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आवेदन दर आवेदन, कब्जा बरकरार!आखिर नवागढ़ शासकीय नवीन महाविद्यालय की जमीन पर किसका ‘आशीर्वाद’ है?

तहसीलदार से एसडीएम और कलेक्टर तक पहुंची शिकायत, लेकिन कार्रवाई के नाम पर प्रशासन का ‘मौन व्रत’ जारी


जांजगीर-चांपा/नवागढ़

शासकीय नवीन महाविद्यालय नवागढ़ के प्रांगण एवं कॉलेज की जमीन पर कथित रूप से बेजा कब्जा और अतिक्रमण का मामला अब प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। सवाल यह है कि आखिर सरकारी कॉलेज की जमीन पर कथित अतिक्रमण करने वालों के हौसले इतने बुलंद कैसे हैं और उन्हें किसका संरक्षण प्राप्त है?
मामले को लेकर शिकायतकर्ताओं द्वारा तहसीलदार, एसडीएम से लेकर जिला कलेक्टर तक आवेदन और ज्ञापन दिए जाने की बात सामने आई है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि आवेदन अधिकारियों की टेबलों तक तो पहुंचते रहे, मगर जमीन तक कार्रवाई शायद अभी रास्ता ही तलाश रही है!
आवेदन पहुंच गए, कार्रवाई शायद छुट्टी पर है!


जनता का कहना है कि जब किसी आम व्यक्ति का छोटा-मोटा मामला होता है तो प्रशासनिक नियम-कानून और नोटिस की रफ्तार तेज हो जाती है, लेकिन यहां मामला कथित तौर पर शासकीय महाविद्यालय की जमीन का है। इसके बावजूद कार्रवाई नहीं होना कई सवालों को जन्म देता है।


  स्थानीय लोग पूछ रहे हैं—


क्या कार्रवाई के लिए एक और आवेदन चाहिए?
या फिर तहसीलदार के बाद एसडीएम, एसडीएम के बाद कलेक्टर और कलेक्टर के बाद शायद किसी ऐसे अधिकारी का इंतजार है, जिसका पता अभी तक शिकायतकर्ताओं को बताया ही नहीं गया?
सरकारी जमीन है या ‘जिसकी मर्जी, उसकी संपत्ति’?
शासकीय नवीन महाविद्यालय की जमीन शिक्षा और विद्यार्थियों के भविष्य के लिए सुरक्षित रखी गई है। ऐसे में यदि जमीन पर कथित रूप से बेजा कब्जा हो रहा है और शिकायतों के बावजूद जांच एवं कार्रवाई आगे नहीं बढ़ रही है, तो यह केवल जमीन का मामला नहीं बल्कि सरकारी संपत्ति की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल है।
आखिर प्रशासन की जिम्मेदारी क्या सिर्फ आवेदन लेना और उस पर ‘प्राप्त हुआ’ की मुहर लगाना भर रह गई है?
किसके संरक्षण में बुलंद हैं अतिक्रमणकारियों के हौसले?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि कथित अतिक्रमण करने वालों को आखिर किसका संरक्षण प्राप्त है? क्या प्रशासन को मामले की जानकारी नहीं है? यदि जानकारी नहीं है तो लगातार दिए गए आवेदन किस फाइल में आराम कर रहे हैं?
और यदि जानकारी है, तो कार्रवाई क्यों नहीं?


जनता अब यह सवाल खुलकर पूछ रही है कि—


“शासकीय कॉलेज की जमीन पर कथित कब्जे के मामले में कार्रवाई आखिर कब होगी और जिम्मेदार अधिकारी जनता को जवाब कब देंगे?”
ज्ञापन का सफर लंबा, कार्रवाई का रास्ता बंद!
तहसीलदार के पास आवेदन…
फिर एसडीएम के पास आवेदन…
फिर कलेक्टर के पास आवेदन…
लेकिन कथित कब्जे के मामले में स्थिति जस की तस!


ऐसे में लोगों का कहना है कि शायद प्रशासनिक व्यवस्था में एक नया नियम बन गया है—
“आवेदन देते रहिए, इंतजार करते रहिए और कार्रवाई की उम्मीद करते रहिए!”
निष्पक्ष जांच की मांग
मामले में प्रशासन को निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। यदि शासकीय जमीन पर अतिक्रमण पाया जाता है तो नियमानुसार तत्काल कार्रवाई की जानी चाहिए, वहीं यदि आरोप तथ्यहीन हैं तो प्रशासन को भी स्थिति सार्वजनिक कर भ्रम दूर करना चाहिए।


लेकिन फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—


कागजों में शिकायत और जमीन पर कथित कब्जा… आखिर कार्रवाई की फाइल कहां अटकी है?
अब नवागढ़ की जनता जवाब चाहती है—आवेदन तो बहुत हो गए, कार्रवाई कब होगी?

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