संस्कृति
ऐतिहासिक जगन्नाथ मठ मंदिर में गीता जयंती एवं मोक्षदा एकादशी महोत्सव
न्यूज़ जांजगीर-चांपा ।
गीता जयंती सेवा संस्थान समिति , चांपा द्वारा स्मृति शेष राज अग्रवाल की पुण्य-तिथि पर स्थानीय जगन्नाथ मठ मंदिर में गीता जयंती एवं मोक्षदा एकादशी का भव्य समारोह आयोजित किया गया
कार्यक्रम में मुख्य अभ्यागत के रूप में मठाधीश लाल दास महंत जी महाराज उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता मानस मर्मज्ञ एवं भागवत भूषण पंडित दिनेश दुबे ने की । विशिष्ट अतिथि के रूप में पूर्व नपाध्यक्ष चांपा राजेश कुमार अग्रवाल, पंडित कृष्णा द्विवेदी एवं सेवानिवृत्त प्राचार्य पंडित हरिहर प्रसाद तिवारी मंचस्थ थे।
गीता जयंती एवं मोक्षदा एकादशी समारोह का शुभांरभ श्रीमद्भगवद्गीता , श्रीजगन्नाथ स्वामी , दक्षिण मुखी हनुमान जी तथा स्मृति शेष राज अग्रवाल के तैल चित्र पर तिलक-चंदन लगाकर , दीप जलाकर और पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। इसके पश्चात संस्थान के सदस्यों ने बारी-बारी से मंचस्थ विभूतियों का तिलक, कौशेय वस्त्र एवं पुष्प माला से सम्मान किया । जगन्नाथ मठ मंदिर के आचार्य पंडित कृष्ण धर मिश्रा ,ब्रजेद्र गौरहा, डॉ द्विवेदी जी को भी गीता सेवा संस्थान की ओर से कौशेय वस्त्र ,श्रीफल भेंटकर सम्मानित किया गया ।
प्रत्येक हिंदू को प्रतिदिन गीता के 4 श्लोक पढ़ना चाहिए
इस अवसर पर मठाधीश लालदास महंत जी महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि गीता जयंती एवं मोक्षदा एकादशी का यह पावन आयोजन स्मृति शेष राज अग्रवाल जी की प्रेरणा और उनकी गीता के प्रति आस्था का प्रतीक हैं । उन्होंने गीता के सार एवं कर्मयोग की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए प्रत्येक हिदू को प्रतिदिन श्रीमद्भागवत गीता के 4 श्लोक का पाठ करना चाहिए । गीता कर्म बोध कराती हैं । उन्होंने इसे मानव जीवन को दिशा प्रदान करने वाला ग्रंथ बताते हुए कहा कि सभी धर्मों को त्याग दो,हम उसी के टुकड़े हैं , श्रीकृष्ण जी ने कहा हैं कि मैं तुमको संसार से मुक्त कर दुंगा । कृष्णा द्विवेदी जी ने कहा कि संसार के सभी दर्शनों में श्रीमद्भागवत गीता का स्थान सर्वोपरि हैं।इस पवित्र ग्रंथ का श्लोक हम लोग क्यों याद नहीं करते। गीता भगवान की महिमा महिम मूर्ति हैं । मुख्य वक्ता भागवताचार्य श्रद्धेय दिनेश कुमार दुबे ने मोक्षदा एकादशी के महत्व को रेखांकित करते हुए इसे आत्मिक शुद्धि , आत्मीक शांति और मोक्ष प्राप्ति का माध्यम बताया । उन्होंने कहा कि महाकवि मिल्टन नामक एक व्यक्ति ने अपनी तमाम काव्य शक्तियां ईश्वर को अर्पण कर दिया था। ईश्वर का एक अंग मानकर ईश्वरीय प्रेरणा से गीता का पाठ करना चाहिए। उन्होंने स्मृति शेष राज अग्रवाल जी के धार्मिक और सामाजिक योगदान को नमन करते हुए कहा कि यह आयोजन उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाए रखता हैं ।
राज अग्रवाल के पुण्य कार्यों और मोक्ष गति को स्मरण किया गया
वयोवृद्ध. हरिहर प्रसाद तिवारी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए राज अग्रवाल जी के पुण्य कार्यों और मोक्ष गति को स्मरण किया । उन्होंने गीता और मोक्षदा एकादशी की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि गीता न केवल धर्म का प्रतीक हैं , बल्कि जीवन में सद्गुणों और नैतिकता का पालन करने का मार्गदर्शक भी हैं । उन्होंने यह भी कहा कि जो व्यक्ति गीता को समझ लेता हैं वह समय के महत्व को समझ लेता हैं । राजेश अग्रवाल ने कहा कि गीता सब ग्रंथों का सार हैं ।
गीता एक समझ हैं जो किसी व्यक्ति के जीवन में समझदारी लाती हैं
साहित्यकार शशिभूषण सोनी ने सारगर्भित उद्बोधन में गीता को सर्वशास्त्रमयी बताया। रजनीश अग्रवाल ने गीता को अपने आप में जीवन जीने की शैली करार दिया। उन्होंने कहा कि गीता एक समझ हैं जो हर व्यक्ति में समझदारी लाती हैं। मेरे पिता विभिन्न दिक्कतों का सामना करते हुए व्यापार करते रहे और आप लोगों के संगत से धार्मिक कार्यों से जुड़े। मेरे पिता जीवनपर्यंत संघर्ष करते रहे और गीता जयंती के दिन इसी जगन्नाथ मंदिर में देह त्याग कर दी । पंडित रामकिशोर शुक्ला ने गीता को सारे ग्रंथों के ज्ञान का खजाना कहा । पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष तथा समिति के अध्यक्ष राजेश अग्रवाल , रजनीश अग्रवाल, प्रधान सचिव रामकिशोर शुक्ला, शशिभूषण सोनी व डॉ रविन्द्र द्विवेदी ने स्मृति शेष राज अग्रवाल जी को नमन करते हुए गीता जयंती एवं मोक्षदा एकादशी पर विचार व्यक्त किये साथ ही गीता की महिमा एवं मोक्षदा एकादशी व्रत के महात्म्य पर सारगर्भित उद्बोधन दिया गया ।
श्रीमद भागवत गीता पुस्तक की प्रतियां भेट की गई
इस अवसर पर पार्षद नागेन्द्र गुप्ता द्वारा प्रदत्त श्रीमद्भ भागवद्गीता पुस्तक की प्रतियां श्रद्धालुओं के बीच वितरित की गईं ।
समारोह के अंत में रजनीश अग्रवाल परिवार की ओर से सभी उपस्थित श्रद्धालुओं को काजू-किशमिश के पैकेट, बूंदी मिठाई एवं स्वल्पाहार का पैकेट वितरित किया गया । कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. रविंद्र द्विवेदी ने किया एवं आभार प्रदर्शन अनिल कुमार सोनी ने किया । इस अवसर पर कीर्ति शेष राज अग्रवाल की सहधर्मिणी श्रीमति पुष्पा अग्रवाल, पं. विनोद मिश्रा, प्रशांत तिवारी, चन्द्रशेखर तिवारी, शिवराम , कन्हैया, लक्ष्मीनारायण सोनी , पं बृजेन्द्र गौराहा , सुश्री अमिता श्रीवास, सी .ए .सुनील सोनी,संतोष सोनी, कृष्ण गोपाल, देवी प्रसाद सोनी, सत्यनारायण , जगदीश प्रसाद सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे ।
संगीतमय श्रीमद् भागवत महापुराण सप्ताह ज्ञान यज्ञ महोत्सव में उमड़ी आस्था राम्हेपुर में चल रहा दिव्य आयोजन, दिनेशचन्द्र एवं चन्द्रचुड़ तिवारी कर रहे अमृतमयी कथा वाचन
इमरान खोखर ब्यूरो चीफ मुंगेली
मुंगेली । विकासखंड लोरमी के ग्राम राम्हेपुर में स्वर्गीय श्रीमती लक्ष्मी देवी एवं जनक राम निर्मलकर की स्मृति में संगीतमय श्रीमद् भागवत महापुराण सप्ताह ज्ञान यज्ञ महोत्सव का भव्य आयोजन किया जा रहा है। यह दिव्य आयोजन 25 नवंबर से 03 दिसंबर 2025 तक श्रद्धा एवं उत्साह के वातावरण में जारी है। कथा वाचन पंडित दिनेशचन्द्र तिवारी राजपुरोहित लोरमी एवं पंडित चन्द्रचुड़ तिवारी राजपुरोहित के पावन मुखारविंद से प्रतिदिन दोपहर 1 बजे से प्रारंभ हो रहा है, जिसमें क्षेत्र के सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित होकर धर्मलाभ ले रहे हैं।कार्यक्रम के प्रथम दिवस 25 नवंबर को वेदी पूजन, गणेश स्थापना एवं गोकर्ण कथा के साथ ज्ञान यज्ञ की शुरुआत हुई।
दूसरे दिन 26 नवंबर को परीक्षित जन्म एवं 24 अवतार कथा का अमृतमयी प्रसंग सुनाया गया। तीसरे दिन 27 नवंबर को कपिल अवतार, सती चरित्र और ध्रुव चरित्र के मार्मिक प्रसंगों ने श्रद्धालुओं को भक्ति रस में भावविभोर कर दिया। चौथे दिन आज अजामिल कथा एवं प्रह्लाद चरित्र का दिव्य वर्णन किया गया, जिसमें बुरी संगति के दुष्परिणाम और भक्ति की महिमा का संदेश दिया गया। महोत्सव के दौरान प्रतिदिन सुबह 11:00 बजे से रात्रि 8:00 बजे तक भंडारा का भी विधिवत आयोजन किया जा रहा है, जिसमें ग्राम एवं आसपास क्षेत्रों के श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण कर रहे हैं।
