उर्मिला मेमोरियल हॉस्पिटल पर गंभीर सवाल: मरीजों का इलाज या बिल बढ़ाने का खेल?
रायपुर
राजधानी रायपुर का उर्मिला मेमोरियल हॉस्पिटल एक बार फिर विवादों में घिरता नजर आ रहा है। हाल ही में सामने आए एक वीडियो में अस्पताल की कथित कार्यप्रणाली और मरीजों से वसूले जा रहे इलाज के खर्च को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। वीडियो में दावा किया जा रहा है कि सामान्य अथवा कम गंभीर स्थिति वाले मरीजों को भी आईसीयू में भर्ती कर इलाज के नाम पर भारी-भरकम बिल बनाया जा रहा है।
बताया जा रहा है कि हाल ही में एक व्यक्ति के सिर पर मामूली चोट लगी थी। आरोप है कि उसे अस्पताल में आईसीयू में भर्ती कर दिया गया। वहां तीन बोतल चढ़ाई गईं, एक गोली दी गई और कुछ जांच कराई गईं। इसके बाद एक दिन का बिल करीब 25 से 35 हजार रुपये तक पहुंचने की बात सामने आई है।
चोट सिर पर, बिल जेब पर भारी!
मामला यही सवाल खड़ा करता है कि यदि मरीज की हालत गंभीर नहीं थी तो उसे आईसीयू में भर्ती करने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या हर मामूली चोट का इलाज आईसीयू में ही होगा या फिर आईसीयू अस्पताल की कमाई का नया रास्ता बन गया है?
अगर सामने लगाए जा रहे आरोप सही हैं तो स्थिति कुछ ऐसी नजर आती है—मरीज अस्पताल पहुंचा इलाज कराने, लेकिन अस्पताल ने पहले उसकी जेब का इलाज शुरू कर दिया!
पुराने मामले ने भी खड़े किए थे सवाल
उर्मिला मेमोरियल हॉस्पिटल को लेकर इससे पहले भी एक मामला चर्चा में रहा है। बताया जाता है कि एक व्यक्ति सामान्य पेट दर्द की शिकायत लेकर खुद बाइक चलाकर अस्पताल पहुंचा था। आरोप है कि उसका ऑपरेशन किया गया और वह करीब दो महीने तक अस्पताल में भर्ती रहा। बाद में उसकी मौत हो गई।
इस घटना को लेकर भी अस्पताल की उपचार प्रक्रिया और मरीज के इलाज को लेकर सवाल उठे थे। हालांकि इन मामलों की आधिकारिक जांच और निष्कर्ष सामने आना जरूरी है, ताकि आरोपों की वास्तविकता स्पष्ट हो सके।
इलाज का मंदिर या बिल बनाने की मशीन?
स्वास्थ्य सेवा को आम आदमी जीवन बचाने की उम्मीद के साथ देखता है। लेकिन यदि किसी अस्पताल में मरीज की बीमारी से ज्यादा उसके बिल पर ध्यान दिए जाने के आरोप लगें तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
—रायपुर में शायद नया इलाज शुरू हो गया है, मरीज की हालत देखकर नहीं, उसकी जेब देखकर आईसीयू तय किया जाता है!
मरीज को कितनी देर आईसीयू में रखना है, कौन-कौन सी जांच जरूरी है और कौन सी दवा दी जानी है—इन सभी सवालों का जवाब चिकित्सकीय रिकॉर्ड और विशेषज्ञ जांच से ही मिल सकता है।
प्रशासन की नजर कब पड़ेगी?
अब सबसे बड़ा सवाल स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन से है। यदि अस्पताल के खिलाफ शिकायतें सामने आ रही हैं और वीडियो के माध्यम से गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं, तो क्या विभाग इसकी जांच करेगा?
क्या अस्पताल के आईसीयू में भर्ती मरीजों के रिकॉर्ड, जांच रिपोर्ट, दवाइयों और बनाए गए बिलों की जांच होगी? क्या यह देखा जाएगा कि मरीज को वास्तव में आईसीयू की आवश्यकता थी या नहीं?
मरीज और उसके परिजन अस्पताल इलाज और भरोसे के लिए पहुंचते हैं, आर्थिक शोषण के लिए नहीं।
उर्मिला मेमोरियल हॉस्पिटल पर लगाए जा रहे आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि आरोप गलत हैं तो अस्पताल प्रबंधन को तथ्य सामने रखकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
अब सवाल सिर्फ एक अस्पताल का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जहां मरीज की मजबूरी कहीं किसी के लिए कमाई का जरिया तो नहीं बन रही।