पत्रकारित से सत्ता तक पहुँची सरकारें,अब वही पत्रकारिता निशाने पर क्यों? श्रीमती ममता सिंह
रायपुर,
छत्तीसगढ़ जर्नलिस्ट यूनियन की प्रदेश सचिव ने हमारे प्रतिनिधि को एक विशेष भेट में बताया है कि भारत का लोकतंत्र हमेशा से चौथे स्तंभ, स्वतंत्र पत्रकारिता की नींव पर खड़ा रहा है। यही पत्रकारिता कभी बोफोर्स से लेकर 2 जी और कोयला घोटालों तक की परतें उधेड़ कर सत्ता बदलने की ताक़त रखती थी। लेकिन आज जब यही पत्रकारिता सत्ता से सवाल करती है, तो उसे रोकने, डराने और सायास नियंत्रित करने के प्रयास हो रहे हैं। उन्होंने बताया है कि ताजा उदाहरण है छत्तीसगढ़ के चिकित्सा शिक्षा विभाग का 13 जून 2025 का आदेश, जिसने मीडिया पर अस्पतालों में रिपोर्टिंग के अधिकारों पर पहरा बिठा दिया है।
पत्रकारिता के दम पर कांग्रेस को घेर कर सत्ता में आई भाजपा, अब वही पत्रकारों से भयभीत क्यों? इतिहास गवाह है कि कांग्रेस के शासनकाल में पत्रकारों ने बोफोर्स घोटाले से लेकर 2 जी, कोयला आवंटन, राष्ट्रमंडल खेल, और नेशनल हेराल्ड जैसे मामलों को उजागर किया। इन्हीं घोटालों की रिपोर्टिंग ने भाजपा को “भ्रष्टाचार विरोधी” छवि देकर सत्ता में लाने का मार्ग प्रशस्त किया। चित्रा सुब्रह्मण्यम ने बोफोर्स उजागर किया, सीएजी रिपोर्टों को इंडियन एक्सप्रेस और द हिंदू ने जनता तक पहुँचाया और सुप्रीम कोर्ट तक मामलों को पहुँचाने में मीडिया की रिपोर्टें प्रमाण बनीं। लेकिन आज, वही सरकार जब पत्रकारों पर प्रतिबंध, गिरफ्तारी, प्राथमिकी और नियंत्रण की भाषा बोलती है, तो यह केवल विडंबना नहीं लोकतंत्र के लिए ख़तरा है। छत्तीसगढ़ का नया आदेश अस्पतालों में ‘सूचना नहीं, सेंसरशिप’ लागू चिकित्सा शिक्षा विभाग द्वारा जारी आदेश में मीडिया की अस्पतालों तक पहुँच को मीडिया लायजन ऑफिसर’ की अनुमति से जोड़ दिया गया है। कोई भी जानकारी, फोटो या वीडियो अब बिना मंज़ूरी नहीं ली जा सकती। यानी जनहित की सच्चाइयाँ अब सिर्फ ‘अनुमति की मोहर’ के बाद ही उजागर हो सकेंगी। क्या घायल मरीज़ के दर्द पर रिपोर्ट लिखने से पहले अब पत्रकार को फ़ॉर्म भरना होगा? क्या सरकारी लापरवाही अब ‘गोपनीय सूचना’ कहलाएगी?
प्रेस की आवाज़ दबाकर क्या हासिल होगा? यह आदेश न केवल अनुच्छेद 19(1)(ए) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सीधा उल्लंघन है, बल्कि यह दर्शाता है कि सरकार असफलताओं की रिपोर्टिंग से डरती है, ना कि झूठी अफवाहों से।
सोशल मीडिया पर भी अस्पतालों को अब ‘नीतिगत भाषा’ और ‘निर्धारित समय’ में ही जानकारी देने का निर्देश है। यानी, आम जनता को वही दिखेगा जो सरकार दिखाना चाहेगी, ना उससे ज़्यादा, ना कम।
पत्रकारिता सिर्फ सरकार की प्रेस विज्ञप्ति पढ़ने के लिए नहीं बनी
अगर पत्रकारिता ने कांग्रेस के भ्रष्टाचार को बेनकाब किया तो वही पत्रकार आज भाजपा और राज्य शासन की खामियों पर भी सवाल पूछेंगे। यही लोकतंत्र है। सरकारें आती-जाती हैं, पत्रकारों की कलम सत्ताओं से बड़ी होती है। अगर अस्पतालों में सब कुछ ठीक है तो फिर पत्रकारों से डर कैसा?
पत्रकारों को नहीं, असलियत को नियंत्रित करो
सत्ताधारी दलों को यह याद रखना चाहिए कि पत्रकारों ने कांग्रेस को गिराया था, भाजपा को सत्ता दिलाई थी, आज पत्रकार अगर सवाल कर रहे हैं, तो इसका अर्थ है कि लोकतंत्र अभी जिंदा है।
छत्तीसगढ़ के पत्रकारों, जनप्रतिनिधियों, और नागरिक समाज को इस संवैधानिक संकट के विरुद्ध खड़ा होना चाहिए। क्योंकि अगर कलम की धार कुंद कर दी गई, तो अगली बारी आपकी होगी।
“सत्ता की निगरानी करना अपराध नहीं, पत्रकारिता का धर्म है। श्रीमती ममता सिंह ने शासन से मांग की है कि स्वास्थ्य मंत्री तत्काल इस आदेश को वापस लेकर प्रेस की स्वतंत्रता को बरकरार रखे