यह कार्यक्रम धार्मिक सामाजिक एकता का उत्कृष्ट उदाहरण बनकर उभरा है। आयोजनकर्ता जितेंद्र (जित्तू) निर्मलकर एवं श्रीमती निकिता निर्मलकर ने बताया कि सप्ताह भर चलने वाले इस आध्यात्मिक महाकुंभ का उद्देश्य समाज में आध्यात्मिक चेतना, सद्चरित्र एवं धर्म के प्रति जनजागरण को बढ़ावा देना है। आगामी दिनों में भगवान श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, गोवर्धन लीला, रुक्मिणी विवाह एवं सुदामा चरित्र जैसे महत्वपूर्ण प्रसंगों का वर्णन किया जाएगा। अंतिम दिवस 03 दिसंबर को विशाल भजन संध्या एवं पूर्णाहुति के साथ कार्यक्रम का समापन होगा। आयोजन स्थल को भव्य रूप से सजाया गया है तथा श्रद्धालुओं की सुविधा हेतु सभी आवश्यक व्यवस्थाएं उपलब्ध कराई गई हैं। श्रद्धा, भक्ति एवं उत्साह से परिपूर्ण यह आध्यात्मिक माहौल राम्हेपुर ग्राम के लिए एक गौरवपूर्ण अवसर बन गया है।
धार्मिक आयोजन ! श्रीमद्भागवत कथा का पंचम दिन
जड़-भरत चरित्र, ध्रुव , प्रह्लाद चरित्र, नरसिंह अवतार सहित जीवन से जुड़ें हुए विभिन्न विषयों पर पंडित नारायण महराज ने आध्यात्मिक प्रवचन दिया और बोले :-
श्रीमद्भागवत कथा , जीवन के लिए हैं सीख
न्यूज़ जांजगीर-चांपा । श्रीमद्भागवत कथा एक प्राचीन और पवित्र ग्रंथ हैं , जो भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं तथा उनके भक्तों की कथाओं का वर्णन करता हैं । यह आनंदमई कथा जीवन के लिए कई महत्वपूर्ण सीख प्रदान करती हैं जैसें कि जीवन में कैसे भी घर में रहते हुए कैसे भी स्थिति बन जाए, माता-पिता, भाई-बहन या फिर किसी के प्रति भी कैसी भी वैमनस्यता हो जाएं बातचीत बंद नहीं करनी चाहिए । बातें करने से ही कोई न कोई पहल आयेगी । मौनी मत बनिए,यह हमें श्रीमद्भागवत कथा सिखाती हैं - पं नारायण महराज ।
श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन आध्यात्मिक ज्ञान
मारुति विहार कालोनी, शासकीय बिसाहू दास महंत चिकित्सालय के पीछे कंचन की नगरी ,चांपा में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन छत्तीसगढ़ के गौरव, माटी पुत्र और राष्ट्रीय कथा वाचक पूज्य श्री नारायण महराज ने जीवन से जुड़े हुए विभिन्न विषयों पर आध्यात्मिक प्रवचन दिया । उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा हमें आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करती हैं और हमें जीवन के उद्देश्यों को समझने में मदद करती हैं । यह कथा हमें बताती हैं कि भगवान की भक्ति ही जीवन का सच्चा उद्देश्य हैं । मीडिया जगत से जुड़ें हुए शशिभूषण सोनी ने बताया कि मात्र 6 वर्ष की उम्र अर्थात् बाल्यावस्था से ही नारायण जी अपने पिताश्री के सानिध्य में एवं भारत-वर्ष के शंकराचार्य वृन्दावन के साधु-संतों के आशीर्वाद से राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान एनआईटी के इंजीनियरिंग के छात्र रहे हैं । छत्तीसगढ़ के ऐसे गौरवशाली विभूति श्रद्धेय नारायण महाराज,श्रीराधे निकुंज धाम शिक्षक एवं जन कल्याण संस्थान ,जजगिरी भिलाई- 3 छत्तीसगढ़ के निवासी हैं और कंचन की नगरी, चांपा में कथा रसपान करवा रहे हैं । मात्र 9 वर्ष उम्र से भारतवर्ष के अनेक राज्यों में जैसे उत्तर प्रदेश ,मध्यप्रदेश ,झारखंड उड़ीसा ,महाराष्ट्र में सनातन धर्म का प्रचार कथा के माध्यम से निरंतर कर रहे हैं । इनके रोहिणी गोधाम में 8 वर्षों से आश्रम संचालित है।पूज्य महाराज जी का कथा के साथ-साथ एक ही उद्देश्य हैं गौं माता की सेवा और संरक्षण हो ।
कथा का मुख्य विषय
कथा का मुख्य विषय यह हैं कि प्रातःकाल उठकर अपने माता-पिता,बहन, श्रेष्ठ गुरुजन और ईश्वर को प्रणाम करना चाहिए । आजकल के समय क्या यह संभव हैं ? भागवताचार्य पं नारायण महराज ने कहा कि अपने दोनों हाथ उठाकर बताओं कि सुबह उठकर कितने लोग अपने माता-पिता का प्रणाम करते हो । परिवार की बगिया में दादा-दादी, माता-पिता, भाई-बहन, बेटे-बेटियां और पोते-पोती सब रहते हैं । उन्होंने कथा के दौरान आह्वान किया कि माता-पिता चलते-फिरते तीर्थ हैं । प्रणाम कर अपने माता-पिता को बुढापे में आदर दे ।
श्रीमद्भागवत कथा के आयोजक !
सप्त-दिवसीय संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ सप्ताह महोत्सव महापुराण की शुरुआत बुधवार दिनांक 12 नवंबर को कलशयात्रा, वेद पूजन,भागवत कथा महात्म्य और शुकदेव जन्म कथा से शुरु हुई । आयोजक रामबिलास देवांगन श्रीमति अमृता देवांगन ने कथा के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । कथा श्रवण करने वालों में मुख्यतः मेकरुराम,गोपाल प्रसाद,अमित, रामगोपाल, राम खिलावन , देवेंद्र, जीतेंद्र, सुरेंद्र,शिवकुमार-चद्रकली देवांगन,अशोक, नंदकुमार देवांगन- संतोष कुमार देवांगन, संजय, मोहनलाल अग्रवाल, सुनील कुमार अग्रवाल, शशिभूषण सोनी सहित देवांगन परिवार के सदस्य बड़ी संख्या में मौजूद थे ।
कथा का आज पंचम दिवस !
कथा के आज पंचम दिन रविवार को भगवान श्रीकृष्ण जन्मोंत्सव ,बाल लीला,माखन चोरी, गोवर्धन लीला और छप्पन भोग कथा से छत्तीसगढ़ के गौरव,माटी पुत्र और राष्ट्रीय कथा वाचक पूज्य नारायण महाराज, श्रीराधा निकुंज अपनी ओजस्वी वाणी से सराबोर करेंगें |
चांपा नगर में दिनांक 2 नवंबर दिन रविवार को श्री श्याम बाबा का जन्म दिवस धूम-धाम से मनाया जाएगा साथ ही दिन रविवार को सुबह 11:00 से बरपाली चौक चांपा में भव्य भंडारा का आयोजन रखा गया है
भंडारे को लेकर समिति के सदस्यों में है भारी उत्साह देखा गया है*
चांपा। जय श्री राम सेवा समिति के संचालक हरीश दुबे ने बताया कि हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी यह आयोजन भव्य रूप से किया जा रहा है यह आयोजन लगभग 12 वर्षों से लगातार चलते आ रहा है जिसमें श्रद्धालु जन बड़ी संख्या में भाग लेकर प्रसाद ग्रहण करते हैं।
भंडारे को लेकर समिति के सदस्यों में है भारी उत्साह
भंडारे को लेकर समिति सदस्य में भारी उत्साह है समिति के सदस्यों ने अभी से ही तैयारी प्रारंभ कर दी है इस बार का आयोजन भव्य रूप से करने का प्रयास किया जा रहा है जिसमें जय श्री राम सेवा समिति चांपा के संचालक (अध्यक्ष) हरीश दुबे, (उपाध्यक्ष)कमल चौबे ,अरुण यादव,सूरज यादव, राज रजक,अजय मीरचंदानी,संजय मीरचंदानी,विक्की थापा,प्रतीक पटेल,पवन तिवारी,दीपक महंत, प्रमोदमहंत,दीपक यादव, प्रभात यादव,संतोष दुबे, संतोष देवांगन, राजेन्द्र जयसवाल,महेंद्र दुबे,महेंद्र यादव, वासु केडिया,रूपेश केडिया ,अनिल सिंह, विकेश तिवारी,सतीश यादव,सुरेंद्र गुप्ता,राजेंद्र कर्ष,विवेक केशवानी,मनोज सिंह,भागवत साहु, लोमशबरेठ, शिव सहीस, आशीष गौराहा, आयुष गौराहा,मुकेश सिंह,गोपाल कसेर, जैकु कर्ष, योगेश सोनी,रिंकू केडिया,विनोद सूर्यवंशी,रोशन गुप्ता,अभिषेक साहू,हिमांशु यादव, कमल चौबे,हीरा केवट,पिंटू यादव,किशन श्रीवाश, पुष्पराज देवांगन,गोविंद यादव इत्यादि लोग शामिल है।
