राजधानी

ऐतिहासिक बावड़ी में डूबने से दो बच्चों की मृत्यु, सार्वजनिक स्थलों की सुरक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर प्रश्न


धरसीवां के कुंवरगढ़ स्थित प्राचीन चतुर्भुजी मंदिर परिसर में हुई दुर्घटना ने ऐतिहासिक धरोहरों पर सुरक्षा प्रबंधन और बाल संरक्षण उपायों की आवश्यकता को फिर रेखांकित किया।

रायपुर 

रायपुर जिले के धरसीवां विकासखंड स्थित कुंवरगढ़ (कुंरा) के प्राचीन चतुर्भुजी मंदिर परिसर में शनिवार को हुई एक दुखद दुर्घटना में दो मासूम बच्चों की डूबने से मृत्यु हो गई। लगभग 25 से 30 फीट गहरी प्राचीन बावड़ी में गिरने के कारण सात वर्षीय साक्षी साहू और चार वर्षीय श्रवण धीवर की जान चली गई। इस घटना ने न केवल दोनों परिवारों को गहरे शोक में डाल दिया है, बल्कि सार्वजनिक एवं ऐतिहासिक स्थलों पर सुरक्षा प्रबंधन की प्रभावशीलता को लेकर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

पुलिस के अनुसार, मृतक साक्षी साहू पिता योगेश साहू तथा श्रवण धीवर पिता भूपेंद्र धीवर, दोनों कुंरा गांव के निवासी थे। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार दोनों बच्चे अन्य बच्चों के साथ मंदिर परिसर में खेल रहे थे। इसी दौरान वे बावड़ी के समीप पहुंच गए और असंतुलित होकर गहरे पानी में चले गए। बावड़ी की अधिक गहराई तथा सुरक्षा अवरोधों के अभाव के कारण दोनों स्वयं बाहर नहीं निकल सके।

काफी देर तक बच्चों के घर नहीं लौटने पर परिजनों एवं ग्रामीणों ने उनकी खोजबीन शुरू की। मंदिर परिसर में तलाश के दौरान बावड़ी पर संदेह होने पर पुलिस को सूचना दी गई। सूचना मिलते ही धरसीवां थाना पुलिस घटनास्थल पहुंची। स्थानीय गोताखोरों तथा ग्रामीणों के सहयोग से दोनों बच्चों को बावड़ी से बाहर निकाला गया, किंतु तब तक उनकी मृत्यु हो चुकी थी। पुलिस ने पंचनामा की कार्रवाई पूरी कर शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।

धरसीवां थाना प्रभारी राजेंद्र दीवान ने बताया कि प्रारंभिक जांच में मामला दुर्घटनावश डूबने का प्रतीत होता है। उन्होंने कहा कि मर्ग कायम कर जांच प्रारंभ कर दी गई है तथा सभी पहलुओं की जांच की जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि घटना से संबंधित तथ्यों का परीक्षण किया जाएगा और आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने के बाद प्रतिवेदन प्रस्तुत किया जाएगा।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि मंदिर परिसर की यह बावड़ी ऐतिहासिक महत्व की धरोहर है, जहां प्रतिदिन श्रद्धालुओं एवं ग्रामीणों का आना-जाना लगा रहता है। इसके बावजूद बावड़ी के चारों ओर न तो स्थायी सुरक्षा घेराबंदी है और न ही चेतावनी संबंधी सूचना-पट्ट लगाए गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे जलस्रोतों के आसपास सुरक्षा मानकों का पालन नहीं होने से दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ जाती है। इस घटना के बाद ग्रामीणों ने प्रशासन से तत्काल सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने की मांग की है।

यह दुर्घटना केवल एक स्थानीय घटना नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्थलों के जोखिम प्रबंधन, बाल सुरक्षा और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के बीच संतुलित नीति की आवश्यकता को भी रेखांकित करती है। यदि समय रहते संरचनात्मक सुरक्षा उपाय अपनाए जाएं तो भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को काफी हद तक रोका जा सकता है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार इस दुर्घटना में सात वर्षीय साक्षी साहू और चार वर्षीय श्रवण धीवर की मृत्यु हुई। दोनों बच्चे कुंवरगढ़ स्थित प्राचीन चतुर्भुजी मंदिर परिसर में खेलते समय लगभग 25 से 30 फीट गहरी बावड़ी में डूब गए। सूचना मिलने पर धरसीवां थाना पुलिस, स्थानीय गोताखोर और ग्रामीण मौके पर पहुंचे। बच्चों को बाहर निकाला गया, लेकिन तब तक उनकी मृत्यु हो चुकी थी। पुलिस ने मर्ग कायम कर जांच शुरू कर दी है।

ग्रामीणों ने प्रशासन से बावड़ी के चारों ओर मजबूत जाली, सुरक्षा रेलिंग और चेतावनी बोर्ड लगाने की मांग की है। उनका कहना है कि मंदिर परिसर में प्रतिदिन बच्चों और श्रद्धालुओं की आवाजाही रहती है, इसलिए नियमित निगरानी, सुरक्षा मानकों का पालन तथा ऐतिहासिक जल संरचनाओं का समय-समय पर सुरक्षा परीक्षण कराया जाना आवश्यक है।
कुंरा की यह घटना स्पष्ट करती है कि ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण केवल उनकी संरचना तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि वहां आने वाले लोगों की सुरक्षा भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। जलस्रोतों के आसपास वैज्ञानिक सुरक्षा प्रबंधन, जोखिम मूल्यांकन, चेतावनी संकेत और प्रभावी निगरानी व्यवस्था अनिवार्य की जानी चाहिए। बाल सुरक्षा को केंद्र में रखकर स्थानीय प्रशासन, ग्राम समुदाय और अभिभावकों की साझा जिम्मेदारी ही भविष्य में ऐसी दुखद घटनाओं की रोकथाम का प्रभावी माध्यम बन सकती है।

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