विश्व स्वास्थ्य दिवस और भारत की बीमार व्यवस्था डॉ नरेश गौतम सहायक प्राध्यापक समाज कार्य विभाग एस आर यू रायपुर
विश्व स्वास्थ्य दिवस 2026 की थीम है “स्वास्थ्य के लिए एकजुटता और विज्ञान के साथ खड़े होना।” यह केवल एक नारा नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया को यह याद दिलाने की कोशिश है कि स्वास्थ्य को अंधविश्वास, अफवाह, राजनीति और मुनाफे से बचाकर विज्ञान, सहयोग और मानवीय जिम्मेदारी के आधार पर देखा जाना चाहिए। लेकिन भारत की वास्तविकता इन आदर्श शब्दों से बहुत दूर दिखाई देती है। यहाँ आज भी बड़ी संख्या में लोग इलाज के लिए वैज्ञानिक पद्धति से अधिक बाबाओं, झाड़-फूंक, जादू-टोना, घरेलू चमत्कारों और फर्जी डॉक्टरों पर भरोसा करने को मजबूर हैं। यह केवल अशिक्षा का परिणाम नहीं है, बल्कि बेहद बीमार स्वास्थ्य व्यवस्था का परिणाम है।
जब अस्पताल महंगे हो जाएँ, डॉक्टर न मिलें, दवाएँ गायब हों और गरीब इलाज के बिना मरने लगे, तब समाज अंधविश्वास की तरफ धकेला जाता है। भारत में बीमारी को अब भी केवल व्यक्ति की निजी समस्या माना जाता है, जबकि इसका संबंध गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण, प्रदूषण, जहरीला भोजन, खराब पानी, तनाव, असुरक्षित काम और असमानता से भी होता है। लेकिन व्यवस्था इन कारणों को नजरअंदाज कर बीमारी को केवल मेडिकल रिपोर्ट तक सीमित कर देती है। ‘स्टेट ऑफ हेल्थकेयर इन रूरल इंडिया, 2024’ के अनुसार डॉक्टर-रोगी अनुपात लगभग 1:1456 है, जो खराब स्थिति दर्शाता है।
कोविड-19 ने स्वास्थ्य व्यवस्था की असली तस्वीर सामने ला दी। उस समय वैज्ञानिक जानकारी कम थी, लेकिन अफवाहें ज्यादा थीं-काढ़ा, गोमूत्र, गोबर और बाबाओं के चमत्कार जैसी बातें फैलाई गईं, जबकि आम आदमी अस्पताल, ऑक्सीजन और दवा के लिए भटकता रहा। बेड, ऑक्सीजन और दवाओं की कमी ने यह साबित कर दिया कि जब व्यवस्था टूटती है तो बीमारी भेद नहीं करती, लेकिन इलाज करता है।
भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था दो हिस्सों में बँट चुकी है-गरीबों के लिए सरकारी अस्पताल और अमीरों के लिए निजी अस्पताल। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी, दवाओं की कमी, मशीनों की खराब स्थिति, लंबी लाइनें, गंदगी और भ्रष्टाचार आम हैं। ग्रामीण इलाकों में स्थिति और खराब है, जहाँ लोगों को इलाज के लिए दूर जाना पड़ता है और विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद खाली पड़े हैं। सरकार स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने का दावा करती है, लेकिन खर्च जीडीपी के केवल 2-2.5 प्रतिशत के आसपास है, जबकि विकसित देशों में यह 6-10 प्रतिशत तक होता है।
इसका असर गरीब और निम्न मध्यम वर्ग पर पड़ता है। बीमारी उन्हें आर्थिक रूप से भी तोड़ देती है। इलाज के लिए लोग जमीन बेचते हैं, गहने गिरवी रखते हैं और कर्ज में डूब जाते हैं। लाखों लोग हर साल इलाज के खर्च के कारण गरीबी में चले जाते हैं। निजी अस्पतालों में इलाज सेवा नहीं, बल्कि उद्योग बन चुका है, जहाँ हर चीज का महंगा बिल बनाया जाता है और मरीज की आर्थिक स्थिति देखी जाती है।
2017 में गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी से बच्चों की मौत ने दिखाया कि व्यवस्था कितनी कमजोर है। भुगतान न होने के कारण ऑक्सीजन सप्लाई रुकी, और चेतावनी के बावजूद ध्यान नहीं दिया गया। यह पूरे सिस्टम की विफलता का उदाहरण है। आज भी सरकारी अस्पतालों में मरीजों को बाहर से दवाएँ खरीदनी पड़ती हैं और जांच निजी लैब में करानी पड़ती है।
दवा उद्योग में भी समस्याएँ हैं-नकली दवाएँ, एक्सपायरी दवाओं की पैकिंग, कमीशन पर दवा लिखना और बिना लाइसेंस मेडिकल स्टोर। कई डॉक्टर महंगी दवाएँ लिखते हैं, जिससे गरीब मरीज परेशान होता है। कफ सिरप से बच्चों की मौत जैसी घटनाएँ दवा व्यवस्था पर सवाल खड़े करती हैं।
संविधान जीवन का अधिकार देता है और अदालतें स्वास्थ्य को उसका हिस्सा मानती हैं, फिर भी गरीब इलाज के बिना मर जाता है। सवाल यही है कि अगर स्वास्थ्य अधिकार है तो यह केवल अमीरों तक क्यों सीमित है? डॉक्टर, दवाएँ और सुविधाएँ क्यों नहीं हैं?
विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विज्ञान की बात जरूरी है, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है स्वास्थ्य को बाजार से बचाना। जब तक स्वास्थ्य को मुनाफे की चीज माना जाएगा, तब तक गरीब इलाज के बिना मरता रहेगा और अमीर इलाज खरीदता रहेगा।