पत्थलगांव में आस्था और भक्ति का संगम, उदयीमान सूर्य को अर्घ्य देने के साथ संपन्न हुआ छठ महापर्व
बिहान छत्तीसगढ़ सत्या मौर्य ब्यूरो चीफ जशपुर
पत्थलगांव
लोक आस्था का चार दिवसीय महापर्व छठ पूजा मंगलवार की भोर में उदयीमान सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने के साथ भक्तिमय वातावरण में संपन्न हुआ।शहर के छठ तालाब, पूरन तालाब, झरिया सहित ग्रामीण क्षेत्रों के पोखरों और जलाशयों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। छठव्रतियों ने मंत्रोच्चारण के साथ सूर्यदेव की पूजा कर सुख, शांति, समृद्धि और संतान प्राप्ति की कामना की।
व्रतधारियों ने गेहूं के आटे से बने ठेकुआ, चने, केला, सेव और अन्य फलों का प्रसाद अर्पित किया। यह प्रसाद बांस के सूप में रखकर पूजा के लिए समर्पित किया गया। 36 घंटे के निर्जला उपवास के बाद उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रती महिलाओं ने पारण किया।
इस अवसर पर पत्थलगांव विधायक गोमती साय भी पूरन तालाब स्थित छठ घाट पहुंचीं और भगवान सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया एवं घाट में घूमकर व्रती महिलाओं ओर श्रृद्धालुओं से मुलाकात भी की उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष छठ घाट निर्माण की जो घोषणा की गई थी, उसे आज पूरा किया गया है। उन्होंने 40 लाख रुपये की लागत से पक्के सीमेंट घाट निर्माण के लिए भूमिपूजन किया। इस दौरान विधायक ने अपने हाथों से प्रसाद का भी वितरण किया।

विधायक साय ने कहा अब श्रद्धालुओं को पूजा में सुविधा होगी और अधिक जगह भी मिलेगी, क्योंकि हर वर्ष भक्तों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
सुबह की पहली किरण के साथ ही पूरन तालाब छठ घाट पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित हुए। आस-पास के गांवों से भी लोग इस अद्भुत दृश्य को देखने पहुंचे। बच्चे, महिलाएं और पुरुष सभी ने भगवान भास्कर से अपने और अपने परिवार की खुशहाली की प्रार्थना की।
छठ पर्व सूर्योपासना का उत्सव है, जिसमें सूर्य देवता को ऊर्जा, आरोग्य और जीवन शक्ति के प्रतीक के रूप में पूजित किया जाता है। इस अवसर पर शहर के सभी घाटों को आकर्षक गेट, रंगीन लाइटिंग और फूलों से सजाया गया था। वातावरण दीपावली जैसा आलोकित था और श्रद्धालु आतिशबाजी कर उल्लास मना रहे थे।
भोजपुरी समाज पत्थलगांव की ओर से छठ पूजा के आयोजन में विशेष भूमिका निभाई गई। समाज के सदस्यों ने घाटों को आकर्षक ढंग से सजाया। अनुमानित 3 से 4 हजार श्रद्धालु पूरन तालाब स्थित छठ घाट पर इस पावन अवसर के साक्षी बने।
नगर पालिका और पुलिस प्रशासन का सहयोग पूरे आयोजन के दौरान सराहनीय रहा।

छठ पूजा समिति के अध्यक्ष श्यामनारायण गुप्ता ने बताया कि भोजपुरी समाज के युवा वर्ग ने सजावट और व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वरिष्ठ अधिवक्ता मोहन यादव ने कहा कि छठ घाट की सजावट और श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बनता है
छठ पूजा का यह पावन पर्व पत्थलगांव में आस्था, एकता और सामाजिक सहयोग का अद्भुत उदाहरण बन गया।
लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा को लेकर मुंगेली में भी रौनक नजर आई।
इमरान खोखर बिहान छत्तीसगढ़
मुंगेेली
आगर नदी के घाट पर पर व्रतियो ने डूबते सूरज को अर्ध दिया, वही कल उगते सूर्य को अर्ध्य देकर अपने व्रत का समापन करेगी। इस दौरान घाट पर बड़ी संख्या मे पूजा करने वालों के साथ साथ प्रसासनिक अमला भी तैनात रहा। मुंगेली पुलिस अधीक्षक भोजराम पटेल एवं जिला पंचायत सीईओ प्रभाकर पाण्डेय ने लोगो को छठ पर्व की बधाई दी.
पर्व की शुरुवात - 25 अक्टुबर से 28 अक्टुबर तक चलने वाले इस पर्व में पहला दिन नहाय-खाय (25 अक्टूबर, शनिवार) छठ पूजा की शुरुआत नहाय-खाय से होती है। इस दिन व्रती महिलाएं प्रातःकाल पवित्र नदी, तालाब या जलाशय में स्नान कर घर आती हैं और घर की साफ-सफाई करती हैं। इसके बाद शुद्धता का ध्यान रखते हुए सात्विक भोजन बनाया जाता है इस दिन आमतौर पर लौकी-भात और चने की दाल का प्रसाद तैयार किया जाता है। व्रती स्वयं यह भोजन ग्रहण करती हैं और इसी के साथ छठ व्रत का शुभारंभ होता है। इस दिन से वे पूर्ण सात्विक जीवनशैली अपनाकर व्रत की तैयारी शुरू करती हैं।
दूसरा दिन कृ खरना (26 अक्टूबर,रविवार) - दूसरे दिन को खरना कहा जाता है। यह दिन अत्यंत तपस्या और श्रद्धा का प्रतीक है। व्रती दिनभर निर्जला उपवास रखती हैं कृ अर्थात् जल तक ग्रहण नहीं करतीं। संध्या के समय व्रती महिलाएं नदी या तालाब से पवित्र जल लाकर पूजा करती हैं। प्रसाद के रूप में गुड़ से बनी खीर, गेहूं की रोटी का भोग तैयार किया जाता है। पूजन के बाद यह प्रसाद परिवार व आस-पड़ोस में बांटा जाता है। इस दिन के बाद व्रती 36 घंटे तक निर्जला व्रत रखती हैं जो प्रातः अर्घ्य के बाद ही समाप्त होता है।
तीसरा दिन संध्या अर्घ्य (27 अक्टूबर, सोमवार) - तीसरे दिन श्रद्धालु महिलाएं और पुरुष व्रती सोलह श्रृंगार कर सूर्यास्त के समय घाटों की ओर प्रस्थान करते हैं। वे सूप में ठेकुआ, फल, गन्ना, सिंघाड़ा, नींबू, नारियल और केले सहित विविध प्रसाद सजाते हैं। सूर्यास्त के समय अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया जाता है और छठी मइया से परिवार की सुख-समृद्धि, संतान की लंबी आयु और कल्याण की कामना की जाती है। घाटों पर दीपों की रोशनी और लोकगीतों से वातावरण भक्तिमय बन जाता है।
चौथा दिन कृ प्रातः अर्घ्य (28 अक्टूबर, मंगलवार) - अंतिम दिन प्रातः अर्घ्य का होता है, जिसे छठ पर्व का सबसे पवित्र क्षण माना जाता है। व्रती महिलाएं तड़के 3 से 4 बजे के बीच उठकर तैयार होती हैं और घाट की ओर जाती हैं। जैसे ही सूर्य उदय होता है, व्रती उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करती हैं और संतान सुख, परिवार की समृद्धि व स्वास्थ्य की कामना करती हैं। इसके बाद व्रत पारण किया जाता है कृ यानी उपवास समाप्त कर प्रसाद, फल और दलिया ग्रहण किया जाता है।
छठ पूजा का महत्व - छठ पर्व सूर्य उपासना का एकमात्र पर्व है जिसमें सूर्यास्त और सूर्याेदय दोनों समय अर्घ्य दिया जाता है। यह पर्व शुद्धता, अनुशासन, आत्मसंयम और प्रकृति के प्रति आभार का प्रतीक है। मान्यता है कि इस व्रत से संतान सुख प्राप्त होता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। इन चार दिनों तक व्रती महिलाएं सूर्य देव की उपासना कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करेंगी।
इस दौरान व्रत रखी अनामिका सिंह ने बताया कि भगवान सूर्य की आराधना का यह महापर्व है जिसे बड़ी उत्साह से मनाया जाता है डूबते सूर्य को अर्ग देकर व्रत की शुरुआत की जाती है,, जो प्रातः काल उगते सूर्य को अर्ग देकर समाप्त किया जाता है। इस दौरान हम अपने परिवार की खुशहाली और उन्नति के लिए सूर्य देवता से प्रार्थना करते है.
