DMF में पर्यावरण के नाम पर ₹14.70 करोड़ का प्रावधान, फिर प्रदूषण पर लगाम लगाने में सिस्टम क्यों नाकाम?
सेमराडीह में कथित अपशिष्ट जलाने और दुर्गंध की शिकायत से उठे सवाल; खपराडीह की घटना के बाद भी निगरानी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न
योजनाओं और बजट का हिसाब दीजिए! ग्रामीणों को साफ हवा, सुरक्षित वातावरण और शिकायतों से राहत कब मिलेगी?
गोविंद राम ब्यूरो चीफ
बलौदाबाजार, 27 अक्टूबर 2026।
सीमेंट उद्योगों की पहचान रखने वाले बलौदाबाजार-भाटापारा जिले में पर्यावरण संरक्षण की योजनाएं भी हैं, खनन प्रभावित क्षेत्रों के लिए करोड़ों रुपये के वित्तीय प्रावधान भी बताए जा रहे हैं और प्रदूषण रोकने के लिए नियम-कानून भी मौजूद हैं। लेकिन जब औद्योगिक क्षेत्रों के आसपास रहने वाले ग्रामीण दुर्गंध और कथित अपशिष्ट जलाने की शिकायत लेकर सामने आते हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है—आखिर योजनाओं, बजट और निगरानी व्यवस्था का लाभ जमीन पर दिखाई क्यों नहीं दे रहा?
एक ओर जिला खनिज न्यास (डीएमएफ) की कार्ययोजना में पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण, हरित पट्टी, जल संचयन और तालाबों के जीर्णोद्धार जैसे कार्यों के लिए बड़ी रकम दर्ज है। दूसरी ओर, सेमराडीह के ग्रामीणों की शिकायतें प्रशासनिक निगरानी और औद्योगिक अपशिष्ट के निस्तारण पर सवाल खड़े कर रही हैं। ऐसे में अब केवल आश्वासन से काम नहीं चलेगा। जनता को यह जानने का अधिकार है कि पर्यावरण के नाम पर निर्धारित राशि का कितना उपयोग हुआ, प्रदूषण संबंधी शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई और जिम्मेदारी किसकी है?
₹14.70 करोड़ का हिसाब सार्वजनिक हो, कागजों से बाहर निकले पर्यावरण संरक्षण
उपलब्ध डीएमएफ कार्ययोजना संबंधी विवरण में पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण से जुड़ी पांच मदों में कुल ₹14.70 करोड़ की राशि दर्ज बताई गई है। इन मदों में वृक्षारोपण, हरित पट्टी विकास, जल संचयन, जल निकासी, तालाबों का उन्नयन और अन्य पर्यावरणीय कार्य शामिल हैं।
विवरण के अनुसार राशि का ब्योरा—
- ₹1 करोड़: खनन प्रभावित ग्राम पंचायतों एवं नगरीय निकायों में वृक्षारोपण और हरित पट्टी विकास।
- ₹7.50 करोड़: खनन प्रभावित ग्राम पंचायतों में जल संचयन, जल निकासी और तालाबों का उन्नयन एवं जीर्णोद्धार।
- ₹1.20 करोड़: खनन प्रभावित नगरीय निकायों में जल संचयन, जल निकासी और तालाबों के उन्नयन संबंधी कार्य।
- ₹4 करोड़: ग्राम पंचायतों एवं नगरीय निकायों में पर्यावरण संरक्षण, तालाबों के जीर्णोद्धार, वृक्षारोपण और हरित पट्टी संबंधी कार्य।
- ₹1 करोड़: पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और आवश्यक आकस्मिक कार्यों के लिए प्रावधान।
इन राशियों का कुल योग ₹14.70 करोड़ है। हालांकि, इसे अंतिम स्वीकृत बजट या वास्तविक खर्च मानने से पहले मूल सरकारी दस्तावेज से पुष्टि आवश्यक है।
लेकिन सवाल अपनी जगह कायम है—यदि ये वित्तीय प्रावधान पर्यावरणीय समस्याओं को कम करने के उद्देश्य से किए गए हैं, तो उनके परिणामों का सार्वजनिक लेखा-जोखा क्यों सामने नहीं होना चाहिए?
कितने गांवों में हरित पट्टी विकसित हुई? कितने तालाबों का जीर्णोद्धार पूरा हुआ? कितनी राशि खर्च हुई? कितने काम अधूरे हैं? और इन कार्यों से खनन प्रभावित ग्रामीणों को कितना वास्तविक लाभ मिला?
