संस्कृति

विश्व कल्याण के प्रणेता पुरी शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वतीजी

अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट

जगन्नाथपुरी — सनातन धर्म ध्वजा के परम संवाहक विश्व के महान विभूति अनन्तश्री विभूषित गोवर्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वतीजी महाभाग इस मठ की शंकराचार्य परम्परा के 145 वें स्थान पर प्रतिष्ठित हैं। बिहार राज्य के मिथिलांचल स्थित तत्कालीन दरभङ्गा ( वर्तमान में मधुबनी ) जिलान्तर्गत हरिपुर बक्सीटोल नामक ग्राम में आषाढ कृष्ण त्रयोदशी, बुधवार , रोहिणी नक्षत्र, पाम सम्वत् 2000 तदनुसार 30 जून 1943 ई. को श्रोत्रिय कुलभूषण दरभङ्गा नरेश के राजपण्डित श्रीलालवंशी झा जी और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती गीता देवी को एक पुत्ररत्न प्राप्त हुआ जिनका नाम नीलाम्बर झा रखा गया। वही नीलाम्बर झा वर्तमान पुरीपीठाधीश्वर अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती महाभाग के नाम से ख्यापित हैं। बालक नीलाम्बर में बाल्यकाल से ही अनेक विलक्षणतायें दिखने लगीं । सोलह वर्ष की अवस्था में आप संग्रहणी रोग से ग्रसित हो गये , रोग निरन्तर बढ़ता गया ।

जीवन से निराश होकर एक दिन वे अपने पिता के समाधि स्थल पर गये और विधिवत् दण्डवत कर वहाँ की मिट्टी का एक कण मुँह में डाला और पिताजी से प्रार्थना की कि या तो यह शरीर इसी समय स्वस्थ हो जाये या शव हो जाये। अचानक एक चमत्कार हुआ , किसी अदृश्य दिव्य शक्ति ने आपको वेगपूर्वक उठा दिया। तत्काल आपका ध्यान नभोमंडल की ओर गया जहाँ बड़ा ही विचित्र दृश्य दिखलायी पड़ा। नभोमण्डल में पृथ्वी से लगभग दस किलोमीटर की ऊँचाई पर वृत्ताकार पद्मासन पर बैठे , श्वेतवस्त्र और पगड़ी धारण किये दस हजार पितरों ने आपको दर्शन दिया और आपको उन सबों की अन्तर्निहित वाणी सुनाई दी कि संग्रहणी रोग दूर हो गया , अब घर लौट जाओ और निर्भय विचरण करो।

आपकी प्रारम्भिक शिक्षा गांँव में हुई और उच्चविद्यालय की शिक्षा अपने अग्रज श्री श्रीदेव झा के संरक्षण में दिल्ली के तिबिया कॉलेज में प्रारम्भ की। वहाँ आप कई सामाजिक , धार्मिक एवं शैक्षणिक संस्थाओं से भी जुड़े। दसवीं कक्षा में विज्ञान के छात्र थे तब जिस भवन में आपका निवास था उसके पास में ही दशहरे के अवसर पर रामलीला का मंचन आयोजित था। एक रात्रि आप भवन की छत पर टहलते हुये रामलीला के मंचन का संवाद सुन रहे थे। प्रभु श्रीराम के वनवास जाने की लीला का प्रसङ्ग सुनते ही आपके मन में यह प्रबल भाव उत्पन्न हुआ कि जब मेरे प्रभु भगवान श्रीरामका वनवास हो गया तब मेरे यहाँ बने रहने का कोई औचित्य नहीं है। मन में प्रबल वैराग्य उत्पन्न हुआ और आप चुपचाप पैदल ही काशी के लिये प्रस्थान कर दिये। यात्रा के दौरान आप नैमिषारण्य पहुँचे जहाँ परमपूज्य दंडीस्वामी श्रीनारदानन्द सरस्वतीजी महाराज के सम्पर्क में आने का संयोग सधा।

पूज्य स्वामीजी ने आपका नाम ध्रुवचैतन्य रखा। कालान्तर में आप सर्वभूतहृदय यतिचक्रचूड़ामणि धर्मसम्राट स्वामी करपात्रीजी महाभाग के सम्पर्क में आये और उनके द्वारा चलाये गये गोरक्षा अभियान में भी आपने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। उस अभियान के अन्तर्गत 07 नवम्बर 1966 को दिल्ली में आयोजित विशाल सम्मेलन में भी आप शामिल हुये जिसमें पुलिस द्वारा छोड़े गये अश्रुगैस के कारण आप मूर्छित भी हो गये थे। तत्पश्चात 09 नवम्बर को आपको बन्दी बना कर 52 दिनों तक दिल्ली के तिहाड़ जेल में रखा गया । वैशाख कृष्ण एकादशी गुरुवार पामसंवत् 2031 तदनुसार 18 अप्रेल 1974 को हरिद्वार में पूज्यपाद धर्मसम्राट स्वामी हरिहरानन्द सरस्वतीजी महाराज ( धर्मसम्राट् करपात्रीजी महाराज ) के चिन्मय कर कमलों से आपका सन्यास सम्पन्न हुआ। सन्यास के बाद उन्होंने आपका नाम निश्चलानन्द सरस्वती रखा और अब आप इसी नाम से पूरे विश्व में जाने जाते हैं। पुरी मठ के तत्कालीन पूर्वाचार्य पूज्यपाद श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निरञ्जनदेव तीर्थजी महाराज ने माघ शुक्ल षष्ठी तदनुसार 09 फरवरी 1992 को अपने करकमलों से आपको पुरीपीठ के 145 वें श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य के पद पर अभिषिक्त किया। इस महिमामय पद पर प्रतिष्ठित होने के बाद आपने पद का उपभोक्ता ना बनकर पद के उत्तरदायित्व का सम्यक् निर्वहन करने का निर्णय लिया।

