनकी पत्नी को पहले प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ मिल चुका है। इसके बावजूद उन्हें आश्वस्त किया गया कि उनके नाम से भी आवास स्वीकृत हुआ है और शीघ्र मकान निर्माण नहीं करने पर योजना निरस्त हो सकती है। शासन के कर्मचारियों के भरोसे उन्होंने रिश्तेदारों से लाखों रुपये उधार लेकर मकान का निर्माण शुरू किया।
निर्माण के दौरान संबंधित कर्मचारियों ने निरीक्षण किया, फोटो लिए और आगे की प्रक्रिया पूरी कराई। इसके बाद एक-एक कर तीनों किस्तें भी जारी होती रहीं। हितग्राही का कहना है कि यदि किसी स्तर पर कोई त्रुटि थी, तो प्रशासन ने उसी समय निर्माण रुकवाने के बजाय पूरा मकान बनने तक इंतजार क्यों किया?


अब जब मकान बन चुका है और परिवार कर्ज के बोझ तले दबा है, तब अचानक हितग्राही को दोषी बताने की कार्रवाई ने पूरे प्रकरण को विवादों में ला दिया है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या किसी सामान्य ग्रामीण के पास स्वयं अपना नाम योजना में दर्ज कराने, राशि स्वीकृत कराने या जियो टैगिंग कराने का अधिकार होता है? यदि नहीं, तो फिर पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया का उत्तरदायित्व किसका है?
यह मामला अब केवल एक हितग्राही तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि शासन की योजनाओं के क्रियान्वयन में जवाबदेही और पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े कर रहा है। यदि जांच में प्रशासनिक लापरवाही सामने आती है, तो जिम्मेदारी केवल लाभार्थी की नहीं बल्कि उन अधिकारियों और कर्मचारियों की भी तय होनी चाहिए जिन्होंने पूरी प्रक्रिया को मंजूरी दी।


फिलहाल इस पूरे मामले में सभी की निगाहें जिला प्रशासन की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं। निष्पक्ष जांच से ही स्पष्ट होगा कि गलती वास्तव में किस स्तर पर हुई और जवाबदेही किसकी बनती है।

Leave Your Comment

Click to reload image