राजधानी

बलौदाबाजार में मेडिकल लाइसेंस का रेट फिक्स! 40–50 हजार घूस बिना नहीं खुल रहा नया मेडिकल

गोविन्द राम ब्यूरो चीफ 

बलौदाबाजार :-जिले में मेडिकल लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया पूरी तरह से भ्रष्टाचार की गिरफ्त में आ चुकी है। फ़ार्मासिस्ट डिग्रीधारियों को अपना मेडिकल स्टोर खोलने के लिए तय शासकीय शुल्क बैंक ड्रॉफ्ट में भेजी गयी राशि के अतिरिक्त 40 से 50 हजार रुपये तक अवैध रूप से वसूले जा रहे हैं। यह रकम सीधे-सीधे संबंधित अधिकारी और कर्मचारियों की जेब में जा रही है, लेकिन भ्रष्टाचार का यह खेल इतना सुनियोजित है कि वे पैसा खुद अपने हाथों से नहीं लेते, बल्कि जिले के कुछ चुनिंदा निजी मेडिकल स्टोर्स को कलेक्शन एजेंट बनाकर पूरा खेल संचालित किया जा रहा है।

नए मेडिकल लाइसेंस के लिए आवेदन करने वाले फार्मासिस्टों को ड्रग इंस्पेक्टर और संबंधित अधिकारी खुलेआम इशारा करते हैं कि निर्धारित जगह पैसा छोड़ दें! तभी फाइल आगे बढ़ेगी। जो युवा फार्मासिस्ट घूस देने से इंकार करते हैं, उन्हें नियम-कानून के नाम पर उलझाकर महीनों चक्कर कटवाए जाते हैं। वहीं जो 40–50 हजार रुपये सेटिंग में दे देते हैं, उनका लाइसेंस बेहद आसानी से, बिना किसी आपत्ति के, जारी कर दिया जाता है।

ड्रग निरीक्षकों की यह अवैध कमाई सिर्फ लाइसेंस तक सीमित नहीं है—मेडिकल दुकानों की विजिट के नाम पर लगातार उगाही भी एक खुला राज बन चुका है। निरीक्षण की आड़ में मेडिकल स्टोर संचालकों से मनमानी रकम वसूलना जिले में पुरानी और लगातार जारी प्रथा बन चुकी है।

जनता का स्वास्थ्य और युवाओं का भविष्य सुरक्षित करने की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों पर है, वही खुलेआम भ्रष्टाचार का बाजार चलाने में लगे हैं। लाइसेंस की प्रक्रिया को कमाई का जरिया बनाकर जिले में स्वास्थ्य व्यवस्था पर सीधा प्रहार किया जा रहा है। ईमानदार और गरीब फार्मासिस्ट जहाँ अपमान व उत्पीड़न झेल रहे हैं, वहीं भ्रष्ट अधिकारियों की जेबें दिन-दुगुनी रात-चौगुनी भरती जा रही हैं।

निर्धन और मध्यमवर्गीय परिवारों से आने वाले फार्मासिस्ट पहले ही अपनी पढ़ाई पर भारी खर्च उठाकर डिग्री और डिप्लोमा हासिल करते हैं। वर्षों की मेहनत, पढ़ाई और सपनों के बाद जब वे अपना मेडिकल स्टोर खोलने आगे बढ़ते हैं, तो सिस्टम की यह बेहूदा रिश्वतखोरी उनके भविष्य पर ताला लगाने लगती है।

मेडिकल लाइसेंस प्राप्त करने के लिए 40–50 हजार तक की मोटी रकम मांगना न सिर्फ आर्थिक शोषण है, बल्कि उन युवाओं के सपनों पर सीधा प्रहार है जो मुश्किल हालात से लड़कर इस क्षेत्र में कदम रखते हैं।

वहीं भ्रष्ट अधिकारी सिर्फ पैसा लेकर लाइसेंस जारी नहीं कर रहे—बल्कि नियमावली तक को कुचलकर, अपात्र लोगों के कागज़ों को भी मंजूरी दे दे रहे हैं। दूसरी ओर वे पात्र और दस्तावेज़ तौर पर पूरी तरह योग्य आवेदक, सिर्फ इसलिए महीनों से ऑफिसों के चक्कर काटने को मजबूर हैं क्योंकि वे निर्धारित रिश्वत नहीं दे पा रहे। यह स्थिति केवल दुर्भाग्य नहीं—बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की घोर विडंबना और युवा मेडिकल पेशेवरों के साथ किया जा रहा खुला अन्याय है। खबर अभी बाकि है साक्ष्य सहित आगामी अंक में प्रकाशित होंगी....।

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