वही समिति के अध्यक्ष अभिलाष सिंह ने इस पर्व के लिए प्रशासन एवं पुलिस प्रशासन के सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया।
छठ घाट पर सोनी समाज व अन्य नागरिकों ने किया श्रमदान
विकास कुमार यादव - बिहान छत्तीसगढ़
राजपुर - शनिवार से प्रारंभ हो रहे लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा को लेकर उत्तर वाहिनी गेउर नदी तट पर तैयारियाँ जोरों पर हैं।
छठ पूजा सेवा समिति के सदस्यों द्वारा अस्थायी घाट निर्माण, प्रकाश व्यवस्था, गंगा आरती, अलाव, चाय वितरण सहित अन्य व्यवस्थाओं की तैयारी की जा रही है।
घाट पर सोनी समाज राजपुर के सदस्यों सहित अनेक समाजसेवियों व नगर के नागरिकों ने श्रमदान करते हुए समिति का मनोबल बढ़ाया। सभी ने समिति द्वारा लगातार किए जा रहे पुनीत कार्यों के लिए बधाई और शुभकामनाएँ दीं।
इस अवसर पर भाजपा किसान मोर्चा जिलाध्यक्ष मुन्ना लाल चौधरी, सोनी समाज अध्यक्ष सुरेश सोनी, नाई समाज अध्यक्ष प्रमोद ठाकुर, ओमप्रकाश सोनी, अशोक सोनी, संतोष सोनी, संदीप सोनी, रजत केशरी, सुनील सोनी, अंकुर गुप्ता, राकेश तिवारी, नवीन सारथी, अंकुर ठाकुर, पंकज जायसवाल सहित छठ पूजा सेवा समिति के सदस्यगण उपस्थित रहे।
मुंगेली में 41 वर्षों से चली आ रही परंपरा, मां काली की प्रतिमा स्थापना कर पूजा-अर्चना की जा रही
इमरान खोखर ब्यूरो चीफ मुंगेली (बिहान छत्तीसगढ़ )
दीपावली के पश्चात् मां महालक्ष्मी, सरस्वती एवं मां काली की आराधना का विशेष महत्व होता है। इसी परंपरा के तहत नगर में विगत कई वर्षों से श्रद्धा और भक्ति के साथ मां काली की प्रतिमा स्थापित की जा रही है। नगर के मां परमेश्वरी चैक (बालानी चैक) में इस वर्ष भी मां काली की भव्य प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना की जा रही है। समिति द्वारा लगातार 41 वर्षों से दीपावली की पूर्व संध्या पर मां काली की प्रतिमा की स्थापना कर पूजा-अर्चना की परंपरा निभाई जा रही है। इस बार भी दीपावली की देर रात श्रद्धालु भक्तों ने पूरे विधि-विधान, वैदिक मंत्रोच्चार और उत्साह के साथ मां काली की प्रतिमा की स्थापना की।स्थानीय नागरिकों और भक्तों में इस आयोजन को लेकर विशेष उत्साह देखा जा रहा है। श्रद्धालु प्रतिदिन पूजा-पाठ, जसगीत, भजन एवं कीर्तन में भाग ले रहे हैं। दीपावली से लेकर एकादशी तक 11 दिनों तक चलने वाले इस काली पूजा उत्सव में नगर का वातावरण भक्तिमय बना हुआ है। मां काली की आराधना के दौरान भक्त सुख-शांति और समृद्धि की कामना कर रहे हैं। आयोजन समिति ने बताया कि समापन अवसर पर विशेष भजन संध्या और प्रसाद वितरण कार्यक्रम भी आयोजित किया जाएगा।
बस्तर जिला तेलुगु स्वर्णकार समाज द्वारा नागपंचमी हर्षोल्लास के साथ मनाया गया: दक्षिण भारतीय तेलुगु समुदाय का पारंपरिक पर्व
(ब्यूरो चीफ बस्तर) जगदलपुर
25 अक्टूबर- दक्षिण भारतीय तेलुगु समुदाय द्वारा बस्तर के जंगलों में पारंपरिक पर्व नागपंचमी का आयोजन शहर के बाहरी इलाकों में स्थित वन क्षेत्र में धूमधाम से मनाया गया। यह पर्व दीपावली के पांचवें दिन मनाया जाता है, जिसमें परिवार के स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना की जाती है
नाग पंचमी के अवसर पर बस्तर जिला तेलुगु स्वर्णकार समाज के लोगों ने वन क्षेत्र में स्थित एक विशेष स्थल पर पूजा-अर्चना की, जैसा कि एक तस्वीर में देखा जा सकता है जहां लोग एक सांप के बिल के पास इकट्ठे हुए और रीति रिवाज के साथ उत्सव मनाया गया ।
नाग पंचमी के अवसर पर समाज एवं परिवार के वरिष्ट लोगों ने पारंपरिक अनुष्ठानों का पालन कर सभी सदस्यों को आशीर्वाद बस्तर वासियों के सुख समृद्धि के लिए प्रार्थना किया।
नाग पंचमी का यह पर्व तिलुगु समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है, जिसमें वे अपने परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। इस पर्व के दौरान लोगों में आपसी प्रेम और सहयोग की भावना भी बढ़ती है।
इस अवसर पर लोगों ने एक-दूसरे के साथ मिलकर पूजा-अर्चना की और अपने परिवार की खुशहाली की कामना की। नाग पंचमी के इस पर्व ने लोगों को प्रकृति के प्रति सम्मान और आदर की भावना को बढ़ावा देने का अवसर प्रदान किया।
इस पारंपरिक उत्सव के उपलक्ष्य में समाज के वरिष्ट श्री पी चंद्रा राव सोनी, श्री सी एच सत्तीराजू सोनी ,श्री के रमेश राव सोनी, , श्री एल गुपेश्वरराव सोनी ,श्री डी सांबशिवराव सोनी एवं समाज के पदाधिकारीगण का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ एवं सभी सदस्यों शुभकामनाएं दी गई।
छठी मईया और सूर्य की उपासना का महापर्व है छठ - अरविन्द तिवारी आज नहाय - खाय से होगा शुभारंभ
रायपुर
प्रसिद्ध सूर्य देव की आराधना तथा संतान के सुखी जीवन की कामना के लिये समर्पित छठ पूजा हर वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को होती है। छठ के व्रत में मुख्य रूप से सूर्य की उपासना और छठी मईया की पूजा करने का विधान है। मान्यता है कि छठ का व्रत करने से छठी मईया प्रसन्न होकर संतान को दीर्घायु का वरदान देती हैं। इसलिये संतान प्राप्ति और संतान की लंबी आयु अच्छे स्वस्थ जीवन व पारिवारिक सुख समृद्धि की कामना के लिये छठ का व्रत रखा जाता है। छठी मईया के संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि छठ के इस महापर्व में छठी मईया और भगवान सूर्यदेव की पूजा की जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार छठी मईया को ब्रह्मदेव की पुत्री और भगवान सूर्य की बहन कहा जाता है। छठी मईया को संतान प्राप्ति की देवी और सूर्य देव को शरीर का स्वामी या देवता कहा जाता है। श्रुति स्मृति पुराणों के अनुसार जब ब्रह्म देव सृष्टि की रचना कर रहे थे तब उन्होंने खुद को दो भागों में विभाजित कर लिया था , एक भाग पुरुष और दूसरा प्रकृति। जिसके बाद प्रकृति ने भी खुद को छह भागों में विभाजित कर लिया
, जिसमें से एक देवी मां हैं। आपको बता दें कि छठी मईया देवी मां का छठा अंश हैं , इसलिये उन्हें छठी मईया या प्रकृति की देवी के नाम से जाना जाता है। उन्होंने बताया हालांकि बिहार , पूर्वी उत्तरप्रदेश तथा झारखंड में छठ पूजा का विशेष महत्व है लेकिन दिल्ली , मुम्बई समेत कई बड़े शहरों में भी हर्षोल्लास के साथ इसका भव्य आयोजन किया जाता है। अब यह पर्व एक संस्कृति बन चुका है और देश से लेकर विदेशों तक में छठ के प्रति आस्था देखने को मिलती है। इस व्रत को छठ पूजा , सूर्य षष्ठी पूजा , डाला छठ के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार सतयुग में भगवान श्रीराम , द्वापर में दानवीर कर्ण और पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने भी सूर्य की उपासना की थी। छठ पूर्व में सूर्य की आराधना और छठी मैया की विधि विधान से पूजा का बड़ा महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार छठी माता को सूर्य देवता की बहन माना जाता हैं। कहा जाता है कि छठ पर्व में सूर्य की उपासना करने से छठ माता प्रसन्न होती हैं और घर परिवार में सुख शांति तथा संपन्नता के साथ सभी मनोकामनायें पूरी करती है। यह व्रत अत्यंत सफाई और सात्विकता का है , इसमें कठोर रूप से सफाई का ख्याल रखना चाहिये। घर में अगर एक भी व्यक्ति छठ का उपवास रखता है तो बाकी सभी को भी सात्विकता और स्वच्छता का पालन करना पड़ेगा।
चार दिनों में होती है छठ पूजा
हिन्दू धर्म में यह एकमात्र ऐसा त्यौहार है जिसमें डूबते सूर्य की पूजा होती है। तिथि अनुसार छठ पूजा चार दिनों की होती है। छठ की शुरुआत चतुर्थी तिथि को नहाय खाय से होती है , पंचमी तिथि को लोहंडा और खरना होता है। उसके बाद षष्ठी तिथि को छठ पूजा होती है जिसमें सूर्यदेव को शाम का अर्घ्य अर्पित किया जाता है। फिर अगले दिन सप्तमी को सूर्योदय के समय में उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद पारण करके व्रत पूरा किया जाता है। इस वर्ष यह त्यौहार आज 25 अक्टूबर शनिवार से 28 अक्टूबर मंगलवार तक चलेगी। छठ पूजा की शुरुआत 25 अक्टूबर मंगलवार को नहाय खाय के साथ होगी। इस दिन पूरे घर की अच्छे से साफ-सफाई की जाती है और स्नान के करने के पश्चात सूर्य को साक्षी मानकर व्रत का संकल्प लिया जाता है। इस दिन चने की सब्जी , चांवल , साग का सेवन किया जाता है। छठ पूजा के दूसरे दिन 26 अक्टूबर रविवार के दिन खरना होगा जो कि छठ पूजा का महत्वपूर्ण दिन होता है , इसे लोहंडा भी कहा जाता है। इस दिन पूरे दिन व्रत किया जाता है और छठ की तैयारियां होती हैं। शाम को नदी सरोवर पर कमर तक जाकर पानी में खड़े होकर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
