राजधानी

सहकारिता के जनक के गाँव में धान घोटाला – किसानों के हक पर डाका सहकारी समिति कोसमंदी 1765 क्विंटल धान की कमी के जिले में टॉप पर

गोविंद राम  ब्यूरो रिपोर्ट
बलौदाबाजार।


जिला सहकारी केंद्रीय बैंक रायपुर (छ.ग.) के गौरवशाली संस्थापक और सहकारिता आंदोलन के जनक स्व. पं. वामन बलीराम लाखे का जन्म 17 सितम्बर 1872 को हुआ था। स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम पंक्ति के सेनानी पं. लाखे जी ने सहकारिता आंदोलन को किसानों की सेवा का आधार बनाकर वर्ष 1913 में सहकारी बैंक की स्थापना की थी। उनका सपना था किसानों के दुख-दर्द को दूर करना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना। 1945 में उन्होंने बलौदाबाजार में किसान राइस मिल की भी स्थापना की थी।

लेकिन आज दुःखद विडंबना यह है कि जिस गाँव कोसमंदी से लाखे साहब निकले थे, वही गाँव और उसकी सहकारी समिति अब किसानों की पीठ में छुरा भोंकने का काम कर रही है। इस वर्ष की धान खरीदी में जिले का सबसे बड़ा 1765 क्विंटल धान शॉर्टज कोसमंदी उपार्जन केंद्र से सामने आया है। यही नहीं, इसी शाखा के अंतर्गत आने वाले छेरकापुर केंद्र से 526 क्विंटल और सरसेनी केंद्र से भी सैकड़ों क्विंटल धान गायब हो गया है।
किसानों का दर्द छलक पड़ा उनका कहना है कि जिन्होंने सहकारिता की मशाल जलाई, आज उन्हीं के गाँव में किसान लूटे जा रहे हैं। यह सिर्फ धान चोरी नहीं, बल्कि लाखे साहब की आत्मा का अपमान है।

प्रशासन ने खरीदी प्रभारी को बर्खास्त कर खानापूर्ति तो कर दी, लेकिन किसानों का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा। क्षेत्र के लोग साफ कह रहे हैं यह बर्खास्तगी महज छलावा है। असली दोषियों यानी संरक्षण देने वाले शाखा प्रभारी और जिम्मेदार अफसरों पर जब तक सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक किसानों के साथ अन्याय जारी रहेगा। शाखा प्रबंधक एवं सुपरवाइजर की भी जिम्मेदारी रहता है कि अपने बैंक के अधीन आने वाले समस्त उपार्जन केंन्द्रो की नियमित निगरानी करें। और इस निगरानी के बदले शाखा प्रबंधक कों प्रति क्विंटल एक निश्चित राशि भी प्रदान की जाती है। लेकिन ज़ब धान शॉर्टज या गबन होता है तों सिर्फ खरीदी प्रभारी कों ही बली का बकरा बनाया जाता है और शाखा प्रबंधक बच जाता है।अब बड़ा सवाल यह है कि  क्या लाखे साहब की जयंती के मौके पर उनकी विरासत को दागदार कर भ्रष्टाचारियों को संरक्षण दिया जाएगा? क्या सहकारिता आंदोलन का सपना इसी तरह किसानों की पीठ पर घोटाले का बोझ बनकर टूटेगा? और क्या प्रशासन इस बार दोषियों को बचाकर किसानों के विश्वास से फिर खिलवाड़ करेगा?

आज लाखे साहब का जन्मदिन है, लेकिन इस बार उनकी जयंती श्रद्धा से ज्यादा सवालों और आक्रोश की चिंगारी लिए खड़ी है। किसान और जनप्रतिनिधि एक स्वर में कह रहे हैं यदि दोषियों को कठोर सजा नहीं दी गई तो यह अपमान सहकारिता आंदोलन ही नहीं, पूरे छत्तीसगढ़ की आत्मा पर घाव होगा। लाखे साहब ने किसानों को सहकारिता का हथियार दिया था, आज उसी हथियार को उनके गाँव में भ्रष्टाचार की ढाल बनाकर किसानों का खून चूसा जा रहा है।

उपपंजीयक से पत्र प्राप्त हुआ था जिसके परिपालन में कार्रवाही करते हुए प्राधिकृत अधकारियों द्वारा दोषियों कों सेवा से पृथक किया गया है।
धीरेन्द्र सिंह वर्मा, शाखा प्रबंधक कोसमंदी

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