पहाड़ी कोरवा जनजाति में महिला उत्पीड़न और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास
भारत की विविधतापूर्ण सांस्कृतिक विरासत में आदिवासी समुदायों का विशेष स्थान है। इन्हीं समुदायों में से एक है पहाड़ी कोरवा जनजाति, जिसे भारत सरकार ने अत्यंत संवेदनशील और पिछड़ी जनजातियों की श्रेणी में रखा है। यह जनजाति मुख्य रूप से छत्तीसगढ के जशपुर, सरगुजा, बलरामपुर और कोरिया जिलों के दुर्गम पहाड़ी एवं वन क्षेत्रों में निवास करती है।
पहाड़ी कोरवा समाज अपनी विशिष्ट परंपराओं और प्रकृति आधारित जीवन शैली के लिए जाना जाता है, लेकिन सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन के कारण यहां की महिलाओं को अनेक प्रकार की कठिनाइयों और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।
पहाड़ी कोरवा महिलाओं की स्थिति
पहाड़ी कोरवा समाज में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे परिवार के भरण-पोषण में पुरुषों के साथ बराबरी से काम करती हैं। जंगल से लकड़ी, महुआ, तेंदूपत्ता और अन्य वन उपज एकत्रित करना, खेतों में काम करना और परिवार की देखभाल करना उनकी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा है।
इसके बावजूद सामाजिक संरचना और संसाधनों की कमी के कारण महिलाएं अक्सर शिक्षा, स्वास्थ्य और अधिकारों से वंचित रह जाती हैं।
महिला उत्पीड़न की प्रमुख समस्याएं
1. घरेलू हिंसा और सामाजिक दबाव
कई क्षेत्रों में शराबखोरी और आर्थिक अभाव के कारण घरेलू हिंसा की घटनाएं सामने आती हैं। महिलाएं कई बार सामाजिक दबाव के कारण शिकायत दर्ज नहीं करा पातीं।
2. शिक्षा की कमी
पहाड़ी कोरवा समुदाय में महिला साक्षरता दर बहुत कम है। दूरस्थ गांवों और संसाधनों की कमी के कारण लड़कियों की पढ़ाई अक्सर प्रारंभिक स्तर पर ही रुक जाती है।
3. आर्थिक शोषण
वन उपज एकत्रित करने के बावजूद महिलाओं को उसका उचित मूल्य नहीं मिल पाता। कई बार बिचौलियों द्वारा उनका आर्थिक शोषण किया जाता है।
4. स्वास्थ्य और पोषण की समस्या
दूरदराज के पहाड़ी इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण गर्भवती महिलाओं और बच्चों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता। कुपोषण भी एक गंभीर समस्या है।
5. सामाजिक जागरूकता की कमी
कानूनी अधिकारों और सरकारी योजनाओं की जानकारी न होने के कारण महिलाएं अपने अधिकारों का उपयोग नहीं कर पातीं।
मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास
पिछले कुछ वर्षों में केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ कई सामाजिक संगठनों द्वारा पहाड़ी कोरवा समुदाय को मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं।
1. शिक्षा को बढ़ावा
सरकार द्वारा आश्रम शालाओं, छात्रावासों और विशेष छात्रवृत्ति योजनाओं के माध्यम से आदिवासी बच्चों विशेषकर लड़कियों को शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
2. महिला स्व-सहायता समूह
ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए स्वयं सहायता समूह बनाए जा रहे हैं। इससे महिलाएं छोटे-छोटे व्यवसाय और आजीविका गतिविधियों से जुड़ रही हैं।
3. स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार
सरकार द्वारा मोबाइल हेल्थ यूनिट, आंगनबाड़ी और मातृ-शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रमों के माध्यम से महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य सुधार पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
4. जागरूकता अभियान
सामाजिक संस्थाएं और प्रशासनिक अधिकारी गांव-गांव जाकर महिलाओं को उनके अधिकारों, शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक कर रहे हैं।
5. आजीविका और कौशल विकास
वन उपज के उचित मूल्य और कौशल प्रशिक्षण के माध्यम से महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
समाज और प्रशासन की जिम्मेदारी
पहाड़ी कोरवा महिलाओं को सम्मानजनक जीवन देने के लिए केवल सरकारी योजनाएं ही पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए समाज, प्रशासन और सामाजिक संगठनों को मिलकर काम करना होगा।
महिला शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार, आर्थिक अवसरों की उपलब्धता और सामाजिक जागरूकता ही वह माध्यम हैं जिनसे इन महिलाओं को मुख्यधारा से जोड़ा जा सकता है।
निष्कर्ष
पहाड़ी कोरवा जनजाति की महिलाएं आज भी अनेक चुनौतियों से जूझ रही हैं, लेकिन सकारात्मक पहल और निरंतर प्रयासों से उनकी स्थिति में सुधार की उम्मीद दिखाई दे रही है। आवश्यकता इस बात की है कि विकास की धारा इन दूरस्थ पहाड़ी गांवों तक पहुंचे और वहां की महिलाओं को भी समान अवसर और सम्मानजनक जीवन मिल सके।
जब पहाड़ी कोरवा महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक सशक्तिकरण के अवसर मिलेंगे, तभी वास्तविक अर्थों में आदिवासी समाज का समग्र विकास संभव होगा।
डाॅ. जतिंदरपाल सिंह