राजधानी

बीजेपी राज में बीजेपी नेता ही परेशान, पलारी एसडीओ पर लगे आरोप दबाने का खेल! राजनीतिक संरक्षण का आरोप, पलारी एसडीओ पर उठे सवालों ने मचाया बवाल

गोविन्द राम ब्योरो चीफ


बलौदाबाजार/बिहान छत्तीसगढ़ 

छत्तीसगढ़ में पंचायत एवं ग्रामीण विकास तंत्र एक बार फिर सवालों के घेरे में है। बलौदाबाजार जिले के जनपद पंचायत पलारी के तत्कालीन उप अभियंता और वर्तमान एसडीओ (आरईएस) गोपाल कृष्ण शर्मा के विरुद्ध लंबित गंभीर शिकायतों पर कार्रवाई न होना, और माननीय उच्च न्यायालय में लंबित भर्ती प्रकरण के बावजूद नियम-विरुद्ध पदोन्नति दिए जाने का मामला अब राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में उबाल ला रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बीजेपी की सरकार में बीजेपी के ही जनप्रतिनिधि इस अधिकारी की कथित मनमानी से परेशान बताए जा रहे हैं। गोपाल कृष्ण शर्मा से जुड़ा प्रकरण अब केवल एक अधिकारी के कथित कृत्यों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सीधे-सीधे मंत्रालय और विकास भवन के शीर्ष अधिकारियों की कार्यशैली, नीयत और कर्तव्यनिष्ठा पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है। मनमानी एवं अनेकों गंभीर आरोप लंबित शिकायतें, न्यायालय में विचाराधीन भर्ती विवाद और उसके बावजूद मिला नियम विरुद्ध प्रमोशन - इन सबके बीच मंत्रालयी तंत्र का लगातार मौन रहना संयोग नहीं, बल्कि संरक्षण की बू देता प्रतीत होता है।

बीजेपी सरकार में बीजेपी के ही जनप्रतिनिधियों की बेबसी

इस पूरे प्रकरण का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि सत्तारूढ़ दल के ही जनप्रतिनिधि, बीजेपी जनपद अध्यक्ष, सरपंच संघ, वरिष्ठ भाजपा नेतागण खुले तौर पर इस अधिकारी के खिलाफ हैं। आवेदन दिए गए, पत्र लिखे गए, मंत्री स्तर तक गुहार लगाई गई, फिर भी नतीजा शून्य। यह स्थिति साफ दर्शाती है कि नौकरशाही का एक वर्ग राजनीतिक नेतृत्व और जनप्रतिनिधियों की आवाज को भी दरकिनार करने की स्थिति में है। सवाल उठता है कि जब अपनी ही सरकार में अपने ही प्रतिनिधियों की नहीं सुनी जा रही, तो आम जनता की सुनवाई की क्या स्थिति होगी?

उचित कार्रवाई हेतु जिला प्रशासन दे चुके है अनुशंसा, उपमुख्यमंत्री का कार्रवाई हेतु निर्देश

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बीजेपी के जनपद अध्यक्ष पलारी, सरपंच संघ, और पार्टी के कई स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने एसडीओ को हटाने की मांग उठाई। यहां तक कि जिला प्रशासन (कलेक्टर व जिला पंचायत सीईओ) ने भी पत्राचार कर आवश्यक कार्रवाई की अनुशंसा की, बावजूद इसके फाइलें आगे नहीं बढ़ीं। जानकारी के मुताबिक, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष व पार्टी के वरिष्ठ नेता द्वारा भी मंत्री स्तर पर पत्र लिखकर जनहित में हटाने का आग्रह किया गया। इतना ही नहीं, उपमुख्यमंत्री एवं पंचायत मंत्री के पत्र-पैड से मंत्रालय को उचित कार्रवाई के निर्देश जारी होने की बात कही जा रही है। इसके बाद भी जमीन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं यह सवाल अब और गहरा हो गया है। तथा इस निष्क्रियता ने प्रशासनिक निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।


मंत्रालय की चुप्पी: संवैधानिक दायित्व से पलायन

पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के मंत्रालयी अधिकारियों का दायित्व केवल फाइलें आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि जनहित में निष्पक्ष और समयबद्ध निर्णय लेना है। पलारी प्रकरण में शिकायतें आईं, जनप्रतिनिधियों के आवेदन आए, जिला प्रशासन की अनुशंसाएँ पहुँचीं, मंत्री स्तर से निर्देश होने की बातें सामने आईं। इसके बाद भी यदि कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती, तो यह साफ संकेत है कि मंत्रालय अपने संवैधानिक और प्रशासनिक कर्तव्यों से मुंह मोड़ रहा है। यह चुप्पी अब साधारण लापरवाही नहीं कही जा सकती, बल्कि यह सवाल उठाती है कि क्या मंत्रालय जानबूझकर इस मामले को दबाए बैठा है।

विकास भवन की भूमिका: निगरानी तंत्र या संरक्षण कवच

विकास भवन का दायित्व है कि वह मैदानी स्तर पर कार्यरत अधिकारियों की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखे और शिकायतों पर त्वरित संज्ञान ले। किंतु पलारी के मामले में विकास भवन की भूमिका निगरानीकर्ता से अधिक ढाल जैसी नजर आती है। बार-बार उठे गंभीर आरोपों के बावजूद न तो प्रभावी जांच बैठाई गई और न ही विवादित अधिकारी को संवेदनशील पद से हटाया गया। सवाल यह है कि जब शिकायतों का अंबार लगा हो, तब भी विकास भवन किस आधार पर मौन साधे बैठा है? क्या यह मौन भी किसी अदृश्य सौदेबाजी का हिस्सा है?

