जिला

अन्तर्राष्ट्रीय महिला पुरुस्कार से सम्मानित डॉ. क्रांति खूंटे संस्कृत दिवस पर देश वासियों को शुभकामनाएं दी

 कसडोल,

अगस्त माह से संस्कृत दिवस प्रारम्भ होता है,इस अवसर अन्तर्राष्ट्रीय महिला पुरुस्कार से सम्मानित डा.क्रांति खूंटे ने देशवासियों को अपनी शुभकामनाएं देते हुए हमारे प्रतिनिधि को एक विशेष भेट में बताया है कि विश्व-संस्कृत-दिवस ( संस्कृत : विश्वसंस्कृतदिवस , रोमनकृत :  विश्वसंस्कृतादिवस ) के नाम से भी जाना जाता है , प्राचीन समय में भारतीय भाषा संस्कृत पर केंद्रित एक वार्षिक कार्यक्रम है जिसमें भाषा पर व्याख्यान शामिल होते हैं और इसका उद्देश्य इसके पुनरुद्धार और रखरखाव को बढ़ावा देना है। यह श्रावण पूर्णिमा को मनाया जाता है, जो हिंदू कैलेंडर के अनुसार श्रावण माह की पूर्णिमा है । यह आमतौर पर ग्रेगोरियन कैलेंडर के अगस्त महीने से मेल खाता है। संस्कृत संगठन संस्कृत भारती इस दिन के प्रचार में शामिल है। 

श्रावण पूर्णिमा अर्थात रक्षाबंधन ऋषियों के स्मरण व पूजन तथा उनके समर्पण की आराधना का पर्व माना जाता है। वैदिक साहित्य में इसे श्रावणी कहा गया। इस दिन गुरुकुलों में वेदों के अध्ययन से पूर्व यज्ञोपवीत - पवित्र धागा - धारण किया जाता है। इस संस्कार को उपनयन या उपाकर्म संस्कार कहते हैं। इसी दिन पुराना यज्ञोपवीत भी बदला जाता है। पुरोहित यजमानों को रक्षा-सूत्र भी बाँधते हैं। ऋषियों को संस्कृत साहित्य का मूल स्रोत माना जाता है, इसलिए श्रावणी पूर्णिमा को ऋषि पर्व और विश्व संस्कृत दिवस के रूप में मनाया जाता है। डॉ .क्रांति खूंटे ने आगे बताया है कि इस दिन को इसलिए चुना गया है क्योंकि प्राचीन भारत में शैक्षणिक वर्ष इसी दिन से प्रारंभ होता था। इसी दिन गुरुकुलों में विद्यार्थी वेदों का अध्ययन प्रारंभ करते थे । पौष मास की पूर्णिमा से श्रावण मास की पूर्णिमा तक अन्य वेदान्तिक शास्त्रों को सीखने के लिए अध्ययन रोक दिया जाता है। आधुनिक वैदिक विद्यालयों में यह परंपरा आज भी अक्षुण्ण है। वैसे तो विश्व वैदिक दिवस 11 जुलाई को है। 

1969 में भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने केंद्र और राज्य स्तर पर संस्कृत दिवस मनाने के निर्देश जारी किए जा चुके हैं तब से, पूरे भारत में संस्कृत दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर संस्कृत कवि सम्मेलन , लेखक संगोष्ठी, छात्रों के भाषण और पद्य पाठ प्रतियोगिता आदि का आयोजन किया जाता है, जिसके माध्यम से संस्कृत के छात्रों, कवियों और लेखकों को उचित मंच मिलता है।हम सभी देशवासियों को मिलकर  शपथ लेना चाहिए कि भारत की प्राचीन भाषा संस्कृत को हमे गर्व के साथ अपनाना चाहिए जिससे हमारे आने वाले समय के बच्चों को हमारी पुरानी संस्कृति याद रहे ।

Leave Your Comment

Click to reload image