जनता को केवल राशि का आंकड़ा नहीं, बल्कि काम का प्रमाण चाहिए। पौधारोपण के दावे हैं तो पौधों की स्थिति सामने आए, तालाबों के जीर्णोद्धार का प्रावधान है तो पूर्ण कार्यों की सूची सार्वजनिक हो और प्रदूषण नियंत्रण के लिए धन निर्धारित है तो उसके परिणामों की भी समीक्षा हो।
नियम लागू, फिर निगरानी का हिसाब कहां?
केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा अधिसूचित ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 एक अप्रैल 2026 से प्रभावी हुए। इन नियमों के तहत कचरे के पृथक्करण, प्रबंधन और निर्धारित श्रेणी के बड़े कचरा उत्पादकों की जिम्मेदारियों से संबंधित प्रावधान किए गए हैं।
अब इन नियमों के लागू होने के छह महीने बाद जिले में इनके क्रियान्वयन की स्थिति सामने आनी चाहिए।
क्या संबंधित विभागों ने पात्र बड़े कचरा उत्पादकों की पहचान की है? क्या उनके पंजीयन और अनुपालन की जांच हो रही है? क्या कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण की व्यवस्था का निरीक्षण किया जा रहा है? और क्या नियमों के उल्लंघन की शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई की जा रही है?
यदि निगरानी नियमित है, तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। यदि कहीं कमी है, तो उसे दूर करने के लिए जिम्मेदारी और समयसीमा तय की जाए।
यहां एक बात स्पष्ट होना भी जरूरी है कि सामान्य ठोस अपशिष्ट, औद्योगिक अपशिष्ट और खतरनाक अपशिष्ट के नियमन में अंतर है। इसलिए किसी संयंत्र में कथित रूप से जलाए गए पदार्थ की प्रकृति की पहचान और लागू नियमों का निर्धारण तकनीकी जांच के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
सेमराडीह में दुर्गंध की शिकायत, ग्रामीणों का सवाल—सुनवाई हुई तो समाधान क्यों नहीं दिखा?
कुकुरदी स्थित अल्ट्राटेक सीमेंट संयंत्र के संबंध में ग्राम पंचायत सेमराडीह के ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि संयंत्र परिसर में कथित रूप से अज्ञात रासायनिक अपशिष्ट जलाए जाने के बाद गांव में तेज दुर्गंध फैल गई। ग्रामीणों ने इससे परेशानी होने की बात कहते हुए मामले को स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़ा गंभीर विषय बताया है।
पंचायत प्रतिनिधियों के अनुसार, इससे पहले भी संयंत्र प्रबंधन और जिला प्रशासन को लिखित शिकायत दी गई थी। समस्या दोबारा सामने आने पर सरपंच प्रमिला वर्मा, सरपंच प्रतिनिधि जितेंद्र कुमार वर्मा और पंचों ने संयंत्र पहुंचकर एचआर हेड अंतर्यामी तथा सीएसआर हेड राजेंद्र कुशवाहा को ज्ञापन सौंपा। पंचायत ने कथित अपशिष्ट का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण करने और दुर्गंध की समस्या का स्थायी समाधान करने की मांग की है। ग्रामीणों ने कार्रवाई नहीं होने पर आंदोलन की चेतावनी भी दी है।
अब सवाल सीधे हैं—पहली शिकायत के बाद निरीक्षण हुआ या नहीं? वायु गुणवत्ता की जांच कराई गई या नहीं? कथित अपशिष्ट के नमूने लिए गए या नहीं? संयंत्र के अपशिष्ट निस्तारण संबंधी रिकॉर्ड की जांच हुई या नहीं?
यदि जांच हुई है तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक होनी चाहिए। यदि जांच नहीं हुई है तो इसकी वजह बताई जानी चाहिए।
यह सही है कि केवल शिकायत के आधार पर किसी संयंत्र को नियम उल्लंघन का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन शिकायत को नजरअंदाज करना भी समाधान नहीं है। निष्पक्ष तकनीकी जांच और उसके निष्कर्षों का सार्वजनिक खुलासा ही ग्रामीणों की आशंकाओं को दूर करने का रास्ता है।
खपराडीह की घटना से क्या सबक मिला?
