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रायपुर में हड़कंप: उर्मिला मेमोरियल हॉस्पिटल में भर्ती मरीज की मौत, परिजनों ने लगाया लापरवाही और मिलीभगत का आरोप

-:रायपुर में हड़कंप: उर्मिला मेमोरियल हॉस्पिटल में भर्ती मरीज की मौत, परिजनों ने लगाया

लापरवाही और मिलीभगत का आरोप:-

रायपुर। राजधानी रायपुर के भाठागांव स्थित उर्मिला मेमोरियल हॉस्पिटल में भर्ती एक मरीज की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के बाद शहर में आक्रोश फैल गया है। मृतक की पहचान रामचरण वर्मा (कृषक) के रूप में हुई है, जो ग्राम मुंगेशर (चन्द्रखुरी), थाना मंदिर हसौद के निवासी थे। वे 4 दिसंबर 2025 को सामान्य पेट दर्द की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंचे थे। करीब ढाई माह तक चले इलाज, तीन बार सर्जरी और लाखों रुपये खर्च होने के बाद अस्पताल प्रबंधन ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन, पुलिस प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि यह केवल चिकित्सकीय जटिलता का मामला नहीं, बल्कि लापरवाही, आर्थिक शोषण और प्रशासनिक संरक्षण का परिणाम है।

भर्ती से लेकर सर्जरी तक: क्या हुआ अस्पताल के भीतर?

परिजनों के अनुसार, 4 दिसंबर 2025 को रामचरण वर्मा स्वयं बाइक चलाकर अस्पताल पहुंचे थे। डॉक्टरों ने प्रारंभिक जांच के बाद पेट में गांठ होने की बात कही। बायोप्सी रिपोर्ट सामान्य (नॉर्मल) बताई गई, जिससे परिवार को राहत मिली।

11 दिसंबर को डॉक्टरों ने लेजर सर्जरी करने की बात कही। परिवार से मौखिक सहमति ली गई और आश्वासन दिया गया कि सर्जरी के लगभग 10 दिन बाद मरीज को छुट्टी दे दी जाएगी।

लेकिन परिजनों का आरोप है कि लेजर सर्जरी के बजाय ओपन सर्जरी (चीरा लगाकर) की गई। बाद में उन्हें बताया गया कि सर्जरी सफल नहीं रही और दोबारा ऑपरेशन करना पड़ेगा।

परिवार का दावा है कि मरीज का कुल तीन बार ऑपरेशन किया गया। इस दौरान हर बार नई दवाइयों और प्रक्रियाओं के नाम पर अतिरिक्त पैसे जमा करने को कहा जाता रहा। परिजनों का कहना है कि उन्होंने डॉक्टरों की हर बात पर भरोसा किया और लगातार पैसे जमा करते रहे।

संक्रमण और बिगड़ती हालत

कुछ दिनों बाद जब परिजनों ने मरीज की हालत नजदीक से देखी तो उन्हें ऑपरेशन वाले स्थान पर संक्रमण (इन्फेक्शन) दिखाई दिया। इस बारे में पूछने पर अस्पताल प्रबंधन ने कहा कि यह सामान्य प्रक्रिया है और कुछ दिनों में सुधार हो जाएगा।

परिजनों के अनुसार, उन्हें लगातार “कुछ दिन और” का आश्वासन दिया जाता रहा, लेकिन हालत में कोई ठोस सुधार नहीं हुआ। मरीज की स्थिति धीरे-धीरे बिगड़ती गई।

करीब ढाई माह तक अस्पताल में भर्ती रहने के बाद अंततः अस्पताल प्रबंधन ने रामचरण वर्मा को मृत घोषित कर दिया।

25 लाख से अधिक की वसूली का आरोप

परिवार का आरोप है कि इलाज के नाम पर उनसे 25 लाख रुपये से अधिक की रकम ली गई। शुरुआत में लगभग डेढ़ लाख रुपये का अनुमान बताया गया था, लेकिन बाद में बिल लगातार बढ़ता गया।

परिजनों के अनुसार:

लगभग 17 लाख रुपये नकद जमा कराए गए।

3 लाख रुपये आयुष्मान कार्ड से समायोजित किए गए।

करीब 5 लाख रुपये अन्य मदों में लिए गए।

इसके बावजूद मरीज की जान नहीं बच सकी। परिवार का आरोप है कि उन्हें इलाज की वास्तविक स्थिति से अवगत नहीं कराया गया और केवल भुगतान के लिए दबाव बनाया जाता रहा।

