राजधानी

मंत्री, सांसद, विधायक और अन्य जन प्रतिनिधि अपने काफिले में गाड़ी कम कर सकते हैं

मंत्री, सांसद, विधायक और अन्य जन प्रतिनिधि अपने काफिले में गाड़ी कम कर सकते हैं 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार दूसरे दिन देश के लोगों से अपील की है कि जितना संभव हो पेट्रोल-डीजल के कम से कम खपत करें। इस अपील को ध्यान में रखकर भास्कर एक सवाल खड़ा कर रहा है। कि क्या छत्तीसगढ़ में इस तरह की मितव्ययता के लिए हमारे जनप्रतिनिधि और सरकारी अमले के लोग तैयार हैं।

अमूमन ऐसा देखा गया है कि मंत्री, सांसद, विधायक और अन्य जनप्रतिनिधि अपना रौब जमाने के लिए काफिले में जरूरत से कहीं अधिक वाहन लेकर चलते हैं। देखा तो यह भी गया है कि बिना किसी सरकारी ओहदे के चलने वाले सांसद, विधायक, जिला पंचायत के सदस्य और पार्षद तक कई-कई गाड़ियों के साथ चलते हैं। ऐसा केवल सत्ता पक्ष ही नहीं, विपक्ष के नेता और जनप्रतिनिधि तक करते हैं।

दरअसल, भास्कर ने अपनी पड़ताल में पाया कि जिस मंत्री के काफिले में तीन से पांच गाड़ियां चल सकती हैं, उसमें कई बार 8 से 10 गाड़ियों का काफिला दौड़ता है। इनमें सुरक्षा वाहन, एस्कॉर्ट, निजी स्टाफ, समर्थकों की गाड़ियां और विभागीय वाहन भी शामिल रहते हैं।

इससे पेट्रोल-डीजल की खपत तो बढ़ ही रही है, सरकार पर अनावश्यक वित्तीय बोझ बढ़ता है। यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि राज्य में पेट्रोल-डीजल की खपत बढ़ रही है और सप्लाई बाधित होने से कई पंपों पर ड्राइ होने के हालात बन रहे हैं। प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि यदि वीआईपी काफिलों में अनावश्यक वाहनों को सीमित किया जाए तो हर महीने हजारों लीटर ईंधन की बचत संभव है।

. पुलिस वाहनों पर ढाई साल में 300 करोड़ का पेट्रोल-डीजल खर्च

विधानसभा के मानसून सत्र 16 जुलाई 2025 में कांग्रेस विधायक चातुरी नंद के सवाल पर गृहमंत्री विजय शर्मा ने बताया था कि पिछले ढाई साल में पुलिस वाहनों में करीब 300 करोड़ रुपए का पेट्रोल-डीजल खर्च हुआ है। वर्तमान में पुलिस विभाग में करीब 22 हजार सरकारी वाहन संचालित हैं, जबकि 66 हजार निजी वाहन किराए पर लेकर विभिन्न सुरक्षा और प्रशासनिक कार्यों में लगाए गए हैं।

इन वाहनों के संचालन पर भारी मात्रा में ईंधन खर्च हो रहा है। आंकड़ों के अनुसार सरकारी वाहनों में ढाई साल के दौरान लगभग 130 करोड़ रुपए का पेट्रोल-डीजल खर्च हुआ, जबकि किराए के निजी वाहनों में यह खर्च करीब 170 करोड़ रुपए तक पहुंच गया।

नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग में ही ढाई साल में 116 करोड़ रुपए का डीजल-पेट्रोल खर्च हुआ। इसमें सरकारी वाहनों पर लगभग 45 करोड़ रुपए और निजी किराए के वाहनों पर 71 करोड़ रुपए खर्च किए गए।

बीजापुर में एक साल में करीब 16 करोड़ का डीजल खर्च हुआ। राजधानी रायपुर में भी एक साल में लगभग 8 करोड़ का ईंधन खर्च सामने आया है। रायपुर में वीआईपी ड्यूटी, पेट्रोलिंग और प्रशासनिक मूवमेंट इसकी बड़ी वजह मानी जा रही है।

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