सनातन धर्म तथा उसके प्रामाणिक मानबिन्दुओं की रक्षा , राष्ट्र की अखण्डता तथा विश्वकल्याण के लिये संघर्ष करने का व्रत लिया। धर्मसम्राट स्वामी श्रीकरपात्री महाराजके कृपापात्र शिष्य एवं पुरीमठ के पूर्वाचार्य स्वामी श्रीनिरञ्जनदेवतीर्थ जी महाराज द्वारा श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य पद पर अभिषिक्त स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वतीजी महाराज ने विश्वकल्याण एवं राष्ट्रप्रेम की भावना से भावित होकर व्यासपीठ एवं शासनतंत्र का शोधन करने तथा कालान्तर से विकृत एवं विलुप्त हो चुके ज्ञान - विज्ञान को परिमार्जित करने एवं पूर्ण शुद्धता के साथ पुनः उद्भासित करने का अपना लक्ष्य बनाया। अपने लक्ष्य की सिद्धि के लिये महाराजश्री ने पीठपरिषद के अन्तर्गत ‘आदित्यवाहिनी’, ‘आनन्दवाहिनी’, ‘हिन्दुराष्ट्रसंघ’, ‘राष्ट्रोत्कर्ष अभियान’, ‘सनातन सन्तसमिति’ जैसे संस्थाओं की भी स्थापना की जिसका उद्देश्य है अन्यों के हित का ध्यान रखते हुये हिन्दुओं के अस्तित्व और आदर्श की रक्षा तथा देश की सुरक्षा और अखण्डता। आपने समस्त प्रामाणिक एवं प्रमुख सनातन धर्माचार्यों को एक मंच पर लाने का भी अभियान चलाया।

श्रीरामजन्मभूमि पर भव्य राममन्दिर निर्माण के लिये राष्ट्रीय स्तर पर जो अभियान चला उसमें महाराजश्री की प्रमुख भूमिका रही। अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि स्थल पर आस - पास मन्दिर और मस्जिद दोनों का निर्माण नहीं होने देने का श्रेय एकमात्र पुरी पीठाधीश्वर श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्दजी महाभाग को ही जाता है। श्रीरामजन्मभूमि स्थल पर ही राममन्दिर और मस्जिद दोनों का निर्माण कराने के लिये भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव द्वारा गठित रामालय ट्रस्ट पर महाराजश्री के अतिरिक्त शंकराचार्यों ने सहमति प्रदान करते हुये हस्ताक्षर कर दिया था। किन्तु विविध प्रकार के प्रलोभन तथा भय दिये जाने पर भी महाराजश्री ने हस्ताक्षर नहीं किया क्योंकि उनके चिन्तन के अनुसार वह राष्ट्रहित , धर्महित एवं चिरकालिक शान्ति के उद्देश्य के विपरीत था। महाराजश्री ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि भारत में कहीं भी बाबर के नाम पर प्रतीक के रूप में मस्जिद का निर्माण नहीं चाहिये। जब भारत सरकार ने भगवान श्रीराम द्वारा निर्मित रामसेतु को तोड़ने का काम प्रारम्भ किया तो महाराजश्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब रामसेतु टूट ही जायेगा तब यह शरीर रहकर क्या करेगा ?

महाराजश्री ने चीन की सीमा से लेकर रामेश्वरम् तक की यात्रा की तथा रामेश्वरम में 150 भक्तों के साथ रामसेतु की रक्षा हेतु अभियान चलाया और प्रार्थना की। उन्होंने इस सन्दर्भ में श्रीलंका की सरकार तथा संयुक्त राष्ट्रसंघ से भी सम्पर्क साधा था , परिणाम यह हुआ कि अभी रामसेतु सुरक्षित है। हिन्दुओं के प्रमुख मानबिन्दुओं के रक्षा हेतु संकल्पित महाराजश्री के मार्गदर्शनमें पुरीमठ द्वारा 22 प्रकार की निशुल्क सेवायें संचालित होती है जिसमें गोवर्द्धनगोशाला , औषधालय , मन्दिर , आवास , भोजनालय , वाचनालय , पुस्तकालय , समुद्र आरती , बच्चों के लिये यज्ञोपवीत से लेकर वेदविद्यालय तक की शिक्षा आदि प्रमुख है। इसके साथ ही वृन्दावन , काशी और प्रयाग , होशियापुर, रायपुर आदि स्थानों पर स्थित आश्रमों में भी भक्तों को नि:शुल्क सेवायें उपलब्ध करायी जाती है। महाराजश्री विज्ञान के पक्षधर हैं , उनका मानना है कि वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक तीनों धरातलों पर जो सही साबित हो , वही अनुकरणीय है।

