प्रेस क्लब अध्यक्ष सलूजा ने पत्रकारों के खिलाफ मामले वापस लेने की मांग की
हरदीप सिंह सलूजा ब्यूरो जांजगीर- चांपा
चाम्पा, प्रेस क्लब के अध्यक्ष कुलवन्त सिंह सलूजा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं महामहिम राष्ट्रपति को पत्र भेजकर बताया है कि भारत में स्वतंत्र पत्रकारिता पर एक नया खतरा मंडरा रहा है। पिछले एक दशक में पत्रकारों के खिलाफ कानूनी कार्यवाहियों में खतरनाक इज़ाफा हुआ है, जो पत्रकारों की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के अधिकार के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। एक शोध रिपोर्ट में 2012 से 2022 के बीच 427 पत्रकारों के खिलाफ दर्ज 423 मामलों का विश्लेषण किया गया है।
भारत में पत्रकारों के खिलाफ आपराधिक मुकदमों का चलन चिंताजनक स्तर तक बढ़ चुका है। यह एक शोध परियोजना का हिस्सा है, जिसे नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, ट्रायलवॉच और कोलंबिया लॉ स्कूल के ह्यूमन राइट्स इंस्टीट्यूट ने मिलकर तैयार किया है।

स्थानीय पत्रकारों पर सबसे ज़्यादा मार छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, कश्मीर, असम और झारखंड जैसे राज्यों में सबसे ज़्यादा मामले सामने आए हैं
गिफ्तारी, समन, और मानसिक उत्पीड़न रिपोर्ट से यह भी पता चला है कि पत्रकारों को सिर्फ क़ानूनी जाल में फंसाया नहीं जा रहा, बल्कि उन्हें मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से तोड़ा जा रहा है। बार-बार पुलिस समन
तकनीकी उपकरणों की जब्ती
लंबी जमानत प्रक्रियाएं
कोर्ट में सालों तक चलते मुकदमे
उन्होंने आगे बताया है कि
दिल्ली की स्वतंत्र पत्रकार नेहा शर्मा बताती हैं:
अधिकतर पत्रकारों ने कोविड-19 के दौरान अस्पतालों की हालत पर रिपोर्टिंग की। तीन महीने बाद पत्रकार के खिलाफ आपराधिक केस दर्ज हुआ। और लैपटॉप जब्त कर लिया गया, और तीन बार उन्हें थाने बुलाया गया।”
न्यायिक देरी और करियर की तबाही अनेक मामलों में चार्जशीट तक दाखिल नहीं होती, लेकिन मामला सालों तक अदालतों में लटका रहता है। इस बीच पत्रकारों का करियर रुक जाता है, मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ता है, और आर्थिक दबाव उन्हें पेशा छोड़ने पर मजबूर करता है।
इससे लोकतंत्र की बुनियाद पर वार हो रहा है
सलूजा ने बताया है कि विशेषज्ञ मानते हैं कि यह प्रवृत्ति केवल पत्रकारों पर हमला नहीं, बल्कि लोकतंत्र की संरचना पर सीधा प्रहार है।
प्रो. अर्पिता सेन, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी से जुड़ी इस शोध परियोजना की प्रमुख, कहती हैं:
“पत्रकार लोकतंत्र की आंख और कान हैं। यदि उन्हें डराकर चुप कराया जाएगा, तो देश की आम जनता अंधेरे में रह जाएगी।”
सलूजा ने मांग की है कि
कानून के अनुसार
भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में पत्रकारों को इसी अधिकार के इस्तेमाल पर दंडित किया जा रहा है।
सिफारिशें: समाधान की ओर एक कदम शासन को आगे बढ़ना चाहिए रिपोर्ट कुछ स्पष्ट सिफारिशें करती है जैसे एफआईआर दर्ज करने से पहले स्वतंत्र समीक्षा तंत्र हो।
पत्रकारों के मामलों की फास्ट-ट्रैक सुनवाई सुनिश्चित की जाए।
पुलिस को मीडिया मामलों की जांच में विशेष दिशा-निर्देश दिए जाएं।
न्यायपालिका को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
पत्रकारिता अपराध नहीं है, और सवाल पूछना देशद्रोह नहीं होना चाहिए। यदि सच बोलने वालों को ही कटघरे में खड़ा किया जाएगा, तो झूठ अपने आप विजेता बन जाएगा। “Pressing Charges” जैसी पहलें न केवल आँकड़े सामने लाती हैं, बल्कि हमें चेतावनी देती हैं कि अगर अब नहीं चेते, तो कल शायद बहुत देर हो जाएगी।