राजधानी

रोटी की करते सब जुगाड़...

सबको रोटी पाने का समान अधिकार,
दो जून की रोटी की करते सब जुगाड़।
गरीबों को ही खूब तेज भूख सता रही,
पापी पेट की आग क्या होती बता रहीं।
मजदूर के बच्चों ने थामें हाथ में कटोरे,
जीवन हैं चलायमान व्यक्ति कहाँ बटोरे।

सबको रोटी पाने का समान अधिकार,
दो जून की रोटी की करते सब जुगाड़।
कहती हैं भूख के बिलख ना मर जाना,
कहीं से आटा कहीं से तेल लेके आना।
जंगल से कुछ लकड़ी मिल ही जाएगी,
एक आग जलाएँ दूजी भूख मिटाएगी।

संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)
मो. 98260 25986

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