आज विश्व में विकास की होड़ मची है लेकिन वेद - विहीन विज्ञान के अंधाधुन्ध अनुकरण और विकास के वास्तविक स्वरूप को नहीं समझ पाने के कारण पूरा विश्व विकास के नाम पर विनाश के कगार पर पहुँच चुका है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुये पुरी शंकराचार्य महाराज जी वेद - विहीन विज्ञान की जगह वेद - सम्मत , शास्त्र - सम्मत , ज्ञान - विज्ञान के प्रचार - प्रसार और प्रयोग पर बल दे रहे हैं। विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में ऐसा वैचारिक परिवर्तन लाने के उद्देश्य से शंकराचार्य महाराज विभिन्न वैज्ञानिक , तकनीकि संस्थानों सहित अन्य शिक्षण संस्थानों विश्वविद्यालयों , प्राद्यौगिकी संस्थानों आदि में दिव्य प्रवचनों के द्वारा अपेक्षित मार्गदर्शन दे रहे हैं। इस प्रकार महाराजश्री राष्ट्ररक्षा , धर्मरक्षा , राष्ट्रोत्कर्ष , प्राचीन एवं आधुनिक विज्ञान तथा तकनीक , सुरक्षा , वाणिज्य , संस्कृति , विकृत ज्ञान - विज्ञान का शोधन तथा लुप्त ज्ञान - विज्ञान को पुनः उद्भाषित करने , विश्वशान्ति , विश्वबन्धुत्व एवं प्राणीमात्र के कल्याण सम्बन्धी विषयों पर निरन्तर चिन्तन– मनन करते रहते हैं और भारत तथा नेपाल के प्रमुख शिक्षण संस्थानों , औद्योगिक प्रतिष्ठानों , सामाजिक - धार्मिक कार्यक्रमों एवं गोष्ठियों में वरिष्ठ नागरिकों , युवाओं एवं छात्रों के बीच प्रवचन कर मार्गदर्शन प्रदान कर रहे हैं।

सनातन वैदिक वाङ्मय सम्बन्धि लेखन के क्षेत्र में भी महाराजश्री का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण योगदान है। अभी तक उनके द्वारा विरचित लगभग एक सौ सत्तर से अधिक ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं , जिनमें डेढ़ दर्जन से अधिक ग्रन्थ वैदिक वाङ्मय में अन्तर्निहित गणित पर हैं। अभी तक 110 से अधिक देशों के गणितज्ञ और वैज्ञानिक महाराजश्री से गणित पर मार्गदर्शन ले चुके हैं। महाराज श्री द्वारा विरचित ‘स्वस्तिक गणित’ नामक पुस्तक ने ऑक्सफोर्ड तथा कैम्ब्रीज विश्वविद्यालयों सहित अनेक देशों एवं विश्वविद्यालयों के गणितज्ञों को विशेषरूप से आकर्षित किया है। उनके द्वारा विरचित गणित के नौवें ग्रन्थ ‘गणितसूत्रम्’ में 304 सूत्र हैं जिनमें 61सूत्र वेदों एवं उपनिषदों से लिये गये हैं बाकी 242 स्वयं महाराजश्री द्वारा रचित है। गोवर्द्धनमठ पुरी के वर्तमान श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वतीजी महाभाग का मानना है कि सनातन परम्परा के अनुसरण और क्रियान्वयन से विश्व में शान्ति स्थापित होगी और भारत पुन: विश्वगुरु बनकर प्राणी मात्र के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करेगा।

महाराजश्री एक महान् संत , चिन्तक , राष्ट्रभक्त तथा सिद्धपुरुष हैं। पूर्व में इन्हें मारने की अनेक योजनायें रची गयी। इन्हें दो बार विष पिलाया गया, पाँच बार नाग से डंसवाया गया तथा 22 बार शीशे का चूर्ण पिलाया गया है तथापि प्रभु द्वारा निर्धारित कार्य को सिद्ध करने के लिये ये ‘अमृतजस्य पुत्र’ के रूप में हमारे बीच विद्यमान हैं। ऐसे सिद्धपुरुष के मार्गदर्शन से सबका कल्याण सुनिश्चित है। अत: आप सब अपने कल्याण की भावना से उनके अभियान से जुड़ें ऐसी भावना है। वर्तमान में आपके द्वारा उद्भाषित हिन्दू राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया पर पूरे विश्व की निगाह है कि किस प्रकार इसके क्रियान्वयन से विश्व का परिदृश्य बदल सकता है एवं विनाश के कगार पर बैठी सम्पूर्ण मानवता की रक्षा संभव हो सकेगी। 

                                                                                             अरविन्द तिवारी 
                                                                              पुरी शंकराचार्य आश्रम / मीडिया प्रभारी

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