राजधानी

सुदखोरों को जेल जाने से बचा रही पुलिस पुरानी संहिता पर दर्ज अपराध को नये नियम का हवाला दे रही पुलिस बलौदाबाजार से रायपुर तक गूंज उठी पत्रकारों की हुंकार

 गोविंद राम ब्यूरो रिपोर्ट बलौदाबाजार 


जिले में हनी ट्रैप से भयादोहन के बाद दूसरी भयादोहन भी अब सर्वविदित है। जिसमें सूदखोरी के आड़ में भयादोहन का खतरनाक जाल बिछाकर न केवल निर्दोष लोगों की ज़िंदगी तबाह की जा रही है, बल्कि सच्चाई उजागर करने वाले पत्रकारों को भी टारगेट किया जा रहा है। हाल ही में पीड़ित हेमंत कनौजे द्वारा उजागर किए गए मामले ने पूरे जिले को हिला दिया है। ब्लैंक चेक और स्टांप पेपर पर हस्ताक्षर करवाकर जरूरतमंदों को फँसाना, मनमाने ब्याज दरों पर वसूली करना, विरोध करने वालों को झूठे मुकदमों की धमकी देना—यह सब सुनियोजित आपराधिक नेटवर्क का हिस्सा बन चुका है।

पीड़ित शिकायत दर्ज कराने लगा रहे थे चक्कर तब पीड़ित अपनी व्यथा लेकर प्रेस क्लब बलौदाबाजार पहुँचे। प्रेस क्लब के  पत्रकारों ने न केवल पीड़ित की आवाज़ समाचारो में उठाया बल्कि इसे जनहित का मुद्दा मानकर कलेक्टर, एसपी और कोतवाली थाना प्रभारी आदि तक ज्ञापन भी सौंपा। प्रेस क्लब बलौदाबाजार के लामबंदी एवं कलेक्टर दीपक सोनी के दबाव बढ़ने पर पुलिस ने आखिरकार पिंकी सिन्हा और उसके पति हेमलाल सिन्हा के विरुद्ध धारा 420, 506, 34 के तहत अपराध दर्ज किया, लेकिन आज तक गिरफ्तारी नहीं की गई जिससे अपराधी खुलेआम सोशल मीडिया आदि के द्वारा पत्रकारों आदि को टारगेट कर बदनाम कर खुला चैलेंज कर रहे है, जिससे प्रतीत होता है कि पुलिस का संरक्षण अपराधियों को प्राप्त हो गया है l 
अब सवाल यह उठता है कि जब पुरानी भादस संहिता के तहत गैरजमानती धाराओं में अपराध दर्ज है तो भी पुलिस किसके दबाव में चुप रह कर तमाशा देख रही है l अपराधी खुलेआम नगर एवं सोशल मीडिया प्लेटफार्मों में ऑनलाइन देखे जा रहे हैं l 

आखिर क्यों आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं जबकि पीड़ित और पत्रकार लगातार धमकियों का सामना कर रहे हैं?

 सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस सूदखोरी का जाल बलौदाबाजार से निकलकर रायपुर तक फैला हुआ है वहीं परिवार के अन्य सदस्यों के बैंक और फोन-पे स्टेटमेंट यह साफ कर रहे हैं कि आरोपी लगातार कई रसूखदारों से लेन-देन कर रहे हैं। यदि पुलिस तह तक जाए तो न जाने कितने और नाम बेनकाब होंगे। मगर प्रशासन की चुप्पी बताती है कि कहीं न कहीं प्रशासन और अपराध का गठजोड़ इस खेल को पनाह दे रहा है। सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि अपराधियों ने पत्रकारों को भी खरीदने का प्रयास किया। असफल होने पर उनके खिलाफ दुष्प्रचार फैलाया गया। अब हालत यह है कि सच लिखने और बोलने वाले पत्रकार ही निशाने पर हैं।
प्रेस क्लब बलौदाबाजार का रुख अब बेहद आक्रामक हो चुका है। पत्रकारों का साफ कहना है कि जब पुलिस सूदखोरों जैसे आदतन अपराधियों को गिरफ्तार करने से बच रही है, 
 एक तरफ गरीब और जरूरतमंद लोग जीवन भर की कमाई गंवाकर बर्बाद हो रहे हैं, परिवार उजड़ रहे हैं, लोग घर-गहना खो रहे हैं; दूसरी ओर सूदखोर बेहिसाब संपत्ति इकट्ठी कर रहे हैं और पुलिस उन्हें संरक्षण देती दिख रही है।


भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 धोखाधड़ी और बेईमानी से किसी संपत्ति की डिलीवरी के लिए किसी व्यक्ति को प्रेरित करने से संबंधित है, जिसमें अधिकतम 7 साल की कैद और जुर्माने का प्रावधान था। यह अपराध तब होता है जब कोई व्यक्ति छल करता है और उस छल से प्रेरित होकर किसी अन्य व्यक्ति को कोई संपत्ति देने या कोई मूल्यवान प्रतिभूति बनाने के लिए मजबूर करता है. हालाँकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 के लागू होने के बाद, भारतीय दंड संहिता की धारा 420 अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 318 से प्रतिस्थापित हो गई है।

किंतु पुलिस पुरानी भादस संहिता पर दर्ज किए गए अपराध को नये नियम का हवाला दे रही है l 

प्रार्थी हेमंत कन्नौजे एवं कुछ अन्य पीड़ित सहित प्रेस क्लब के पत्रकारों के साथ मुलाकात के दौरान रायपुर रेंज के आईजी अमरेश मिश्रा ने पुलिस के नए विवेकाधिकार के संबंध में बताया कि 7 साल के सजा वाले धारा में पुलिस को अपना अधिकार है गिरफ्तार करें या ना करें।

वहीं उक्त संबंध में वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश चंद्र श्रीवास्तव  से पूछे जाने पर बताया कि 
चूंकि केस पुरानी संहिता भादस की धारा 420 में रजिस्टर्ड हुआ है, जों सात साल की सजा वाला संज्ञेय एवं गैर जमानतीय हैं, ऐसी स्थिति में एफआईआर होने के बाद पुलिस को अपराधी को शीघ्र गिरफ्तार करना चाहिए। ऐसा किसी भी शीर्ष न्यायालय का कोई निर्देश नहीं है कि गिरफ्तार करना पुलिस की इच्छा पर है,ऐसा यदि कोई पुलिस अधिकारी कहता है तो वह गलत है। 

वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश चंद्र श्रीवास्तव के बयान संज्ञान अनुसार उक्त मामले में अपराधियों की गिरफ्तारी नही करने से पुलिस स्वयं संदेह के घेरे में आ चुकी हैं, अब देखना यह है कि क्या पुलिस अपराधियों की गिरफ्तारी करती हैं अथवा अपनी गलतियों पर पुनः पर्दा डालती हैं l

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