जिला

" सत के पनही "

सुख-दुख के रिमझिम बरसा,
निस दिन बरसत जाय।
ये जिनगी के बिच्छल रस्दा।
कनहारी माटी ताय।।
अंगठा ल गड़िया के रेगबे,
खोभत-खोभत जाबे। 
जिनगी के मोटरा बड़ भारी,
डगमग पार लगाबे।।
करिया चिक्कन तेल बरोबर,
जतके रेंग चिकनाथे।
बरखा के पानी संग मिलके,
माटी बड़ डरवाथे।।
कभु मेंड़ अऊ कभु खेत म ,
चभरंग ले गोड़ बोजाही।
अइसन हे जिनगानी रे संगी,
कांटा घलो गड़वाही।।
करम-धरम के फेंटा बांध के,
मन म धरके धीर।
सत के पनही पांव म पहिरके,
जिनगी के बोझा तीर।।
दुख ल देख डराबे झन अऊ ,
सुख म झन इतराबे।
अजब-गजब ये खेल जीवन के,
हांसत पार लगाबे।।
     डॉ.श्यामा कुर्रे।, सुपेला भिलाई (छ ग)

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