राजधानी

सीजीएमएससी घोटाला… छोटे कर्मचारी सलाखों के पीछे, बड़े अफसरों को राहत… 2016 से अब तक 300 करोड़ की गड़बड़ी, जांच अधूरी

रायपुर

,छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विस कॉर्पोरेशन (सीजीएमएससी) का घोटाला आठ साल से ज्यादा वक्त से सुर्खियों में है। 2016 से अब तक 300 करोड़ रुपए से ज्यादा की गड़बड़ी सामने आ चुकी है। एसीबी और ईओडब्ल्यू की कार्रवाई में छोटे कर्मचारी तो जेल की हवा खा रहे हैं, लेकिन बड़े अफसर अब भी बचाए जा रहे हैं। यही वजह है कि जांच की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

कब क्या हुआ

2016-17 : दवाइयों और उपकरणों की खरीदी में पहली बार गड़बड़ी पकड़ी गई

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2018 : करोड़ों की अनियमितताओं के दस्तावेज सामने आए

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2020 : घोटाले का आकार 300 करोड़ रुपए से ज्यादा बताया गया

2022-23 : एसीबी और ईओडब्ल्यू ने 45 अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ केस दर्ज किए

अब तक : 20 से ज्यादा छोटे कर्मचारी जेल, बड़े अफसर सुरक्षित

जिनके बिना बिल पास ही नहीं हो सकता था, वे बचे

बिल और भुगतान की पूरी प्रक्रिया अकाउंट सेक्शन से गुजरती थी। बिना हस्ताक्षर बिल पास होना संभव नहीं था। इसके बावजूद कार्रवाई से बाहर रखे गए… ये अधिकारी 

1.आईएएस चंद्रकांत वर्मा

2.आईएएस प्रियंका शुक्ला


3.पद्ममनी भोई (तत्कालीन प्रबंध संचालक)

4.हितेश साहू (कंप्यूटर सिस्टम संभालते थे)

5.सुखदेव (आईटी सर्वर की जिम्मेदारी)

6.अभिमन्यु (टेंडर प्रक्रिया देखते थे)

वरिष्ठ अधिवक्ता ने की है शिकायत 

वरिष्ठ अधिवक्ता नरेश चंद्र गुप्ता ने इस मामले में उच्च अधिकारियों से शिकायत की है। उनका कहना है कि छोटे कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है जबकि जिनके बिना एक भी बिल पास नहीं हो सकता था, वे जांच से बाहर हैं। उन्होंने निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की मांग की है।

 शिकायत में प्रमुख बिंदु
अकाउंट सेक्शन की जिम्मेदारी तय किए बिना सिर्फ छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई


टेंडर और आईटी सिस्टम देखने वाले अफसरों की जवाबदेही तय न होना

प्रभावशाली अधिकारियों को प्राथमिक स्तर पर क्लीनचिट देना

सभी अधिकारियों के कॉल रिकॉर्ड, फाइल नोटिंग और ईमेल ट्रेल की फोरेंसिक जांच

पूरी खरीद प्रक्रिया का थर्ड पार्टी ऑडिट और नुकसान की रिकवरी की मांग

जांच एजेंसियों पर आरोप है कि उन्होंने सिर्फ छोटे कर्मचारियों को निशाना बनाया और बड़े अफसरों को अभयदान दिया। विपक्ष ने सीधे आरोप लगाया कि सीजीएमएससी घोटाले में भी शराब घोटाले की तरह 29 अफसरों को बचाया गया।

विपक्ष का कहना है कि यह पूरा खेल मोदी सरकार और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के संरक्षण में हुआ है। वहीं आम लोगों की राय है कि जब तक बड़े अफसरों पर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक घोटाले की असली तस्वीर सामने नहीं आएगी।

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