जिला

कलेक्टर के आदेश धरे रह गए 266 की यूरिया 500 मे बीक रहा तय दर से दोगुनी कीमत में बिक रहा उर्वरक

 गोविंद राम जिला ब्यूरो चीफ 


बलौदाबाजार:-

प्रदेश में खरीफ सीजन अपने चरम पर है और किसानों को अपनी फसल बचाने के लिए उर्वरक की सबसे अधिक आवश्यकता है। मगर इस जरूरत के वक्त, जब सरकार और प्रशासन को किसानों का सहारा बनना चाहिए, तब उनकी मजबूरी को ही मुनाफे का जरिया बना दिया गया है। कलेक्टर दीपक सोनी द्वारा जिले के सहकारी समितियों और कृषि सेवा केंद्रों में तय दर पर उर्वरक विक्रय, कालाबाजारी पर रोक और कड़ी निगरानी के निर्देश तो दिए गए, पर जमीनी सच्चाई इन आदेशों को कागजों तक सीमित साबित कर रही है।

बलौदाबाजार विकासखंड के ग्राम लाहोद में जो खुलासा हुआ है, वह न केवल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है बल्कि यह दर्शाता है कि किस तरह संगठित रूप से किसानों की जेब काटी जा रही है। एक स्थानीय पत्रकार, किसान का रूप धरकर महादेव एजेंसी एवं खाद दुकान में यूरिया खरीदने पहुँचा। तय दर 266.50 रुपये की यूरिया 500 रुपये में थमा दी गई। चालाकी इतनी कि बिल के नाम पर अल्ट्राटेक लोगो वाली सादी पर्ची दी गई, जबकि रजिस्टर में सरकारी दर दर्ज कराई गई और किसान बने पत्रकार से हस्ताक्षर करवा लिए गए।

यह कोई मामूली घटना नहीं है। यह एक सुनियोजित ठगी है जिसमें न केवल किसानों को दो से तीन गुना कीमत में उर्वरक बेचा जा रहा है, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड में पूरी तरह से झूठ दर्ज कर प्रशासन को भी गुमराह किया जा रहा है। पत्रकार द्वारा ऑनलाइन भुगतान और पूरे लेन-देन की वीडियोग्राफी इस खुलेआम लूट का ठोस सबूत है।

यूरिया ही नहीं, डीएपी जैसी खाद भी 2,100 से 2,300 रुपये में बेची जा रही है, जबकि सरकारी मूल्य मात्र 1,350 रुपये है। एमओपी, एनपीके और एसएसपी जैसी अन्य खादों में भी यही खेल जारी है। किसानों का दर्द यह है कि सरकारी समितियों में स्टॉक खत्म होने के कारण उन्हें मजबूरी में निजी विक्रेताओं के पास जाना पड़ता है और यहीं से उनकी आर्थिक लूट शुरू हो जाती है।

कलेक्टर के आदेशानुसार खरीफ 2025 के लिए तय मूल्य इस प्रकार हैं 
यूरिया: 266.50 रुपये प्रति बोरा,
डीएपी: 1,350 रुपये प्रति बोरा,
एमओपी: 1,535 रुपये प्रति बोरा,
एनपीके (12:32:16): 1,720 रुपये प्रति बोरा,एनपीके (20:20:0:16): 1,300 रुपये प्रति बोरा,एसएसपी (पाउडर): 474 रुपये प्रति बोरा
लेकिन यह मूल्य सिर्फ़ आदेश पत्रों और बोर्ड पर लिखी घोषणाओं तक सीमित हैं। वास्तविकता यह है कि किसानों को मुनाफाखोर विक्रेताओं के हाथों लूटने के लिए खुला छोड़ दिया गया है।

यह स्थिति किसी एक दुकान तक सीमित नहीं है। किसानों के अनुसार, जिले के कई गांवों में यही खेल जारी है। यह एक संगठित तंत्र है, जिसमें सफेदपोश दुकानदार, सरकारी निगरानी तंत्र की ढिलाई और प्रशासन की अनदेखी—तीनों मिलकर किसानों के हक पर डाका डाल रहे हैं।

प्रशासनिक दावे और धरातल की सच्चाई में इतना बड़ा फर्क यह सवाल खड़ा करता है कि क्या कारण बताओ नोटिस और कागजी कार्रवाई ही किसानों की पीड़ा का इलाज है? जब तक ऐसे माफिया तत्वों पर त्वरित और कठोर कार्रवाई नहीं होगी, जब तक दोषियों के लाइसेंस रद्द नहीं होंगे, तब तक किसान इसी तरह लुटते रहेंगे और सरकार के ‘किसान हितैषी’ दावे खोखले साबित होते रहेंगे।

यह सिर्फ खाद की कालाबाजारी नहीं है—यह किसानों के भविष्य, उनकी मेहनत और पूरे कृषि तंत्र पर सीधा हमला है। अगर आज इस संगठित लूट पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो कल यह एक ऐसी गहरी जड़ जमाएगी जिसे उखाड़ना नामुमकिन हो जाएगा।


आप लोगों के माध्यम से जानकारी आई है शिकायत की जांच करने के बाद संबंधित दुकान संचालक के ऊपर कलेक्टर के निर्देशन अनुसार कार्यवाही की जाएगी 
लोकनाथ दीवान निरीक्षक उर्वरक एवं कीटनाशक कृषि विभाग बलौदा बाजार

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