मिट्टी के नये चूल्हे पर आम की लकड़ी से आग जलाकर साठी के चांवल दूध और गुड़ से खीर बनाकर छठी मईया को अर्पित करने के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। इसके बाद व्रती कुछ भी खाते-पीते नहीं हैं। खरना के अगले दिन छठ पूजा का मुख्य दिन होता है , इस दिन छठी मैया और सूर्य देव की पूजा की जाती है। इस साल छठ पूजा 27 अक्टूबर को है , इस दिन शाम को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। छठ पूजा से अगले दिन छठ पूजा का समापन होता है जो इस बार 28 अक्टूबर को होगा , इस दिन पुन: नदी या सरोवर पर जाकर पानी में खड़े होकर उगते हुये सूर्य को अर्घ्य देकर पारण के बाद कठिन व्रत पूर्ण किया जाता है। इन चारों दिनों में सभी लोगों को सात्विक भोजन करने , जमीन पर सोने के अलावा और भी कई कड़े नियमों का पालन करना होता है। इन चारों दिनों में छठ पूजा से जुड़े कई प्रकार के व्यंजन , भोग और प्रसाद बनाया जाता है।
प्रचलित कथा
छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल से मानी जाती है ऐसी मान्यता है कि सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा की शुरुआत की। कर्ण भगवान सूर्य भगवान के परम भक्त थे और वे प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बना था। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है। वहीं एक और मान्यता प्रचलित है जिसमें कहा जाता है कि जब पांडव जुआ में अपना सारा राजपाट हार गये , तब द्रौपदी ने छठ का व्रत रखा था। द्रौपदी के व्रत के फल से पाण्डवों को अपना राजपाट वापस मिल गया था। इसी तरह छठ का व्रत करने से लोगों के घरों में सुख समृद्धि का आगमन होता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार राजा प्रियवद की कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिये बनाई गई खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परंतु वह मृत पैदा हुआ। प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गये और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं। राजन तुम मेरा पूजन करो तथा और लोगों को भी प्रेरित करो। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी।
श्रीराम ग्रुप द्वारा आयोजित धार्मिक यात्रा ! छत्तीसगढ़ स्वर्णकार समाज का सप्त-दिवसीय तीर्थ यात्रा को गांधी भवन से हरी झंडी दिखाकर किया गया रवाना ।
न्यूज़ जांजगीर-चांपा
भारतवर्ष की प्राचीन परंपरा हैं , धार्मिक तीर्थयात्रा ! तीर्थ यात्रा करने से मनुष्य को धर्म और पुण्य का लाभ प्राप्त होता हैं, आत्मा को शुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती हैं । इसी भावना को बढ़ावा देने के उद्देश्य से श्रीराम ग्रुप द्वारा छत्तीसगढ़ स्वर्णकार समाज सर्किल, चांपा के संयुक्त तत्वावधान में सप्त-दिवसीय धार्मिक तीर्थ यात्रा का आयोजन गांधी भवन चांपा से रवाना कर किया गया । तीर्थ यात्रा की रवानगी छत्तीसगढ़ स्वर्णकार समाज के केंद्राध्यक्ष जयदेव सोनी, संरक्षक रमेश, अनिल, सर्किल अध्यक्ष राजकुमार,युवा अध्यक्ष अनिल, महिला अध्यक्ष श्रीमति रजनी तथा मीडिया प्रभारी शशिभूषण सोनी ने गांधी भवन, चांपा से हरी झंडी दिखाकर लग्जरी बस क्रमांक CG O7CX 2005 को रवाना किया । यह यात्रा दिनांक 25 अक्टूबर 2025 से दिनांक 30 अक्टूबर 2025 तक चलेगी। इस यात्रा के तहत लगभग 50 यात्रियों को चित्रकूट, बनारस, अयोध्या, प्रयागराज और विंध्यवासिनी जैसें प्रमुख धार्मिक-सांस्कृतिक स्थलों को कवर करेगी।
धार्मिक यात्रा में जाने वाले तीर्थ यात्रियों में प्रमुख ।
सिद्धनाथ सोनी ,रजनी सोनी चांपा, ममता सोनी ,उषा सोनी शिवरीनारायण, सावित्री-स्व. वेशचंद सोनी ,सावित्री-स्व जीवन लाल सोनी शिवरीनारायण, रमा, राहौद ,सुशीला बोधी राम सोनी राहौद ,रामेश्वर सोनी ,गोमती सोनी चांपा,गंगा सोनी, हरनारायण सोनी हरदीबाजार, विनोद सोनी, प्रीति सोनी ,खुशी सोनी ,हर्ष सोनी,लता सोनी, चांपा, बसंत सोनी, गौरी सोनी बिलासपुर ,सावित्री स्व.सोन साव फरसवानी , प्रतिभा सोनी , शिवरीनारायण ,नीलेश्वर सोनी दीपका, उर्मिला सोनी शिवरीनारायण , सुमित्रा सोनी कोटमी, कौशिल्या सोनी खरौद , कौशिल्या सोनी बलौदा ,अंजली सोनी खरौद ,संजना सोनी खरौद ,किशोरी सोनी फरसवानी ,पंच कुमारी सोनी खरौद ,युगल किशोर सोनी खरौद , गायत्री सोनी, रश्मि सोनी, मुकेश सोनी कोटमी ,संतोषी सोनी ,सुनील सोनी ,समर्थ सोनी, कीर्ति सोनी, प्रांजली सोनी ,ज्योति सोनी, श्रीमति वंदना पाण्डेय, कृष्ण कुमार पाण्डेय , पचोरी मुड़पार,अमित राठौर , मनी देवी सोनी , सीता देवी सोनी चांपा ,सुनील सोनी कोटमी, शारदा सोनी ,अमर सोनी कोटमी सोनार हैं।
यात्रा के मुख्य आकर्षण स्थल।
चित्रकूट- भगवान श्रीरामचन्द्र जी की तपस्थली
बनारस- भगवान शंकर की महिमा से मण्डित बनारस ( काशी) को विश्व का प्राचीनतम नगर होने का गौरव प्राप्त हैं।यहा पर शक्तिपीठ है और ज्योतिलिंग भी हैं। वरुणा और अस्सी नदी के बीच होने के कारण इसका नाम वाराणसी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसके पास ही सारनाथ स्थित हैं जहां भगवान बुद्ध ने प्रथम उपदेश दिया था।आदि शंकराचार्य ने अपनी धार्मिक दिग्विजय यात्रा यही से आरंभ किया। काशी विश्वनाथ मंदिर दर्शनीय हैं । मणिकर्णिका घाट, दशाश्वमेध,केदार और हनुमान घाट आदि यहां के प्रमुख घाट हैं ।
अयोध्या - भारतवर्ष की सांस्कृतिक पुरियों में अयोध्या का नाम सबसे प्रथम हैं। यह भगवान श्रीरामचन्द्र जी की जन्मभूमि और राजधानी रही हैं। अयोध्या सरयू नदी के तट पर स्थित हैं। यहां के प्राचीन मंदिर को तुड़वाकर बाबर ने मस्जिद बनवा दी थी किन्तु अब यहां पर भगवान श्रीराम जन्मभूमि में दिव्य मंदिर सुशोभित हैं।इस स्थान पर कई मंदिर दर्शनीय हैं - कनक भवन, सीता रसोई, चौबिस अवतार,कोप भवन, रत्न सिंहासन,आनंद भवन, और साक्षी गोपाल इत्यादि मंदिर हैं ।
प्रयागराज- त्रिवेणी संगम तट पर स्थित प्रयागराज पवित्र स्थान हैं। जिसे समुद्र मंथन के बाद कुंभ कलश से अमृत सुधा रस की कुछ बूंदें सर्वप्रथम प्राप्त हुई थी। गंगा, यमुना और सरस्वती के त्रिवेणी संगम पर स्नान करने का विशेष महत्व और फल माना जाता हैं।अपनी परम पवित्रता के कारण इस स्थल पर बारह वर्ष में महाकुंभ मेला लगता हैं। इस तीर्थस्थल पर बड़े-बड़े साधु-संतों का सम्मेलन और यज्ञ आदि होते हैं ।
विंध्यवासिनी- देवी विंध्यवासिनी का दिव्य मंदिर देखने लायक है।
कार्यक्रम विवरण ।
तिथि- दिनांक 24 अक्टूबर 2025, 2025
समय- दोपहर 2:00 बजें रवानगी
स्थान- गांधी भवन, परशुराम मार्ग, चांपा
आप सभी को इस धार्मिक-सांस्कृतिक यात्रा में शामिल होने और स्वर्णकार समाज के साथ इस पवित्र अनुष्ठान यात्रा का हिस्सा बनने के लिए पधारने वालों में मुख्यतः हेमंत सराफ, संतोष सोनी, मधूसुदन शशिभूषण विनोद, अनिल, रमेश, राम वल्लभ, महावीर प्रसाद, दिलीप सोनी, रघुनंदन, अजय, अनिल, दीपक, पवन, शिवराम, सुरेश, रमेश,सत्या, श्रद्धा ममता पाण्डेय, जितेंद्र पाण्डेय, सरिता सोनी, ममता, हेमा, ज्योति आदि शामिल हुए ।
अमोरा में धूमधाम से संपन्न हुआ गौरी रानी का विसर्जन
जांजगीर चाम्पा
– जाज्वल्य नगरी जिला मुख्यालय के नवागढ़ विकासखंड अंतर्गत आने वाले माँ शँवरीन दाई की पावन धरा ग्राम अमोरा (महंत) में आज गौरी रानी का महापर्व बड़े हर्षोल्लास एवं धूमधाम के साथ मनाया गया। भक्तों द्वारा मांदर की थापों के बीच कई तरह के बाजे गाजे के साथ झांकियांँ निकालकर गाँव के सागर तालाब में विसर्जन किया गया। गौरतलब है कि अनादि काल से अमोरा गांँव में नवरात्रि के प्रथम दिन से ही गौरी रानी स्थापित करने की परंपरा चली आ रही है , जहां प्रतिवर्ष बड़े हर्षोल्लास एवं धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इसी कड़ी में इस वर्ष भी नवरात्रि प्रतिपदा के दिन से यहांँ लगभग इंक्यावन जोड़ी शिव पार्वती के प्रतीक गौरी रानी स्थापित की गयी थी।
