राजधानी

सिलतरा क्षेत्र में औद्योगिक आतंक से बंजर होती किसानों की उपजाऊ भूमि और प्रशासनिक तंत्र की लाचारी तेजाबी पानी से जलती फसलें और ज़हरीले होते तालाब सुशासन की नाक के नीचे बंजर होती अन्नदाताओं की तकदीर

धरसींवा।  राजधानी रायपुर से सटे सिलतरा औद्योगिक क्षेत्र के गांवों में विकास की चमक के पीछे विनाश की एक ऐसी खौफनाक पटकथा लिखी जा रही है, जो आने वाले समय में पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मरुस्थल में तब्दील कर देगी। औद्योगिकरण के नाम पर रसूखदार उद्योगपतियों की मनमानी इस कदर चरम पर पहुंच चुकी है कि ग्राम पंचायत मोहदी, चरौदा और अकोली के किसानों का अस्तित्व पूरी तरह खतरे में आ गया है। इस पूरे इलाके में जनहित को ताक पर रखकर चंद पूंजीपतियों की तिजोरियां भरने और कृषि भूमि को जबरन बंजर बनाने का एक बहुत बड़ा और संगठित सिंडिकेट सक्रिय दिखाई दे रहा है। सबसे हैरान और विचलित करने वाली बात यह है कि इस महाविनाश के सामने पूरा जिला प्रशासन असहाय और बौना साबित हो रहा है, जिससे सरकार के सुशासन और किसान-हितैषी होने के दावों की खुलेआम धज्जियां उड़ रही हैं। इस औद्योगिक आतंक का सबसे खौफनाक चेहरा चरौदा से मोहदी मार्ग पर साफ देखा जा सकता है, जहां कभी धान की हरी-भरी फसलें लहलहाती थीं, वहां आज कई एकड़ उपजाऊ खेतों में फैक्ट्रियों की जहरीली काली डस्ट और फ्लाई ऐश के ऊंचे-ऊंचे पहाड़ खड़े कर दिए गए हैं।

बॉक्स खबर,,,
प्रशासनिक जांच के घेरे में औद्योगिक कचरे का काला खेल,,,

स्थानीय स्तर पर रची जा रही इस साजिश का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि खुद ग्राम पंचायत मोहदी के कोटवार ने ही अपनी जमीन पर उद्योगों की काली डस्ट पटवा दी है। जिस कोटवार पर गांव की सुरक्षा, शासकीय भूमि की हिफाजत और प्रशासनिक सूचना की अहम जिम्मेदारी होती है, वही कोटवार उद्योग प्रबंधन के साथ साठगांठ कर अपनी शासकीय सेवा भूमि को चंद रुपयों के लालच में इस ज़हरीले कचरे से पाटने में लगा हुआ है। इस आत्मघाती कदम से न केवल वह सरकारी जमीन हमेशा के लिए बर्बाद हो रही है, बल्कि तेज हवाओं और बारिश के पानी के साथ मिलकर *यह ज़हरीली डस्ट आसपास के दर्जनों किसानों के खेतों में फैल रही है, जिससे पड़ोसी किसानों की उपजाऊ जमीन की उर्वरा शक्ति भी हमेशा के लिए दम तोड़ रही है।*हालांकि, इस गंभीर मामले के उजागर होने और ग्रामीणों के बढ़ते आक्रोश के बाद आखिरकार प्रशासन की तंद्रा थोड़ी टूटी है और संबंधित तहसीलदार ने पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच के आदेश जारी कर दिए हैं। अब देखना यह होगा कि तहसीलदार के ये आदेश केवल कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाते हैं या फिर इस भ्रष्ट सांठगांठ पर कोई कड़ा एक्शन होता है।

फसलों पर तेजाब और तालाबों में जहर: औद्योगिक प्रदूषण ने छीना किसानों का हक और मवेशियों का आसरा,,,

