मुड़ियाडीह धमनी के जंगल मे 200 से अधिक सागौन के पेड़ की अवैध कटाई,सोता रहा बीट गॉर्ड कई महीनों से हो रही है कटाई, ठूठ मे नए उगे पौधे दे रही गवाही
वनविभाग बलौदाबाजार द्वारा जिले में वनसंरक्षण को लेकर वैसे तो नाना प्रकार के आयोजन, अभियान, प्रशिक्षण, जनजागरूकता कार्यक्रम, वृक्षारोपण और संरक्षण वाली दर्जनों पहल चलाई जा रही हैं,लेकिन इन सबके बीच वनविभाग अपने मूल उद्देश्य को ही भूल गयी है। विभाग का मूल दायित्व जंगलों की रक्षा करना, वृक्षों का संरक्षण-संवर्धन करना और वन संपदा को सुरक्षित रखना है, लेकिन जिस प्रकार बलौदाबाजार वनपरिक्षेत्र अंतर्गत मुड़ियाडीह धमनी जंगल क्षेत्र में बड़े स्तर पर सागौन के पेड़ों को अवैध रूप से काटा गया है, उसने विभागीय दावों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर उजागर कर दिया है। जों की चलाई जा रही विभिन्न मुहीम को खोखला साबित कर रही है। बलौदाबाजार वनविभाग द्वारा एक ओर पर्यावरण संरक्षण के नाम पर जागरूकता अभियान, पौधारोपण कार्यक्रम और सरकारी उपलब्धियों का प्रचार किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर मुड़ियाडीह और धमनी के जंगलों के भीतर बड़ी संख्या में कटे हुए सागौन के पेड़, ठूंठ और प्रभावित क्षेत्र स्पष्ट रूप से दिखाई देना कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। यदि जंगल ही सुरक्षित नहीं रह पा रहे हैं तो फिर लगातार चल रही मुहिमों का वास्तविक परिणाम क्या है? स्थानीय सूत्र बता रहे है क़ि इसके अलावा अनेकों सैगोन पेड़ की कटाई पूर्व वर्षो से हो रही है जिसके प्रमाण कटे पेड़ के ठूठ मे उगे पौधे दे रहे है अगर अवैध पेड़ कटाई हाल ही का होता तो इतने जल्दी पौधे पेड़ के रूप नहीं ले पाती है इससे साफ है कि वन विभाग के उच्च अधिकारीयो को धोखे मे रखकर पेड़ को कटवाया गया है। तो वही जिले के वनमंडलधिकारी बीते महीनों मे कई बार धमनी गाँव मे दौरे किये किन्तु उनको भी अवैध पेड़ कटाई की सुध न मिली। भले ही जिला बलौदाबाजार भाटापारा वनविभाग की चर्चा राष्ट्रीय पटल पर हुए हो पर जमीनी हकीकत कुछ और ही बया कर रही है इससे कुछ माह पूर्व सोनाखान के जंगलो मे सैगोन के अवैध कटाई की चर्चा रही जिसे जांच मे लीपापोती फाइल के कागजो तक सिमटा कर रख दी गयी। इससे स्पष्ट है कि धरातल मे जाकर देखा जाये तो हर एक वन परिक्षेत्र मे यही हाल है। कुछ कुछ कर्मचारी- अधिकारी का खुलासा हो रहा है तों वही बाकि कई कर्मचारी अधिकारी द्वारा कड़ी मेहनत कर अनियमितता को छिपाया जा रहा है जिसके तरीके कुछ भी सकता है।
क्षेत्र में सामने आए दृश्य यह सवाल उठाने के लिए पर्याप्त हैं कि आखिर वन विभाग की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है। यदि इतने बड़े स्तर पर जंगल प्रभावित हुआ तो क्या संबंधित जिम्मेदारों को इसकी जानकारी नहीं थी, या जानकारी होने के बावजूद समय रहते रोकथाम नहीं की गई? स्थानीय स्तर पर लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब जंगलों की सुरक्षा के लिए बीट स्तर से लेकर उच्च अधिकारियों तक पूरा तंत्र मौजूद है, तब ऐसी स्थिति कैसे निर्मित हुई। जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं बल्कि वन्यजीवों, जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन की आधारशिला होते हैं। ऐसे में यदि बड़े पैमाने पर वृक्षों का नुकसान हुआ है तो इसका प्रभाव केवल वन क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा।
अब मांग उठ रही है कि पूरे क्षेत्र का संयुक्त निरीक्षण कराया जाए, वास्तविक नुकसान का आंकलन सार्वजनिक किया जाए तथा निगरानी और संरक्षण व्यवस्था की जवाबदेही तय की जाए। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो नियमानुसार कार्रवाई भी सुनिश्चित की जाए।
हालांकि जंगलो की सुरक्षा की प्राथमिक और सबसे ज्यादा जिम्मेदारी बीट गॉर्ड की होती है। वृहत संख्या मे सागौन पेड़ो की अवैध कटाई के पीछे कारण स्पष्ट रूप से क्षेत्र के बीट गॉर्ड की लापरवाही प्रतीत हो रही है। जंगलो मे लगातार कुल्हाड़ी चलता रहा और वही बीट गॉर्ड गहरी नींद मे सोया रहा। यहाँ तक नदी के तट को सुरक्षित रखने के लिए किया गया वृक्षारोपण पर भी कुल्हाड़ी चलाया गया है,अवैध रेत के परिवहन के लिए जंगलों के बीचो के पेड़ो को भी काटा गया है।