गोविंद राम ब्यूरो रिपोर्ट बलौदा बाजार:-
आज़ादी के 78 वर्ष बाद भी अगर कोई बुजुर्ग सिर्फ सच बोलने की वजह से समाज से बहिष्कृत कर दिया जाए, तो यह लोकतांत्रिक भारत की सबसे बड़ी विडम्बना और शर्मनाक तस्वीर है। ऐसा ही शर्मनाक मामला सामने आया है बलौदाबाजार जिले की पलारी तहसील अंतर्गत ग्राम दतान(खैरा) से, जहाँ 90 वर्षीय कचरू केंवट को केवल गवाह बनने की वजह से अपने पूरे परिवार सहित समाज से बेदखल कर दिया गया है। 90 वर्षीय कचरू केंवट ने उपरोक्त सभी बातें जनदर्शन आवेदन में गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि भूमि विवाद में गवाही देने पर ग्राम दतान(खैरा) के कुछ प्रभावशाली समाजजन ने उन्हें और उनके परिवार को रोटी-बेटी, खान-पान और सामाजिक कार्यक्रमों से पूरी तरह बहिष्कृत कर दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि लाखों रुपये वसूलने के बावजूद समाज प्रमुखों ने बहिष्कार खत्म नहीं किया और विवाह योग्य नाती के रिश्ते भी तुड़वाए जा रहे हैं। कचरू के अनुसार पुलिस की लापरवाही से आरोपियों पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।
गवाही बनी अभिशाप
कचरू केंवट ने वर्ष 2024-25 में नायब तहसीलदार पलारी के समक्ष युग बाई बनाम श्याम बाई के बीच चल रहे जमीन विवाद में युग बाई के पक्ष में गवाही दी थी। यह सच बोलना ही उनके जीवन का सबसे बड़ा अपराध बन गया। गवाही से नाराज़ विरोधी पक्ष की महिलाओं श्याम बाई, समौतीन बाई और रामौतिन बाई ने कथित रूप से ग्राम समाज के प्रमुखों को भड़का दिया। इसके बाद समाज के कुछ प्रभावशाली लोग—फागु केंवट, बैसाखू केंवट, रिखी केंवट, लखन केंवट, काशी केंवट और अमृत केंवट सहित अन्य ने बैठक कर कचरू केंवट और उनके पूरे परिवार को समाज से पूर्णतः बहिष्कृत करने का निर्णय ले लिया।
रोटी-बेटी का संबंध तोड़ा, हजारों की वसूली फिर भी बहिष्कार जारी
कचरू केंवट और उनके परिवार को न केवल ग्राम समाज के सभी सामाजिक कार्यक्रमों, खान-पान और बातचीत से दूर कर दिया गया, बल्कि समाज में पुनः शामिल करने के नाम पर 69-70 हजार रुपये की अवैध वसूली भी की गई। प्रत्येक बैठकों में 10 से 15 हजार रुपये सामाजिक दंड स्वरुप बड़ी रकम ली गई, फिर भी परिवार को समाज में वापस नहीं लिया गया। हालात इतने बदतर हो गए हैं कि कचरू केंवट के विवाह योग्य नाती के लिए आने वाले रिश्तों को भी समाज के लोग कानाफुंसी कर तोड़ रहे हैं। कचरू केवट ने यह भी आरोप लगाया है की उनके नाती के शादी विवाह रश्म के एवज में सामाजिक मज़बूरी का फायदा उठाते हुए उन पर पुनः आर्थिक दंड लगाने के फिराक में उनके विरोध और सामाजिक लोग आतुर है। कथित सामाजिक ठेकेदार पुलिस प्रशासन कों भी यह कहते हुए गुमराह में रखा है कि कचरू केवट कों समाज में शामिल कर लिया गया है जबकि धरातल में उनका शोषण बदस्तूर जारी है।
पुलिस की बेरुखी, प्रशासन की चुप्पी
इस अमानवीय व्यवहार के खिलाफ कचरू केंवट ने 4 अगस्त 2025 को थाना लवन में लिखित शिकायत दर्ज कराई, लेकिन पुलिस ने आज तक कोई कार्रवाई नहीं की। उल्टा जब उन्होंने प्रगति की जानकारी लेने के लिए थाने का रुख किया तो वहां के मुंशी और जांच अधिकारी ने उन्हें टालते हुए कहा—जाओ, तुम्हारा कुछ नहीं होगा। न्याय की आस में दर-दर भटक रहे 90 वर्षीय इस बुजुर्ग ने अब जिला कलेक्टर और एसपी को आवेदन देकर दोषियों पर कठोर कार्रवाई की गुहार लगाई है। मगर अब तक प्रशासनिक मशीनरी की चुप्पी उन्हें और उनके परिवार को मानसिक पीड़ा और असुरक्षा के गहरे अंधेरे में धकेल रही है।
लोकतंत्र के लिए कलंक
भारत के संविधान ने हर नागरिक को गरिमामय जीवन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और समानता का अधिकार दिया है। लेकिन ग्राम दतान (खैरा) में जो हो रहा है, वह न केवल इन अधिकारों का खुलेआम उल्लंघन है, बल्कि लोकतंत्र के लिए एक गहरा धब्बा है। जिस देश ने जातीय भेदभाव, छुआछूत और सामाजिक बहिष्कार को अपराध घोषित किया, उसी देश में 90 साल के एक सीनियर नागरिक को केवल सच बोलने के लिए सामाजिक मौत दी जा रही है।
प्रशासन और न्यायपालिका पर सवाल
कचरू केंवट की पीड़ा आज पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा करती है। पुलिस की लापरवाही, समाज के ठेकेदारों का आतंक और प्रशासन की निष्क्रियता मिलकर यह साबित कर रही है कि आज भी ग्रामीण भारत में संविधान की ताकत कुछ लोगों की मनमर्जी के आगे बेबस है। सवाल यह है कि जब एक 90 वर्षीय बुजुर्ग न्याय की गुहार लगाता है और कोई सुनवाई नहीं होती, तो लोकतंत्र का क्या मूल्य रह जाता है?
समाज को आईना दिखाता यह मामला
कचरू केंवट की लड़ाई केवल उनकी व्यक्तिगत पीड़ा नहीं है, बल्कि यह पूरे देश के लिए चेतावनी है कि संविधान में दर्ज अधिकार सिर्फ किताबों तक सीमित न रह जाएं। आज जरूरत है कि जिला प्रशासन, पुलिस और न्यायपालिका तत्काल संज्ञान ले, दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करे और इस अमानवीय बहिष्कार को समाप्त कर लोकतंत्र की गरिमा को बचाए।यह घटना साबित करती है कि जब व्यवस्था सच बोलने वालों को संरक्षण नहीं देती, तो समाज में भय, अन्याय और असमानता की जड़ें और गहरी होती जाती हैं। कचरू केंवट की आवाज़ आज पूरे सिस्टम से यही सवाल पूछ रही है—क्या सच बोलना अब भी अपराध है?