उद्योगों का यह क्रूर खेल यहीं नहीं थमता, बल्कि चरौदा के एक पीड़ित किसान की कृषि भूमि पर तो एक रसूखदार उद्योग ने सीधे अपने प्लांट का तेजाबी और केमिकल युक्त जहरीला पानी छोड़ दिया है। इस केमिकल के भराव के कारण किसान की लहलहाती फसल देखते ही देखते जलकर खाक हो गई और भूमि विशेषज्ञों का मानना है कि इस तेजाबी पानी के कारण अब इस जमीन पर भविष्य में कभी भी कृषि कार्य नहीं किया जा सकेगा। इस तरह एक झटके में एक हंसते-ख्लेजते किसान परिवार के जीवनयापन का एकमात्र साधन छीन लिया गया। ऐसी ही भयावह और दिल दहला देने वाली स्थिति ग्राम पंचायत अकोली में भी देखने को मिल रही है, जहां ग्रामीणों के निस्तारी और मवेशियों के पीने के पानी का मुख्य साधन रहा ३० एकड़ का विशाल 'पहाड़ी तालाब' अब उद्योगों के कचरे और रासायनिक पानी के कारण पूरी तरह प्रदूषित होकर एक ज़हरीले नाले में तब्दील हो चुका है। ग्रामीण रोष और बेबसी के साथ दावा कर रहे हैं कि इस तालाब का पानी अब मवेशियों के छूने लायक भी नहीं बचा है।

नेताओं की चुप्पी और अफसरों की सुस्ती: अन्नदाता की तबाही पर स्वयंभू मसीहा और जिम्मेदार विभाग मौन

इन तमाम हालातों के बीच सबसे चुभता हुआ सवाल उन तमाम स्वयंभू किसान नेताओं और राजनीतिक दलों पर उठता है, जो चुनाव आते ही किसानों के हक में बड़ी-बड़ी बातें करते हैं और खुद को धरतीपुत्रों का मसीहा बताते हैं। आज जब किसानों की जमीनें छीनी जा रही हैं, उनके जलस्रोत ज़हरीले किए जा रहे हैं, तब ये तथाकथित किसान हितैषी नेता इन ताकतवर उद्योगों के खिलाफ आखिर क्यों अपनी आवाज बुलंद नहीं कर रहे हैं? नेताओं की यह चुप्पी साफ इशारा करती है कि कहीं न कहीं उद्योगों के रसूख के आगे उनके हौसले पस्त हो चुके हैं। इस पूरी तबाही को शह देने में राजस्व विभाग और पर्यावरण विभाग की सुस्त और संदिग्ध भूमिका भी पूरी तरह उजागर हो चुकी है। राजस्व विभाग के अधिकारी और कर्मचारी अपनी एयरकंडीशनर कमरों वाली 'कुर्सी तोड़' ड्यूटी में इस कदर मसरूफ हैं कि उन्हें दफ्तर से बाहर निकलकर किसानों का आंसू पोंछने की फुर्सत नहीं है, वहीं पर्यावरण विभाग प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर हंटर चलाने के बजाय अपनी आंखें मूंदे बैठा है। जब पूरा प्रदेश सुशासन का उत्सव मना रहा है, ऐसे समय में अपनी ही जमीन के मालिक बेबस किसान अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं और न्याय की भीख मांग रहे हैं।

वर्जन

औद्योगिक कचरे  और केमिकल युक्त पानी से किसानों की उपजाऊ भूमि व तालाबों को नुकसान पहुंचने की शिकायतें मिली हैं। कोटवार द्वारा सेवा भूमि पर डस्ट डलवाने और किसानों की फसलों के बर्बाद होने के मामले को पूरी गंभीरता से लिया गया है। इस पूरे प्रकरण की विस्तृत जांच के आदेश जारी कर दिए गए हैं। टीम जल्द ही मौके का मुआयना कर रिपोर्ट सौंपेगी।

श्री बाबूलाल कुर्रे
 तहसीलदार धरसींवा

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