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सीमेंट संयंत्रों की कमाई के आगे जनता की जान सस्ती! रिसदा बाईपास बना सरकारी लापरवाही का जीता-जागता सबूत

300 मीटर सड़क पर विकास की खुली पोल, तीन दिन से गड्ढे में फंसा कोयले से लदा ट्रेलर; 10 दिन पहले की मरम्मत भी फेल, छह सीमेंट संयंत्रों और प्रशासन की जवाबदेही पर सवाल

जिला मुख्यालय से महज 5 किलोमीटर दूर सड़क पर कीचड़ का कब्जा, स्कूली बच्चे, मरीज और राहगीर परेशान; ग्रामीणों ने दी आंदोलन और चक्काजाम की चेतावनी

 गोविंद राम ब्यूरो चीफ.

बलौदाबाजार। विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच कितना बड़ा फासला है, इसकी तस्वीर बलौदाबाजार-सिमगा मार्ग के रिसदा बाईपास चौक से ग्राम रिसदा के बीच साफ दिखाई दे रही है। जिला मुख्यालय से महज पांच किलोमीटर दूर स्थित लगभग 300 मीटर का मुख्य मार्ग बदहाली की ऐसी तस्वीर बन चुका है, जहां सड़क कम और कीचड़ भरा दलदल ज्यादा नजर आता है। हालात इतने गंभीर हैं कि कोयले से लदा भारी ट्रेलर क्रमांक सीजी 13 बीसी 6329 पिछले तीन दिनों से सड़क के गहरे गड्ढे में फंसा हुआ है। इसके बावजूद सड़क की स्थायी मरम्मत और यातायात व्यवस्था को लेकर जिम्मेदार विभागों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।

विडंबना देखिए—जिस जिले में बड़े-बड़े औद्योगिक संयंत्र संचालित हैं, जहां से भारी वाहनों की लगातार आवाजाही होती है, उसी जिले में आम लोगों को सुरक्षित आवागमन के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। सवाल यह है कि आखिर इस बदहाल सड़क की जिम्मेदारी किसकी है? क्या जनता को इसी तरह गड्ढों, कीचड़ और दुर्घटना के खतरे के बीच सफर करने के लिए छोड़ दिया गया है?

10 दिन पहले की मरम्मत का दावा, भारी वाहनों ने फिर खोल दी पोल

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, करीब 10 दिन पहले इस मार्ग पर रोड रोलर चलाकर गड्ढों की लेवलिंग की गई थी। लेकिन यह सुधार ज्यादा दिन तक टिक नहीं पाया। ग्रामीणों का आरोप है कि भारी और क्षमता से अधिक भार लेकर गुजरने वाले वाहनों की लगातार आवाजाही से सड़क फिर उखड़ गई और जगह-जगह गहरे गड्ढे बन गए।

यदि मरम्मत के कुछ ही दिनों बाद सड़क दोबारा बदहाल हो जाती है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि काम किस गुणवत्ता से कराया गया? क्या मरम्मत से पहले भारी वाहनों के दबाव का आकलन किया गया था? क्या सड़क सुधार के नाम पर केवल खानापूर्ति की गई, या फिर निर्माण कार्य की गुणवत्ता की निगरानी में लापरवाही बरती गई?

इन सवालों का जवाब संबंधित विभाग को देना चाहिए। क्योंकि सरकारी धन खर्च होने के बावजूद यदि जनता को सुरक्षित सड़क नहीं मिलती, तो जवाबदेही तय होना जरूरी है।

छह सीमेंट संयंत्र, भारी वाहनों की आवाजाही और सड़क की बदहाली—जवाबदेही कौन लेगा?

रिसदा क्षेत्र और आसपास लगभग छह सीमेंट संयंत्रों के संचालन तथा भारी औद्योगिक वाहनों की आवाजाही के बीच इस मार्ग की स्थिति गंभीर चिंता का विषय बन गई है। ग्रामीणों का कहना है कि औद्योगिक गतिविधियों से जुड़े वाहनों का लगातार दबाव सड़क की हालत बिगाड़ रहा है।

स्थानीय लोगों ने यह भी सवाल उठाया है कि जब औद्योगिक क्षेत्र में बड़े अधिकारियों और संयंत्र प्रबंधन से जुड़े लोगों का नियमित आना-जाना इसी मार्ग से होता है, तो सड़क की दुर्दशा पर प्रभावी पहल क्यों नहीं दिखाई दे रही?

