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मानव एकता: क्या दुनिया इसे केवल दिवस तक सीमित रखेगी? :- इंजि. वैदेही गुप्ता

अंतर्राष्ट्रीय  मानव एकता दिवस पर विशेष आलेख


चाम्पा ,अंतर्राष्ट्रीय मानव एकता दिवस के अवसर पर युवा समाजसेवी इंजि. वैदेही गुप्ता एक महत्वपूर्ण प्रश्न। उठाते हुए ने कहा कि 20 दिसंबर को अंतर्राष्ट्रीय मानव एकता दिवस मनाया जाता है, लेकिन यह प्रश्न अनदेखा नहीं किया जा सकता कि क्या मानव एकता वास्तव में वैश्विक आचरण का हिस्सा है या केवल औपचारिक भाषणों और घोषणाओं तक सीमित एक अवधारणा बनकर रह गई है। आज की दुनिया का यथार्थ बताता है कि एकता की बातें जितनी ज़ोरदार हैं, व्यवहार उतना ही विभाजित।

युद्ध, शरणार्थी संकट और आर्थिक असमानता इस बात के साक्ष्य हैं कि वैश्विक समुदाय अभी भी “हम” और “वे” की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाया है। विकसित और विकासशील देशों के बीच संसाधनों की खाई लगातार चौड़ी हो रही है। जलवायु परिवर्तन जैसे साझा संकट पर भी जिम्मेदारी बाँटने के बजाय आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है।

कोविड-19 महामारी के समय मानव एकता की जो तस्वीर उभरनी चाहिए थी, वह अधूरी रही। जहाँ एक ओर सहयोग और वैज्ञानिक साझेदारी की मिसालें बनीं, वहीं दूसरी ओर वैक्सीन राष्ट्रवाद ने मानव जीवन को बाजार की शर्तों में तौल दिया। यह सवाल आज भी प्रासंगिक है कि संकट के समय मानवता प्राथमिक थी या राष्ट्रीय स्वार्थ।

भारत सहित अनेक देशों की सभ्यतागत सोच ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की बात करती है, किंतु वैश्विक मंचों पर निर्णय अक्सर शक्ति-संतुलन और रणनीतिक हितों से संचालित होते हैं। यदि पूरी दुनिया एक परिवार है, तो फिर शरणार्थियों के लिए दरवाज़े बंद क्यों होते हैं? युद्ध पीड़ितों की पीड़ा भौगोलिक सीमाओं में क्यों बाँट दी जाती है?

मानव एकता का अर्थ केवल सहायता भेजना नहीं, बल्कि संरचनात्मक असमानताओं को चुनौती देना है। जब तक गरीबी, भेदभाव और हिंसा को जन्म देने वाली नीतियाँ कायम रहेंगी, तब तक एकता का आह्वान खोखला ही रहेगा।

अंतर्राष्ट्रीय मानव एकता दिवस हमें असहज सवालों से बचने का अवसर नहीं देता, बल्कि उनसे टकराने की माँग करता है। यदि यह दिवस आत्मसंतोष का माध्यम बन गया, तो इसका कोई अर्थ नहीं बचेगा। दुनिया को यह तय करना होगा कि मानव एकता एक वार्षिक औपचारिकता है या साझा भविष्य की अनिवार्य शर्त।

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