हाईकोर्ट में लंबित भर्ती, फिर भी प्रमोशन: कानून से ऊपर कौन?

वर्ष 2011 की उप अभियंता (सिविल) भर्ती हुई थी जिसमें आरोप है कि अनिवार्य सिविल इंजीनियरिंग डिग्री के बिना चयन किए गए अभ्यर्थियों में गोपाल कृष्ण शर्मा भी शामिल थे। यह प्रकरण माननीय उच्च न्यायालय, बिलासपुर में लंबित है। नियमों के जानकारों का कहना है कि अंतिम न्यायिक निर्णय तक ऐसे विवादित मामलों में पदोन्नति देना कानून की भावना के विपरीत है। इसके बावजूद न केवल प्रमोशन हुआ, बल्कि उसी कार्यस्थल पर सहायक अभियंता/एसडीओ (आरईएस) का दायित्व सौंपा गया जो स्थापित प्रशासनिक मर्यादाओं से टकराता है। जब उप अभियंता भर्ती से जुड़ा मामला आज भी माननीय उच्च न्यायालय में लंबित है, तब ऐसे अधिकारी को पदोन्नति देना कानूनी विवेक का खुला उल्लंघन प्रतीत होता है। सामान्य प्रशासनिक सिद्धांत कहता है कि न्यायिक निर्णय आने तक यथास्थिति बनाए रखी जाए, लेकिन यहां उल्टा हुआ। इससे यह आशंका गहराती है कि मंत्रालय और विकास भवन ने या तो कानूनी राय को नजरअंदाज किया, या फिर जानबूझकर नियमों को मोड़कर अपने चहेते को आगे बढ़ाया। दोनों ही स्थितियां शासन की साख पर गहरा धब्बा हैं।

संरक्षण और रिश्वत के आरोप: मौन ही सबसे बड़ा संदेह

मामले में मंत्रालय और विकास भवन के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों पर लाखों की रिश्वत और कमीशन लेकर फ़ाइल कों दबाने और दोषियों को बचाने के प्रयास का आरोप चर्चा में हैं। ये आरोप गंभीर हैं, लेकिन इन पर न तो कोई स्पष्ट खंडन आया और न ही जांच की घोषणा। यदि आरोप निराधार हैं, तो मंत्रालय को खुली जांच कराकर दूध का दूध और पानी का पानी करना चाहिए था। लेकिन लगातार मौन रहना इस संदेह को और मजबूत करता है कि कहीं न कहीं दाल में काला नहीं, पूरी दाल ही काली है।

प्रशासनिक नैतिकता और जनविश्वास पर सीधा प्रहार

जब एक अधिकारी पर इतने गंभीर आरोप हों और उसके बावजूद उसे न केवल बचाया जाए, बल्कि पदोन्नत भी किया जाए, तो यह संदेश जाता है कि ईमानदारी नहीं, बल्कि पहुंच और संरक्षण ही तरक्की की सीढ़ी है। इसका सीधा असर पंचायत स्तर के विकास कार्यों, प्रशासनिक पारदर्शिता और जनविश्वास पर पड़ता है। ईमानदार अधिकारी हतोत्साहित होते हैं और जनता के मन में यह धारणा बनती है कि शासन तंत्र कुछ खास लोगों के लिए ही काम करता है।

अब भी नहीं जागे तो जिम्मेदारी तय होगी

पलारी प्रकरण ने मंत्रालय और विकास भवन के सामने एक स्पष्ट आईना रख दिया है। अब भी यदि निष्पक्ष जांच, नियम-विरुद्ध प्रमोशन की समीक्षा और संरक्षण देने वालों पर कार्रवाई नहीं होती, तो यह तय माना जाएगा कि पूरी व्यवस्था दोषियों को बचाने में सहभागी है। तब यह मामला केवल एक एसडीओ तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे मंत्रालय और विकास भवन की नैतिक वैधता पर स्थायी सवाल बनकर दर्ज हो जाएगा।

शिकायत के सम्बन्ध मे उच्च अधिकारी द्वारा दस्तावेज मंगाए थे जिस पर कार्यालीन कार्यवाही करते हुए दस्तावेज को उप अभियंता के माध्यम से विकास आयुक्त कार्यालय को जमा करा दिया गया है।
योगेश खांडे
प्रभारी कार्यपालन अभियंता( आरईइस)
जिला बलौदाबाजार भाटापारा


हमारे कार्यालय को ईई(आरईएस) बलौदाबाजार द्वारा एक भी दस्तावेज नहीं दिए जिसके आधार पर हम रिपोर्ट बना सके। हमने ईएनसी कार्यालय के एसी को अग्रिम कार्यवाही चिट्ठी लिख दिए है।
रामसागर 
मुख्य अभियंता 
विकास आयुक्त कार्यालय रायपुर

Leave Your Comment

Click to reload image