जिसकी प्रतिष्ठा कर ग्यारह दिनों तक विधि विधान से पूजा अर्चना कर विभिन्न प्रकार के बाजे गाजे के साथ कुँवारी कन्याओं द्वारा गौरी रानी को सिर में धारण कर युवाओं द्वारा अस्त्र शस्त्रों का संचालन करते हुये झांकी निकालकर सागर तालाब में महाआरती के बाद विसर्जन किया गया। इस झांकी में बंदर , भालू एवं नृत्यांगनाओं के रूप में नाट्य कलाकार भी आकर्षण के केन्द्र रहे। पूरे गांव में शाम पांच बजे से रात ग्यारह बजे तक मेला लगा हुआ था। इस महापर्व के संबंध में जानकारी देते हुये गाँव के निवासी एवं कामधेनु सेना के छत्तीसगढ़ सचिव योगेश तिवारी एवं अंतर्राष्ट्रीय चैम्पियनशिप बेल्ट विजेता रेसलर प्रतीक तिवारी ने अरविन्द तिवारी को बताया कि ”गौरी रानी” महापर्व इस गाँव का बहुत प्रसिद्ध महापर्व है जो पूरे जिले में एक ही जगह होता है , इसलिये बहुत दूर दराज के लोग भी यहाँ ये पर्व देखने आते हैं ।
गौरी रानी (उमा महेश्वर) की स्थापना – पूजन व विवाह करने से सुख , शांति , समृद्धि मिलती है और व्यक्ति की समस्त मनोकामना पूर्ण होती है। इसी कारण से गांव में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। गौरी रानी का यह महापर्व चूकि जिले के एकमात्र ग्राम अमोरा में ही मनाया जाता है। इसलिये जिले भर श्रद्धालु और दर्शकगण भारी संख्या में यहांँ पहुंँचकर कार्यक्रम की शोभा बढ़ाते हुये गाँव में लगे मेला का भी आनंद उठाते नजर आये। यहाँ के जो भी लोग बाहर में सेना या अन्य विभाग में नौकरी करते हैं वे भी इसी समय छुट्टी लेकर आते हैं
और गाँव की बेटियाँ भी इसी समय आती हैं। इस गाँव में सैकड़ों वर्ष पहले हमारे पूर्वजों द्वारा अपने बच्चों की शादी विवाह एवं अन्य मनोकामनाओं के साथ गौरी रानी स्थापित की गयी थी। इनकी स्थापना से उनकी मनोकामनायें पूरी हुई , तब से लेकर आज तक यह परंपरा अनवरत जारी है और आगे भी चलती रहेगी। इनकी पूजा आराधना से सुख , शांति एवं समृद्धि मिलती है सभी मनोकामनायें पूरी होती है। गौरी रानी महापर्व के इस भव्य कार्यक्रम में कई अधिकारी , मीडियाकर्मी सहित श्रद्धालुओं ने पहुंचकर भगवान से आशीर्वाद प्राप्त किया और क्षेत्रवासियों के खुशहाली की कामना की। इस पूरे कार्यक्रम में शांति व्यवस्था बनाये रखने में नवागढ़ थाना प्रभारी निरीक्षक अशोक वैष्णव सहित पूरे नवागढ़ स्टाफ , महिला सेल , पुलिस मुख्यालय जांजगीर का सराहनीय योगदान रहा।
क्या है गौरी रानी महापर्व
गौरतलब है कि इस गाँव में तिवारी परिवार की बाहुल्यता है और इसके पूर्वजों ने आज से लगभग डेढ़ सौ साल पहले अपनी मनोकामना को लेकर गौरी रानी स्थापित कर ग्यारह दिन तक उनकी पूजापाठ किये जिससे उनकी मनोकामना पूरी हो गयी। तब से लेकर आज तक प्रत्येक क्वाँर नवरात्रि के शुरू दिन से ही इस गाँव में ”गौरी रानी” की स्थापना की जाती है और एकादशी के दिन बड़े हर्षोल्लास के साथ इनको विसर्जित की जाती है। इसकी यह भी मान्यता है कि ”गौरी रानी” को किसी भी जाति वर्ग के केवल कुँवारी लड़कियाँ ही अपने सिर पर धारण करती हैं सबसे पहले कलश होता है ,उसके बाद पार्वती, उसके बाद शंकरजी फिर पूजापाठ में उपयोग किया गया फूलपान का टोकरी और बाजे गाजे के साथ पूरे गाँव में घुमाया जाता है। गांव के हर चौराहे पर युवाओं द्वारा शौर्य प्रदर्शन एवं करतब का प्रदर्शन भी किया जाता है और अंत में महाआरती के पश्चात सागर तालाब में गौरी रानी विसर्जित की जाती है।
सभी पूर्णिमाओं में सर्वोत्तम है शरद पूर्णिमा -
रायपुर
हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि एक खास स्थान रखती है , प्रत्येक माह की शुक्ल पक्ष की आखिरी तिथि को जब चंद्रमा पूर्ण रूप से आसमान में दिखायी देता है तभी पूर्णिमा तिथि आती है। शरद पूर्णिमा के संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि प्रत्येक मास की पूर्णिमा का अपना अलग महत्व होता है लेकिन कुछ पूर्णिमा बहुत ही श्रेष्ठ मानी जाती हैं। अश्विन माह की पूर्णिमा उन्हीं में से एक है जिसे सर्वोत्तम कहा जाता है। इस पूर्णिमा को कोजागरी , आश्विन पूर्णिमा , रास पूर्णिमा एवं कौमुदी व्रत के नाम से भी जाना जाता है , सनातन संस्कृति में इस व्रत का विशेष महत्व है। उड़ीसा में शरद पूर्णिमा को ”कुमार पूर्णिमा” भी कहा जाता है , यहां इस दिन कुंवारी लड़कियां सुयोग्य वर पाने के लिये भगवान कार्तिकेय की पूजा करती हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार इस वर्ष शरद पूर्णिमा आज 06 अक्टूबर को मनायी जायेगी। शरद पूर्णिमा ना केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है , बल्कि इसे स्वास्थ्य , समृद्धि और सुख-शांति के लिये भी अत्यंत शुभ माना जाता है। भारत के कई राज्यों में शरद पूर्णिमा को फसल कटाई के उत्सव के रूप में मनाते हैं तथा इस दिवस से वर्षा काल की समाप्ति तथा शीत काल की शुरुआत होती है। शरद पूर्णिमा के दिन पवित्र नदी में स्नान करने की परंपरा है। यदि ऐसा नहीं कर सकते हैं तो घर में पानी में ही गंगाजल मिलाकर स्नान करनी चाहिये। इस पूर्णिमा पर रात्रि में जागरण करने व रात भर चांदनी रात में रखी खीर को सुबह भोग लगाने का विशेष रूप से महत्व है।
भद्रा और पंचक का साया
आपको बता दें कि इस वर्ष शरद पूर्णिमा के दिन भद्रा के साथ पंचक का भी साया रहेगा। भद्रा काल में कोई भी मांगलिक कार्य करना शुभ नहीं माना जाता। भद्रा का साया 06 अक्टूबर की रात्रि 10 बजकर 53 मिनट तक रहेगा , इसलिये इस समय के बाद आपको चंद्रमा की रोशनी में खीर रखनी चाहिये। हालांकि शरद पूर्णिमा के दिन भद्रा का विचार नहीं किया जाता लेकिन फिर भी खीर को शुभ समय में चंद्रमा की रोशनी में रखने से आपको ज्यादा शुभ परिणाम प्राप्त हो सकते हैं। इसके साथ ही इस दिन पंचक भी रहेगा , क्योंकि पंचक 03 अक्टूबर से आरंभ होगा जो 08 अक्टूबर को समाप्त होगा।
मां लक्ष्मी की प्राकट्योत्सव
देश के कई जगह इस पूर्णिमा को मां लक्ष्मी के प्राकट्योत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। माना जाता है कि इस दिन मां लक्ष्मी पृथ्वी पर प्रकट होती हैं। नारद पुराण के अनुसार इस दिन मां लक्ष्मी अपने हाथों में वर और अभय लिये घूमती है और जागते हुये भक्तों को धन – वैभव का आशीष देती है। शरद पूर्णिमा के दिन लक्ष्मी पूजन का भी खास महत्व है। समुद्र मंथन से केवल अमृत ही नहीं निकला था। क्षीर सागर में देव और दैत्यों द्वारा किये मंथन से शरद पूर्णिमा के दिन ही लक्ष्मी माता की उत्पत्ति भी हुई थी , इस कारण इस तिथि को धनदायक माना जाता है। इस दिन माता लक्ष्मी की विशेष पूजा करने का विधान है , इस रात्रि में मां लक्ष्मी की षोडशोपचार विधि से पूजा करके ‘श्रीसूक्त’ का पाठ , ‘कनकधारा स्तोत्र’ , विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ अथवा भगवान् कृष्ण का ‘मधुराष्टकं’ का पाठ ईष्ट कार्यों की सिद्धि दिलाता है। माना जाता है कि इस रात महालक्ष्मी भगवान विष्णु के साथ गरुड़ पर बैठकर पृथ्वी पर भ्रमण करने आती हैं। इस दौरान जो लोग रात्रि में जागकर इसका पूजन करते हैं उन पर इनकी कृपा बरसती है और माता लक्ष्मी उन सबका कल्याण करती हैं। जिस घर पर माता प्रसन्न हो जाती हैं वहां धन-संपदा की कोई कमी नहीं रहती है। चतुर्मास यानि भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेष सैय्या पर सो रहे होते हैं , वह समय अपने अंतिम चरण में होता है। शरद पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु की भी पूजा करने की परंपरा है , उनकी आराधना से सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
खीर बनाने की परंपरा
शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है , इस दिन चांद की रोशनी सबसे तेज होती है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन चंद्र देवता धरती के सबसे करीब होता है और चंद्रमा की दूधिया रोशनी धरती को नहलाती है , इसके साथ ही आकाश से अमृत की बूंदों की वर्षा होती है। चंद्रमा को लक्ष्मीजी का भाई भी कहा गया है क्योंकि चंद्रमा भी समुद्र मंथन से ही उत्पन्न हुये थे इस दिन चंद्रमा की पूजा एवं उन्हें अर्घ्य देने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। इस पूर्णिमा की रात्रि को चंद्र देवता की विशेष पूजा कर चांवल और गाय के दूध से खीर बनाकर खुले आसमान के नीचे रखी जाती है। माना जाता है कि शरद पूर्णिमा के मौके पर चंद्रमा की किरणें औषधीय गुणों से भरपूर होती हैं और जब यह खीर पर पड़ती है तो वह अमृत के समान हो जाती है। चांदनी में रखी यह खीर औषधी का काम करती है जो कई रोगों को ठीक कर सकती है। इसके पीछे भी वैज्ञानिक कारण है। कहा जाता है कि दूध में लैक्टिक एसिड होता है , ये चंद्रमा की तेज प्रकाश में दूध में पहले से मौजूद बैक्टिरिया को बढ़ाता है। चांदी के बर्तन में रोग- प्रतिरोधक बढ़ाने की क्षमता होती है , इसलिये खीर को चांदी के बर्तन में रखना चाहिये। शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की रोशनी सबसे तेज होती है। इस कारण खुले आसमान में खीर रखना फायदेमंद होता है।
