जिला

सब का कारण है सभ्यता

गिरी कंदराओं से निकालकर ,
वनमानुष को मानुष में ढाल कर ।
विवेक ज्योति का संचार कर ,
मानव जाति पर उपकार कर ।
धारा से उठाकर चांद पर,
 आज मानव को उतार कर।
 यह हमने पाई  जो योग्यता,
 सब का कारण है सभ्यता ।
       धरा पर तृण न उगता था कभी ,
       भूखे-प्यासे लाले थे सभी ।
        बिलखता था, मां का लाल ,
         ममता रोती देख बेटे का हाल ।
        बीत गया सब कष्ट काल,
         छाया हरित क्रांति का जाल ।
         मरुस्थल में भी आई रमणीयता,
         सब का कारण है सभ्यता ।

सर छुपाने को न था ठिकाना,
 घास -फूस का था आशियाना ।
फुटपाथ बनाकर बिस्तर ,
आसमान को ओढ़े बनाकर चादर ।
अब हो गई सर पर छाया ,
जब से हमने विकास पथ को पाया।
झोपड़ के जगह ली भवनों की भव्यता,
सबका कारण है सभ्यता ।
              बढ़ गया मेरे मन की पीड़ा,
              जब मेरे अंतर द्वन्द ने छेड़ा ।
              भूल गए सब प्रेम की भाषा,
              हो गई सबको धन की अभिलाषा 
               टूट रहे हैं  अब सारे रिश्ते ,
               नैतिकता सिर्फ बन गये किस्से।
               होने लगी अब धन की पूजा,
   इससे बढ़कर अब कोई नहीं  दूजा ।                अब जज्बातों का कद्र कहां,?
                 पाश्चात्य का रंग चढ़ा हो जहां।
                 कर्मों से कर दिया उसे दग्धता ,
           इसलिए हमसे दूर हो रही सभ्यता ।

सुरेश मानिकपुरी 
खरसिया, रायगढ़

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