संस्कृति

रायपुर में जगन्नाथ पुरी-काशी विश्वनाथ मंदिर की थीम पर पंडाल:

रायपुर 

शारदीय नवरात्रि की षष्ठी तिथि के साथ बंगाली दुर्गा पूजा उत्सव की शुरुआत हो गई है। रायपुर के माना इलाके में दुर्गोत्सव की रौनक देखते ही बन रही है। यहां पुरी के जगन्नाथ मंदिर और काशी विश्वनाथ मंदिर की तर्ज पर भव्य पंडाल तैयार किया गया है।

इस पंडाल को तैयार करने में कोलकाता से आए कारीगरों ने महीनों मेहनत की है। खास बात यह है कि इस आयोजन में भव्यता के साथ बंगाली परंपराओं का भी पूरा ध्यान रखा जा रहा है।

सालों से चली आ रही इस परंपरा में माता की प्रतिमा बनाने से पहले वेश्यालय के स्थान सहित अन्य जगहों से मिट्टी और नदियों का जल मंगवाया जाता है। मान्यताओं के अनुसार, इनका उपयोग कर माता की प्रतिमा तैयार की जाती है।

माना कैंप की सार्वजनिक श्री श्री दुर्गा पूजा समिति ने इस बार पुरी के जगन्नाथ मंदिर की थीम चुनी है। समिति के अध्यक्ष रंजीत कुमार डे ने बताया कि पंडाल को तैयार करने में करीब डेढ़ महीने का समय लगा। कोलकाता से आए 22 कारीगरों ने मिलकर इसे तैयार किया। केवल पंडाल निर्माण में करीब 20 से 22 लाख रुपए खर्च हुए हैं।

रंजीत कुमार डे ने बताया कि साल 1995 में पूजा का बजट करीब 47 हजार रुपए था, जो आज बढ़कर 45 से 48 लाख रुपए तक पहुंच गया है। पंडाल तैयार करने का काम कोलकाता के कारीगरों ने किया है, जबकि सड़क पर आकर्षक रोशनी की व्यवस्था कोलकाता के चंदननगर के कारीगरों ने की है।

माता की प्रतिमा बनाने में भी कोलकाता के कारीगरों के साथ स्थानीय कारीगर बिजू घोष सहयोग करते हैं। इस तरह आयोजन में बाहर से आने वाले कारीगरों के अनुभव और स्थानीय कलाकारों की भागीदारी दोनों देखने को मिलती हैं।

मान बाजार सार्वजनिक दुर्गा पूजा समिति पिछले 53 साल से दुर्गा पूजा की परंपरा को आगे बढ़ा रही है। समिति के बुजुर्गों ने करीब 50 साल पहले 1100 से 1200 रुपये के बजट में पूजा की शुरुआत की थी। आज पूजा का बजट बढ़कर करीब 35 से 40 लाख रुपये तक पहुंच गया है। समिति का उद्देश्य बुजुर्गों की शुरू की गई परंपरा को आगे बढ़ाने के साथ आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाना है।

समिति के सचिव विष्णु नाथ पाल ने बताया कि हर साल हिंदू धार्मिक परंपराओं के अनुसार पूजा और कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इस बार काशी विश्वनाथ मंदिर की तर्ज पर पंडाल तैयार किया गया है।

विष्णु नाथ पाल ने बताया कि बंगाली दुर्गा पूजा में परंपराओं का विशेष महत्व है। माता की प्रतिमा बनाने के लिए बंगाली परंपरा के अनुसार वेश्यालय के स्थान से मिट्टी लाई जाती है। इसके साथ ही प्रतिमा बनाने वाले कलाकार कोलकाता की कुम्हार टोली से भी मिट्टी लाते हैं। यह परंपरा आज भी जारी है।

उन्होंने बताया कि पूजा में जल से जुड़ी परंपरा का भी पालन किया जाता है। गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों से जल लाने की परंपरा है। वहां से जल लाना संभव नहीं होने के कारण 21 घरों से गंगाजल एकत्र किया जाता है। इस गंगाजल को मिलाकर परंपरागत विधि से पूजा की प्रक्रिया शुरू की जाती है। इसके बाद साधारण पानी मिलाकर माता की प्रतिमा तैयार करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है।

बंगाली दुर्गा पूजा में माता की प्रतिमा बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली मिट्टी और पानी का विशेष महत्व है। इस परंपरा के बारे में माना कैंप के श्यामल कुमार भौमिक ने बताया कि प्रतिमा बनाने के लिए मिट्टी मुख्य रूप से कोलकाता से लाई जाती है। वहां अलग-अलग स्थानों से मिट्टी एकत्र करके रखी जाती है। इसी तरह, कई स्थानों से पानी भी एकत्र किया जाता है।

उन्होंने बताया कि मूर्ति बनाने वाले कलाकार हर जगह जाकर खुद मिट्टी और पानी इकट्ठा नहीं करते। कोलकाता में दुकानदारों के पास अलग-अलग स्थानों से लाई गई मिट्टी और पानी पहले से एकत्र रहता है। कलाकार वहां से इसे खरीदकर लाते हैं और प्रतिमा बनाने में इस्तेमाल करते हैं।

बंगाली परंपरा के अनुसार, मिट्टी अलग-अलग स्थानों से लाई जाती है। इनमें वेश्यालय के बाहर की मिट्टी से जुड़ी मान्यता भी शामिल है। इसके अलावा, प्रतिमा निर्माण में इस्तेमाल होने वाला जल भी कई स्थानों से एकत्र किया जाता है। इन सामग्रियों को मिलाकर माता की प्रतिमा तैयार की जाती है।

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