भगवान श्रीकृष्ण से भी जुड़ा है शरद पूर्णिमा
शरद पूर्णिमा उत्सव भगवान श्रीकृष्ण से भी जुड़ा हुआ है , जिसे रास पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। श्रुतिस्मृति पुराणों के अनुसार सभी गोपियां भगवान श्रीकृष्ण को पति के रूप में पाना चाहती थी। भगवान ने उन्हें इस कामना को पूरा करने का वचन दिया। अपने वचन को पूरा करने के लिये भगवान कृष्ण ने रास का आयोजन किया। इस हेतु गोपियों को शरद पूर्णिमा की रात्रि में यमुना तट पर आने हेतु कहा। सभी गोपियां सज-धज कर निर्धारित समय पर वहां पहुंची। तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने रास आरंभ किया। माना जाता है कि वृंदावन में स्थित निधिवन वह स्थान है जहां पर भगवान श्रीकृष्ण ने महारास किया था। इस अवसर पर भगवान कृष्ण ने अद्भुत लीला दिखायी , जितनी गोपियां थी उतने ही कृष्ण के प्रतिरूप वहां दिखाई देने लगे और इस तरह सभी गोपियों को उनके कृष्ण मिल गये। शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होते हैं इसलिए अन्य दिनों की अपेक्षा शरद पूर्णिमा की रात्रि में चंद्रमा का सौंदर्य अधिक होता है। यही कारण है कि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने रासलीला के लिये शरद पूर्णिमा का समय निर्धारित कर सोलह हजार एक सौ आठ गोपियों के साथ महारासलीला नामक दिव्य नृत्य किया था। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया से रात्रि को छह माह तक रोके रखा था , तब तक सूर्योदय ही नही हुआ था। इस महारास में भगवान कृष्ण ने कामदेव की सुदंरता का घमंड भी तोड़ा था। इस महारासलीला में भगवान श्रीकृष्ण ही एकमात्र पुरुष थे इनके अलावा वहाँ पुरुषों का प्रवेश वर्जित था। लेकिन महादेवजी के मन में महारासलीला देखने की इच्छा इतनी प्रबल थी कि वे गोपिका बनकर उसमें शामिल हो गये और मान्यता है कि आज भी शरदपूर्णिमा की रात भगवान श्रीकृष्ण गोपियों के साथ वृंदावन के निधिवन में महारास लीला रचाते हैं। निधिवन में तुलसी के पेड़ जोड़ों में पाये जाते हैं। कहा जाता है कि यह सभी तुलसी के पेड़ रास रचाते समय गोपियां बन जाती हैं। सूर्यास्त के बाद निधिवन को खाली करा दिया जाता है किसी भी इंसान को यहां रुकने की इजाजत नहीं होती अन्यथा उनकी मानसिक संतुलन खो जाती है। निधिवन में बने रंगमहल में आज भी राधारानी और श्री कृष्ण के लिये रखे गये चंदन के पलंग को रोज सूर्यास्त के समय सजा दिये जाते हैं। पलंग के पास ही एक लोटा पानी , राधारानी के श्रृंगार का सामान , दातुन और पान रखा जाता है। सुबह रंगमहल का दरवाजा खोलने पर बिस्तर अस्त-व्यस्त मिलता है , लोटे का पानी गायब और उपयोग की हुई दातुन दिखायी पड़ती है एवं पान भी खाया हुआ मिलता है। मान्यता है कि इन सभी चीजों का उपयोग श्री कृष्ण और राधा द्वारा किया जाता है।
वृंदावन में होता है वृहद आयोजन
आज शरद पूर्णिमा के दिन मंदिरों में विशेष पूजा का आयोजन होता है। बृज एवं वृंदावन में रास पूर्णिमा वृहद स्तर पर मनाया जाता है , इस अवसर पर वृंदावन के हर मंदिरों एवं गलियों में भक्ति का माहौल देखने को मिलता है। वही वृंदावन के विश्व प्रसिद्ध मंदिर बांके बिहारी में अपने आराध्य के दर्शन के लिये लोग आधी रात से ही लाईन लगाते हुये नजर आते हैं। देश के विभिन्न तीर्थ स्थलों के अलावा ब्रज चौरासी कोस की गलियों में राधे - राधे के जयकारे गूंजते रहते हैं। आधी रात के बाद ठाकुर जी की आरती उतारकर खीर रबड़ी और श्वेत चंद्रकला का भोग अर्पित कर श्रद्धालुओं को वितरित किया जाता है। सभी मंदिरों में अनवरत ठाकुर जी के गुणगान गाये जाते हैं , वहीं निधिवन में महारास का आयोजन किया जाता है। गिरिराज पर दुग्धाभिषेक का आयोजन होता है , इसके साथ ही वृंदावन की एक माह की परिक्रमा भी शुरू हो जाती है। शरद पूर्णिमा के दूसरे दिन से ही कार्तिक स्नान के यम , व्रत और नियम तथा दीपदान शुरू हो जाते हैं।
रायपुर में पंडित धीरेंद्र शास्त्री लगाएंगे दिव्य दरबार:
रायपुर
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आज (4 अक्टूबर) से आस्था और संस्कृति का अनोखा संगम देखने को मिलेगा। गुढियारी इलाके में बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री दिव्य दरबार लगाएंगे। वो हनुमंत कथा भी सुनाएंगे। इसमें लाखों भक्त शामिल होंगे। आयोजन की तैयारियां जोरों पर हैं।
सुरक्षा की दृष्टि से भारी संख्या में पुलिस फोर्स तैनात रहेगी। परिसर को सीसीटीवी कैमरों से लैस किया गया है। इस कार्यक्रम में किसी भी तरह का विवाद ना हो, इसलिए पुलिस के अलावा 5 हजार बाउंसर्स भी तैनात रहेंगे।
पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के हनुमंत कथा कार्यक्रम के लिए आयोजकों की तरफ से सभी व्यवस्थाओं को दुरुस्त किया जा रहा है। अनुमान है कि इस दिव्य दरबार में प्रदेशभर से भारी संख्या में लोग पहुंचेंगे।
समाजसेवी चंदन-बसंत अग्रवाल के नेतृत्व में ‘स्व. पुरुषोत्तम अग्रवाल स्मृति फाउंडेशन’ के देखरेख में यह आयोजन किया जा रहा है। पिछले दिनों 14 सितंबर को कार्यक्रम स्थल का पूजन-अर्चन के साथ शुभारंभ किया गया।
मुख्य आयोजक बसंत अग्रवाल ने बताया कि, कार्यालय आयोजन की सभी व्यवस्थाओं का केंद्र पॉइंट होगा। पंडाल, भंडारा, सुरक्षा, यातायात और भक्तों के बैठने जैसी व्यवस्थाओं का संचालन और समन्वय यहीं से किया जाएगा। उद्घाटन समारोह में समाज के वरिष्ठ प्रतिनिधि और भक्तगण मौजूद रहे। कथा सुनने के लिए पहुंचने वाली श्रद्धालुओं के लिए समिति ने पॉर्किंग की व्यवस्था की है। साइंस कॉलेज मैदान, कोटा मैदान, डब्ल्यूआरएस कॉलोनी स्थित मैदान में कार-बाइक श्रद्धालु खड़ी कर सकेंगे।
कथा सुनने के लिए मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, कौशल्या देवी साय, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष किरण सिंहदेव, उपमुख्यमंत्री अरुण साव, विजय शर्मा, विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह, वीणा सिंह, मंत्रिमंडल के सहयोगी, रायपुर के चारों विधायक सहित निगम, मंडल के सदस्य, नगर निगम की महापौर मीनल चौबे, सभापति सूर्यकांत राठौर सहित अन्य गणमान्य नागरिक जन शामिल होंगे।
आस्था और विश्वास ! विजय और ऐश्वर्य की दात्री जगतनंदिनी आदि शक्ति मां समलेश्वरी देवी
न्यूज़ जांजगीर-चांपा
कृषि प्रधान देश भारतवर्ष में भारतीय संस्कृति और देव स्थलों पर विशिष्ट महत्व हैं। यहां हर पर्व और त्यौहार प्रकृति चक्र का अनुसरण करते हुए आनंद और उत्साह के साथ मनाया जाता हैं। गणेश विसर्जन और पितृपक्ष की समाप्ति के बाद कोसा, कांसा एवं कंचन की नगरी चांपा में शारदीय नवरात्र अत्यंत हर्षोल्लास पूर्वक मनाया गया । जगतनंदिनी आदि शक्ति मां समलेश्वरी देवी चांपा में शारदीय नवरात्रि -2025 पर्व पर हर साल की तरह इस साल भी अलग-अलग यानी कि हर दिन का श्रृंगार और भोज्य पदार्थ दी गई और साथ ही साथ माता रानी की बहुत ही सुन्दर और मनमोहक श्रृंगार किया गया। मां की छवि और चेहरे का भाव बेहद खास हैं और उनके दर्शन-पूजन करने मात्र से सारे दुःख दर्द मिट जाता हैं ।
चांपा का गौरवशाली इतिहास
हसदेव नदी के तट पर बसा हुआ हैं चांपा नगर - जांजगीर-चांपा जिले के हसदेव नदी के सुरम्य तट पर बसा चांपा नगर का गौरवशाली इतिहास हैं, गरिमामय संस्कृति हैं और यहां के लोग आध्यात्मिक वातावरण में रहते हैं ।
जगह-जगह सुव्यवस्थित मंदिर, अनेक मस्जिद , गुरु द्वारा और गिरजाघर अव्यस्थित - नगर में जगह-जगह सुव्यवस्थित मंदिर , जिनमें मुख्यतः मस्जिद, गुरुद्वारा और गिरजाघर हैं जो इसकी धार्मिक सहिष्णुता को दर्शातें हैं ।
समलेश्वरी देवी मंदिर की महत्ता
प्राचीन इतिहास- सोनार पारा और देवांगन पारा चांपा में स्वर्णिम कलश की प्रखर किरणों से ओत-प्रोत अतीत गरिमा का इतिहास समेटते हुए एक ऐसा मंदिर हैं जो कि अपने प्राचीन इतिहास को दृष्टिपात करने के लिए विवश करता हैं ।