22 जनवरी 2025 को खपराडीह के शासकीय हाई स्कूल में 38 से अधिक बच्चों के बीमार पड़ने की घटना सामने आई थी। उपलब्ध विवरण के अनुसार, बच्चों को सांस लेने में परेशानी, चक्कर, आंखों में जलन और उल्टी जैसी शिकायतें हुई थीं। कुछ बच्चों के बेहोश होने की भी जानकारी सामने आई थी। उन्हें सुहेला, भाटापारा और बलौदाबाजार के अस्पतालों में भर्ती कराया गया था।
घटना के बाद तत्कालीन कलेक्टर दीपक सोनी सहित प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंचे थे। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, श्री सीमेंट संयंत्र के अल्टरनेट फ्यूल रिसोर्स सेंटर के एक हिस्से को सील कर जांच के निर्देश दिए गए थे।
खपराडीह की घटना और सेमराडीह की शिकायत को एक ही कारण से जोड़ना उचित नहीं होगा, क्योंकि दोनों मामलों के बीच प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करने के लिए प्रमाण आवश्यक हैं। लेकिन इन घटनाओं के संदर्भ में एक बड़ा सवाल जरूर उठता है—औद्योगिक क्षेत्रों के आसपास बसे गांवों में पर्यावरणीय निगरानी कितनी प्रभावी है?
क्या संवेदनशील गांवों की पहचान कर नियमित वायु गुणवत्ता परीक्षण की व्यवस्था बनाई गई? क्या स्कूलों और आबादी वाले क्षेत्रों के आसपास संभावित प्रदूषण की निगरानी की जा रही है? क्या पुराने मामलों की जांच से मिले निष्कर्षों के आधार पर सुधारात्मक कदम उठाए गए?
यदि ऐसी व्यवस्था लागू है, तो उसके परिणाम जनता के सामने रखे जाने चाहिए। यदि नहीं, तो अब और देरी क्यों?
डीएमएफ की राशि अलग, प्रदूषण नियंत्रण की जिम्मेदारी अलग—लेकिन जवाबदेही से कोई बच नहीं सकता
पर्यावरण संरक्षण के लिए डीएमएफ से होने वाले कार्य और औद्योगिक प्रदूषण पर नियंत्रण की जिम्मेदारी अलग-अलग व्यवस्थाओं के अंतर्गत आती हैं। डीएमएफ के कार्यों का उद्देश्य खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास और पर्यावरणीय समस्याओं को कम करने में योगदान देना है, जबकि औद्योगिक इकाइयों के प्रदूषण और अपशिष्ट प्रबंधन की निगरानी संबंधित सक्षम विभागों एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दायरे में आती है।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि डीएमएफ में राशि दर्ज होने मात्र से औद्योगिक प्रदूषण रुक जाना चाहिए। लेकिन जब पर्यावरण संरक्षण पर करोड़ों रुपये के प्रावधान बताए जा रहे हों और उसी जिले में ग्रामीण प्रदूषण संबंधी शिकायतें उठा रहे हों, तो योजनाओं, निगरानी और वास्तविक परिणामों की समीक्षा करना जरूरी हो जाता है।
प्रशासन को बताना चाहिए कि पर्यावरण संरक्षण की योजनाओं से खनन प्रभावित क्षेत्रों को क्या लाभ मिला, औद्योगिक शिकायतों पर संबंधित विभागों ने क्या कार्रवाई की और अलग-अलग व्यवस्थाओं के बीच समन्वय कैसे किया जा रहा है।
बजट का प्रावधान उपलब्धि नहीं, स्वीकृति खर्च का प्रमाण नहीं और शिकायत का समाधान केवल आश्वासन नहीं। उपलब्धि तभी मानी जाएगी, जब धरातल पर काम दिखे, जांच निष्पक्ष हो और प्रभावित ग्रामीणों को वास्तविक राहत मिले।
प्रशासन और संबंधित विभागों से पांच तीखे सवा
बलौदाबाजार-भाटापारा जिले में पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा अब केवल सरकारी योजनाओं, विभागीय बैठकों और वित्तीय प्रावधानों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह ग्रामीणों के जीवन, सुरक्षित हवा, स्वच्छ जल और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा सवाल है।
सेमराडीह की शिकायत की निष्पक्ष जांच हो, खपराडीह की घटना से संबंधित जांच और सुधारात्मक कदमों की स्थिति स्पष्ट की जाए, डीएमएफ के कार्यों की ग्रामवार प्रगति सार्वजनिक हो और अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के अनुपालन की समीक्षा सामने लाई जाए।
यदि नियमों का पालन हो रहा है तो प्रमाण सामने रखे जाएं। यदि कहीं उल्लंघन पाया जाता है तो नियमानुसार कार्रवाई हो। और यदि निगरानी व्यवस्था में कमियां हैं तो जिम्मेदारी तय कर उन्हें दूर किया जाए।
आखिर पर्यावरण संरक्षण के नाम पर योजनाएं भी हों, करोड़ों के प्रावधान भी हों और नियम भी लागू हों—फिर ग्रामीणों को अपनी शिकायतों के समाधान के लिए बार-बार आवाज क्यों उठानी पड़े?