उद्योगों की आर्थिक गतिविधियां महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आम नागरिकों की सुरक्षा और बुनियादी सुविधाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। यदि भारी वाहनों के कारण सड़क बार-बार क्षतिग्रस्त हो रही है, तो संबंधित विभागों और संयंत्र प्रबंधनों को मिलकर स्थायी समाधान तलाशना चाहिए। सड़क सुधार, भारी वाहनों के भार की जांच और नियमित रखरखाव को लेकर ठोस कदम उठाने की जरूरत है।

स्कूल बस से एम्बुलेंस तक के लिए खतरा, कभी भी हो सकता है बड़ा हादसा

सड़क पर फैली कीचड़ और गहरे गड्ढों के कारण दोपहिया वाहन चालकों, साइकिल सवारों और पैदल चलने वालों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीणों के मुताबिक, सुबह के समय स्कूली बच्चों को लेकर गुजरने वाली बसों और आपातकालीन मरीजों को ले जाने वाले वाहनों के लिए भी यह मार्ग मुश्किल पैदा कर रहा है।

तीन दिनों से फंसे भारी ट्रेलर के कारण रास्ता और संकरा हो जाने से दुर्घटना की आशंका और बढ़ गई है। ऐसी स्थिति में यदि किसी मरीज को समय पर अस्पताल पहुंचाना हो या स्कूली बच्चों से भरे वाहन को सुरक्षित निकालना हो, तो परेशानी गंभीर रूप ले सकती है।

क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही प्रशासन की नींद खुलेगी? यह सवाल अब ग्रामीणों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। प्रशासन को किसी अप्रिय घटना का इंतजार करने के बजाय तत्काल सुरक्षा और मरम्मत की व्यवस्था करनी चाहिए।

जिला मुख्यालय के इतने करीब बदहाली, फिर भी निगरानी पर सवाल

रिसदा बाईपास की यह स्थिति केवल सड़क की समस्या नहीं, बल्कि सरकारी निगरानी और जवाबदेही की भी परीक्षा है। जिला मुख्यालय से कुछ ही दूरी पर यदि एक प्रमुख मार्ग की हालत इतनी खराब हो जाए कि भारी वाहन कई दिनों तक फंसा रहे, तो यह संबंधित विभागों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

सड़क की मरम्मत के बाद उसकी स्थिति की निगरानी किसने की? भारी वाहनों की आवाजाही को नियंत्रित करने के लिए क्या कदम उठाए गए? सड़क को बार-बार क्षति पहुंचने से रोकने के लिए कोई स्थायी योजना क्यों नहीं बनाई गई? इन सवालों पर प्रशासन और संबंधित विभागों को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

विकास का वास्तविक अर्थ केवल निर्माण कार्यों की घोषणा या मरम्मत कराना नहीं, बल्कि जनता को टिकाऊ सड़क और सुरक्षित आवागमन उपलब्ध कराना है। रिसदा बाईपास की बदहाली इस कसौटी पर व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करती है।

ग्रामीणों का अल्टीमेटम—समाधान नहीं तो सड़क पर उतरेगा जनआक्रोश

लगातार परेशानी झेल रहे ग्राम रिसदा के ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ रही है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि सड़क के गड्ढों को जल्द नहीं भरा गया, कीचड़ की समस्या दूर नहीं की गई और मार्ग को स्थायी रूप से दुरुस्त करने की पहल नहीं हुई, तो वे आंदोलन और चक्काजाम करने के लिए मजबूर होंगे।

ग्रामीणों की मांग है कि पहले तत्काल राहत के उपाय किए जाएं, फंसे हुए ट्रेलर के कारण पैदा हुई यातायात संबंधी परेशानी दूर की जाए और इसके बाद सड़क की गुणवत्ता के अनुरूप स्थायी मरम्मत कराई जाए। साथ ही, सड़क बार-बार खराब होने के कारणों की जांच कर जिम्मेदारी भी तय की जाए।

अब देखना यह है कि प्रशासन ग्रामीणों की चेतावनी को गंभीरता से लेकर मौके पर कार्रवाई करता है या फिर जनता को आश्वासन के भरोसे ही छोड़ दिया जाता है।

वर्जन: जल्द मौके पर भेजा जाएगा अधिकारी

इस मामले में लोक निर्माण विभाग के कार्यपालन अभियंता अनुज शर्मा ने कहा, “मैं जल्दी ही एसडीओ को मौके पर भेजकर पूरी जानकारी लेता हूं। मार्ग में जहां-जहां ज्यादा समस्या है, उन्हें तत्काल दूर करने के लिए निर्देशित कर देता हूं।”

अब सवालों के घेरे में व्यवस्था

कार्यपालन अभियंता ने मौके पर अधिकारी भेजने और समस्या दूर कराने की बात कही है। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि निरीक्षण के बाद वास्तव में सड़क की मरम्मत कब शुरू होती है और समस्या का स्थायी समाधान कब तक निकलता है।

300 मीटर सड़क, तीन दिन से फंसा ट्रेलर और 10 दिन में बेअसर हुई मरम्मत—रिसदा बाईपास की यह तस्वीर प्रशासन के सामने सीधा सवाल है: जनता को सुरक्षित सड़क कब मिलेगी?

जनता को आश्वासन नहीं, काम चाहिए। यदि सड़क की हालत सुधारने में और देरी होती है, तो ग्रामीणों का आक्रोश बढ़ना तय है। अब जिम्मेदार विभागों की परीक्षा है कि वे समय रहते कार्रवाई करते हैं या फिर यह बदहाल मार्ग सरकारी व्यवस्था की लापरवाही का प्रतीक बना रहता है।

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