मराठा शासनकाल- मराठा शासन-काल में रतनपुर के मराठा राजा का युद्ध संबलपुर उड़ीसा के राजा से एक बार हुआ, जिसे जीतने के बाद चांपा जमींदारी की स्थापना की हुई ।
समलेश्वरी देवी मंदिर की स्थापना- वर्ष 1862 में नारायण सिंह के द्वारा निर्मित मंदिर में विजय और ऐश्वर्य की दात्रि समलेश्वरी की काले पत्थर से निर्मित अत्यंत प्राचीन मूर्तियां स्थापित की गईं हैं ।
मां समलेश्वरी देवी की पूजा-आराधना ।
चांपा जमींदारी की कुलदेवी और परंपरा -रच गईं - चांपा जमींदारी की परंपरा के अनुसार मां समलेश्वरी देवी की पूजा-आराधना किया जाता हैं और।
आस्था का केंद्र - साहित्यकार शशिभूषण सोनी ने बताया कि चांपा नगर का समलेश्वरी देवी मंदिर आज असंख्य भक्तों की आस्था और विश्वास का केंद्र बन गया हैं । उन्होंने बताया कि मेरे घर में एक छोटा-सा काष्ट का मंदिर है, जिसमें विभिन्न देवी-देवताओं के साथ मां समलेश्वरी देवी की मूर्ति विराजमान हैं। शशि ज्वेलर्स सराफा बाजार चांपा के पास स्थित समलेश्वरी मंदिर हैं । मां का तेज मुझे आकर्षित करता हैं ।
मां समलेश्वरी देवी की महिमा अपरम्पार हैं - कुलवन्त सिंह सलूजा
प्रेस क्लब चांपा अध्यक्ष कुलवन्त सिंह सलूजा ने कहा कि जगतनंदिनी मां समलेश्वरी देवी की महिमा अपरम्पार हैं। मां समलेश्वरी देवी के प्रति मेरी गहरी आस्था और प्रेम हैं। जब भी किसी काम से बस्ती आना-जाना होता हैं मैं समलेश्वरी मंदिर मत्था टेकने अवश्य जाता हूं। मेरे घर में भी मां समलेश्वरी देवी की फोटो फ्रेमिंग प्रतिमा हैं और मैं रोज मां की आराधना करता हूं। मां दुर्गा में मेरी अटूट आस्था हैं । मेरा मानना है कि इस संसार में देवी-देवता सर्व शक्तिमान हैं ।
मुंगेली में जवारा विसर्जन आज 01 अक्टूबर को, मंदिरों में उमड़ा भक्तों का सैलाब
इमरान खोखर ब्यूरो चीफ मुंगेली (बिहान छत्तीसगढ़)
नवरात्रि पर्व की भव्यता इन दिनों जिलेभर में देखने को मिल रही है। पूरे नगर में देवी दुर्गा के जयकारों के साथ श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बन रहा है। शहर और ग्रामीण क्षेत्रों के देवी मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रही। मां के दरबार में आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा, जहां भक्तों ने अपनी मन्नतें मांगी और सुख-समृद्धि की प्रार्थना की।जिले के प्रमुख शक्ति स्थल—शक्ति मंदिर, महामाया मंदिर, दुर्गा मंदिर, खर्रीपारा स्थित काली मंदिर और हथनिकला मंदिर—में अष्टमी के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना और देवी जागरण का आयोजन किया गया। भक्तों ने अखंड ज्योत जलाकर माता रानी के समक्ष अपनी श्रद्धा अर्पित की। जगह-जगह भक्त मंडलों द्वारा माता की चौकी और भजन-कीर्तन भी आयोजित किए गए,
जिनमें महिलाओं और युवाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।धार्मिक परंपराओं के अनुसार, बुधवार की सुबह दाऊपारा एवं मल्लाह पारा स्थित महामाया मंदिर परिसर से जवारा विसर्जन यात्रा निकाली जाएगी। इस दौरान ढोल-नगाड़ों और जयकारों के बीच भक्त झूमते-गाते मां के जवारा को विसर्जन हेतु ले जाएंगे। वहीं शाम होते ही शहर का माहौल और भी भक्तिमय हो जाएगा, क्योंकि रात्रि 08 बजे खर्रीपारा स्थित काली मंदिर से मां काली की ज्योत और रात्रि 12 बजे महामाया मन्दिर सोनार पारा की जवारा विसर्जन के लिए निकलेगी। इस अवसर पर हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं के उपस्थित रहने की संभावना है। नवरात्रि पर्व को लेकर प्रशासन ने भी व्यापक व्यवस्था की है।
सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की गई है, वहीं नगरपालिका द्वारा साफ-सफाई और प्रकाश व्यवस्था सुनिश्चित की गई है। विसर्जन मार्ग पर भीड़ को नियंत्रित करने हेतु पुलिस बल की तैनाती की जाएगी। सोशल मीडिया प्रचारक कोमल देवांगन मुंगेलिहा ने बताया कि नवरात्रि पर्व में जिलेभर के भक्त बड़ी आस्था और उल्लास के साथ शामिल हो रहे हैं। मंदिरों में सुबह से लेकर देर रात तक पूजा-पाठ का सिलसिला जारी है। विशेषकर अष्टमी और नवमी के दिन भक्तों की भीड़ चरम पर रहती है। नवरात्रि के इस अवसर पर पूरा जिला भक्ति और आध्यात्मिक माहौल में डूबा हुआ है। मां दुर्गा के जयकारों और ढोल-नगाड़ों की गूंज से पूरा वातावरण दिव्य और ऊर्जावान हो गया है। श्रद्धालु बेसब्री से जवारा विसर्जन का इंतजार कर रहे हैं, जो नगर की सड़कों से गुजरते हुए धार्मिक उत्साह और सांस्कृतिक एकता का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करेगी।
शारदीय नवरात्रि पर्व सप्तमी तिथि पर मां कालरात्रि की उपासना - डॉ रविंद्र द्विवेदी भक्ति,शक्ति,सिद्धि,बुद्धि,समृद्धि का पर्व- नवरात्रि
शारदीय नवरात्रि महापर्व हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है जो मां दुर्गा की आराधना के लिए आयोजित किया जाता है। इस पर्व को भारतीय संस्कृति में बहुत उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। नवरात्रि महापर्व में मां दुर्गा की आराधना की जाती है, जो सृष्टि की उत्पत्ति की शक्ति को प्रतिष्ठित करती हैं। इस अवसर पर भक्त उनकी पूजा और उपासना करके उनकी कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।नवरात्रि में नौ विभिन्न देवियों की पूजा की जाती है, जिन्हें नवदुर्गा कहा जाता है। हर दिन एक विशेष देवी की पूजा करने से भक्त उनकी कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
शारदीय नवरात्रि में सप्तमी तिथि को मां कालरात्रि की पूजा होती है इस दिन मां का मन बहुत प्रसन्न मुद्रा में रहता है इस दिन मां कालरात्रि मनोवांछित फल देने के लिए पूरी तरह तत्पर रहती है। इन्हें देवी पार्वती के समतुल्य माना गया है तथा कालरात्रि को महायोगिनी महायोगेश्वरी भी कहा गया है।सप्तमी तिथि पर मां काली की पूजा करने से व्यक्ति को शक्ति और सौभाग्य प्राप्त होता है। मां काली का रूप उस शक्ति को प्रतिष्ठित करता है जो संसार में संतुलन और न्याय बनाए रखता है।
सप्तमी तिथि को मां काली की पूजा करने से भक्त को दैवीय शक्तियों की कृपा प्राप्त होती है और वे संसार में उत्तम संतुष्टि और समृद्धि को प्राप्त कर सकते हैं। यह दिन मां काली की कृपा को प्राप्त करने के लिए एक अच्छा अवसर है और उनकी उपासना से अध्यात्मिक उन्नति होती हैं।
नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती का पाठ करना बहुत ही महत्वपूर्ण और शुभ माना जाता है। इसके पीछे कई धार्मिक और आध्यात्मिक कारण हैं, जो इस पाठ को विशेष बनाते हैं।
दुर्गा सप्तशती एक प्राचीन हिंदू ग्रंथ है, जिसमें 700 श्लोक हैं। यह ग्रंथ देवी महात्म्य का वर्णन करता है, जिसमें बताया गया है कि देवी दुर्गा ने कैसे विभिन्न असुरों (जैसे मधु-कैटभ, महिषासुर और शुंभ-निशुंभ) का वध करके धर्म की रक्षा की।
नवरात्रि में पाठ का महत्व
देवी की स्तुति और कृपा प्राप्ति:
दुर्गा सप्तशती में देवी दुर्गा के विभिन्न रूपों और उनकी शक्तियों का वर्णन किया गया है।
इस ग्रंथ का पाठ करके भक्त देवी की स्तुति करते हैं और उनकी कृपा प्राप्त करते हैं। यह पाठ देवी को प्रसन्न करने का सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है।
जिस प्रकार देवी दुर्गा ने असुरों का संहार किया, उसी तरह इस पाठ को करने से जीवन की सभी नकारात्मक शक्तियाँ, बाधाएँ और भय दूर होते हैं।
यह पाठ बुरी शक्तियों, बुरी नजर और जादू-टोना के प्रभाव से भी बचाता है। दुर्गा सप्तशती का पाठ करने से व्यक्ति के भीतर आध्यात्मिक शक्ति और आत्म-विश्वास बढ़ता है।
संभव हो तो, पूरे नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए यह न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो भक्तों को आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाती है और उनके जीवन से सभी प्रकार की बाधाओं को दूर करती है।
इस नवरात्रि पवित्र पर्व पर मां दुर्गा की कृपा आप पर सदैव बनी रहे और आपके जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता लाए। नवरात्रि के इस पावन पर्व में आपके लिए खुशियों की बौछार हो, और आपकी मनोकामनाएं पूरी हों। आपके परिवार और समाज में सुख-शांति बनी रहे, और आपका जीवन हमेशा प्रकाशमय हो।
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
शारदीय नवरात्रि की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।
डॉ रविंद्र द्विवेदी
शिक्षक एवं साहित्यकार
चांपा जांजगीर-चांपा छग