शव को बिना सूचना हटाने का आरोप

सोमवार रात जब अस्पताल प्रबंधन ने मरीज को मृत घोषित किया, तब परिजन अस्पताल के सामने विरोध प्रदर्शन पर बैठ गए। उनका आरोप है कि उसी रात बिना उन्हें बताए शव को चुपके से जिला अस्पताल रायपुर भेज दिया गया।

परिजनों ने पूरी रात अस्पताल के बाहर बिताई। सुबह पुलिस मौके पर पहुंची और परिवार के सदस्यों तथा सहयोगियों को बस में बैठाकर बराड़ेरा, चन्द्रखुरी के पास छोड़ दिया।

जब परिजनों ने शव के बारे में पूछा तो पुलिस ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए कहा कि पोस्टमार्टम के लिए शव को जिला अस्पताल भेजा गया है। मंगलवार सुबह 10 बजे परिजनों को बताया गया कि 11:30 बजे पोस्टमार्टम होगा।

परिजन जब जिला अस्पताल पहुंचे तो उन्हें बताया गया कि शव को मेकाहारा अस्पताल ले जाया गया है। इसके बाद परिवार वहां पहुंचा। इस पूरी प्रक्रिया में परिजनों को स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई, जिससे उनके संदेह और गहरे हो गए।

पुलिस प्रशासन पर पक्षपात का आरोप

परिजनों का आरोप है कि पुलिस प्रशासन पूरे घटनाक्रम के दौरान अस्पताल प्रबंधन की सुरक्षा करता नजर आया। उनका कहना है कि विरोध कर रहे परिवारजनों को हटाया गया, लेकिन अस्पताल प्रबंधन से किसी प्रकार की पूछताछ सार्वजनिक रूप से नहीं की गई।

परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि पोस्टमार्टम की पर्ची पर हस्ताक्षर के लिए मानसिक दबाव बनाया गया। हालांकि पुलिस की ओर से इन आरोपों पर अब तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।

स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी

घटना के बाद स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। परिजनों का कहना है कि यदि निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो वे आंदोलन तेज करेंगे।

अब तक स्वास्थ्य विभाग या राज्य के स्वास्थ्य मंत्री की ओर से कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आया है। इस चुप्पी ने सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर प्रभावी निगरानी हो रही है या नहीं।

परिवार का दर्द और न्याय की मांग

मृतक रामचरण वर्मा अपने परिवार के इकलौते कमाने वाले सदस्य थे। उनके पुत्र राजकुमार वर्मा और पुत्री संगीता वर्मा सहित पूरा परिवार गहरे सदमे में है।

परिवार का कहना है कि वे केवल न्याय चाहते हैं। उनका आरोप है कि यदि समय रहते सही इलाज और पारदर्शिता बरती जाती तो शायद रामचरण की जान बचाई जा सकती थी।

उठते सवाल

यह मामला कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है:

क्या लेजर सर्जरी के नाम पर ओपन सर्जरी करना मेडिकल प्रोटोकॉल के अनुरूप था?

क्या संक्रमण की जानकारी समय पर साझा की गई?

क्या वसूली गई राशि का स्पष्ट हिसाब है?

शव को बिना सूचना हटाने की क्या मजबूरी थी?

क्या पुलिस और प्रशासन की भूमिका निष्पक्ष रही?


इन सवालों के जवाब फिलहाल जांच के बाद ही सामने आ सकेंगे।

रायपुर की यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि निजी स्वास्थ्य संस्थानों की जवाबदेही, प्रशासनिक पारदर्शिता और मरीजों के अधिकारों से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन गई है।

जब तक स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच नहीं होती, तब तक संदेह और आक्रोश बना रहेगा। एक ओर परिवार अपने प्रियजन को खोने के दुख में न्याय की गुहार लगा रहा है, वहीं दूसरी ओर शहर की जनता स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा रही है।

अब देखना यह है कि प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग इस मामले में क्या कदम उठाते हैं और क्या रामचरण वर्मा के परिवार को न्याय मिल पाता है या नहीं।

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