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कष्टों में भी हमारा हित छिपा होता है :- योगेश कबूलपुरिया की कलम सें

आम तौर पर दुख को नापसंद किया जाता है। लोग समझते हैं कि पाप के फलस्वरूप अथवा ईश्वरीय कोप के कारण दुख आते हैं, परंतु यह बात पूर्ण रूप से सत्य नहीं है। दुखों का कारण पाप भी है, यह तो ठीक है, परंतु यह ठीक नहीं है कि समस्त दुख पापों के कारण ही आते हैं। बहुत बार ऐसा होता है कि ईश्वर की कृपा के कारण, पूर्व संचित पुण्यों के कारण और पुण्य संचय की तपश्चर्या के कारण भी दुख आते हैं। भगवान को किसी प्राणी पर दया करके उसे अपनी शरण में लेना होता है, कल्याण के पथ की ओर ले जाना होता है, तो उसे भवबंधन से, कुप्रवृत्तियों से छुड़ाने के लिए ऐसे दुखदायक अवसर अत्पन्न करते हैं, जिनकी ठोकर खाकर मनुष्य अपनी भूल को समझ जाए, निद्रा को छोड़कर सावधान हो जाए।

सांसारिक मोह, ममता और विषय वासना का चस्का ऐसा लुभावना होता है कि उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता। एक विचार आता है कि जीवन जैसी अमूल्य वस्तु का उपयोग किसी श्रेष्ठ काम में करना चाहिए, परंतु दूसरे ही क्षण ऐसी लुभावनी परिस्थितियां सामने आ जाती हैं, जिनके कारण वह विचार उड़ जाता है और मनुष्य जहां का तहां उसी तुच्छ परिस्थिति में पड़ा रहता है। इस प्रकार की गंदगी में से निकालने के लिए भगवान अपने भक्त को झटका देते हैं, सोते हुए को जगाने के लिए बड़ी जोर से झकझोरते हैं। दिल को चोट पहुंचाने वाली घटनाएं इसलिए भी आती हैं कि उनके जबर्दस्त झटके के आघात से मनुष्य तिलमिला जाए और सजग होकर अपनी भूल सुधार ले और सही मार्ग पर आ जाए। धर्म-कर्म करने में, कर्तव्य धर्म का पालन करने में असाधारण कष्ट सहना पड़ता है। निस्संदेह कुछ दुख पापों के परिणामस्वरूप भी होते हैं। इसी प्रकार जब अपने ऊपर कोई विपत्ति आए, तो केवल यह ही नहीं सोचना चाहिए कि हमें पापी हैं, अभागे हैं। संभव है, वह कष्ट हमारे किसी हित के लिए आया हो, उस कष्ट की तह में शायद कोई ऐसा लाभछिपा हो, जिसे हमारा अल्पज्ञ मस्तिष्क आज ठीक-ठीक पहचान न सके।

हर कठिनाई में पड़े हुए व्यक्ति को पूर्व जन्म का पापी कहना उचित नहीं। इस भ्रम के आधार पर कोई व्यक्ति अपने को बुरा समझे, अपने को निंदित समझे, इसकी जरूरत नहीं है। कर्म की गति गहन है। उसे हम ठीक प्रकार से नहीं जानते, केवल परमात्मा ही जानता है। मनुष्य का कर्तव्य है कि सुख-दुख का ध्यान किए बिना सदैव अपने उत्तरदायित्व का पालन करे और सद्मार्ग पर चलता रहे। कार्य में सफलता मिलती है या असफलता, प्रशंसा होती है या तिरस्कार प्राप्त होता है, लाभ में रहते हैं या घाटे में, इन बातों के कारण अपने कर्तव्य का त्याग करना किसी प्रकार उचित नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि जगत ईश्वरीय न्याय सर्वत्र काम कर रहा है। हम अपनी छोटी बुद्धि से उसे समझें चाहे न समझें, वह जल्दी प्रकट हो या देर से आए, पर हमारे कर्मों का सच्चा फल हमको अवश्य प्राप्त होगा। इसलिए हमको किसी भी अवस्था में ईश्वरीय नियमों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।

सूत्र :- अपना मूल्य समझें 

मनुष्य एक अनगढ़ पत्थर है, जिसे शिक्षा रूपी छेनी और हथौड़ी से सुंदर आकृति प्रदान की जा सकती हैं। जीवन में गलती सबसे होती है। गलती करना बुरा नहीं है, बल्कि गलती को न सुधारना बुरा है। हर व्यक्ति को अपना मूल्य समझना चाहिए और खुद पर यह विश्वास करना चाहिए कि वह संसार का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति है।

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