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15 जून फादर्स डे के अवसर पर डा.श्यामा कुर्रे की कलम सें आपने पिता व पिता के पिता कों समर्पित विशेष सम्पदाकीय

शीर्षक : 'मैं आपके साथ चलना चाहती हूं'( मेरी सुनहरी यादें,)

पूज्य पिताजी, आप सोच रहे होंगे कि आज के जमाने में मुझे पत्र लिखने की क्या जरूरत पड़ गई? वह इसलिए कि आज फादर्स डे है। आप कहेंगे, 'अरे ये फादर्स डे, मदर्स डे क्या होता है? तुम तो हर दिन ही फादर्स डे, मदर्स डे के रूप में मनाते हो।' पर मुझे लगता है आज के दिन भी आप मुस्कराकर हमसे हीं पूछेंगे कि 'आज के दिन तुम लोगों को क्या चाहिए !' मम्मा भी कहेंगी कि आप बच्चों के लिए कोई गिफ्ट खरीद दें और गुपचुप-चाट की पार्टी दें दें।

पर मुझे लगता है कि ऐसे दिवस सिर्फ उस पुत्री या पुत्र को ढूंढने आते हैं, जो अपनी दिनचर्या में गुम हो चुके हैं। हैप्पी फादर्स डे कहकर, व्हाट्सएप्प के स्टेटस पर फोटो लगा कर या ज्यादा सें ज्यादा कोई गिफ्ट देकर वे वापस अपने फोन की दुनिया में खों जाना चाहते हैं, रील के संग चिपकना चाहते हैं या मीटिंगों में व्यस्त रहना चाहते हैं, पर कुछ पल ठहर कर कुछ कहना या सुनना नहीं चाहते। ज्यादा हुआ तो किसी mnc के मैनेजर की तरह घर वालों को कुछ निर्देश देते हैं और शाम कों घर वापस लौटकर रिव्यू करते हैं कि 'फादर्स डे' के दिन किसने-किसको क्या गिफ्ट दिया और अपने आप कों केयरिंग दिखाते हुए सवाल पूछते हैं की बाहर से कुछ और मंगाया गया या नहीं।

लेकिन मेरे लिए तो फादर्स डे आपके पास बैठना हैं पिताजी, सुबह आपके साथ वॉक पर जाना, आपके क़दमों की आहट सुनते हीं पुंछ हिलाते पास आये दर्जनों कुत्तों कों बिस्किट खिलाना, पूजा के लिए फूल चुनना और घर लौट कर ध्यान लगाना और फिर विभिन्न विषयों पर आपसे बातचीत करना होता है। और मुझे जब कभी आप 'श्री कृष्ण' भाव में डांटते हैं, समझाते हैं, तो मैं भी अर्जुन भाव में सुनने की कोशिश करती हूं। लेकिन यह भी सच है कि वृद्ध व्यक्ति या पीले पड़ते पत्तों के लिए कोई समाज तैयार नहीं मालूम पड़ता और इनके प्रति वों गहरी संवेदनशीलता नहीं महसूस होती, जो किसी भी सामाजिक 'प्राण' की संभावना होती है। यहां तक कि सबसे निकटतम संबंध भी उस माता-पिता के पास नहीं रुकना चाहता और सबके पास बहाना सिर्फ एक, समय की कमी का हीं होता है।

एक सूखापन, निष्ठुरता और 'मैं और मेरा' में उलझा हुआ यह समाज बाल सुलभ भाव के साथ कुछ पल के लिए ही सही, अपने पिता या मां के पास बैठने का समय नहीं निकाल पाता। क्योंकि अधिकांश जगह भावनाओं को डिजिटल दुनिया और बाजार ने कैद कर रखा है। अगर कभी उस भाव से रूबरू होना होता है, तो परिवार को घर के दरख्त से निकल कर मॉल की बेजान दीवारों के पास आना पड़ता है, जहां पूरा परिवार अपनों से थोड़ी देर के लिए ही सही, पर मिल जरूर पाता है। बाजार हमारे अंदर धैर्य और ठहराव सृजित करता है, क्योंकि भले ही घरों में अंधेरा रहे, बाजार रात भर जगमग रह कर रोशनी बिखेरता रहता है।

ऐसे में एक पुत्री या पुत्र के लिए अपने पिता या मां को सुनना, समझना और मन तक पहुंचने का मन बनाना थोड़ा बेमन-सा कार्य हो जाता है। आप भी यह मानेंगे कि शायद पिता की तरफ से पुत्र या पुत्री को कुछ कहने की मानसिक ताकत और वह भावनात्मक विश्वास पचास-साठ की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते कुछ कमजोर-सी पड़ने लग जाती है, क्योंकि पुत्र भी तब तक पिता बन चुका होता है और आत्मनिर्भर भी। लेकिन पिताजी, आपको जो भी लगे, बेबाक बोलते रहिए, क्योंकि मैं आपकी हर बात सुनूँगी। क्योंकि मैं भी तो कुछ बडी हुई हूं, और वैसे ही, जैसे आप और मां चाहती हैं। उस सबल पेड़ की तरह, जिसकी जड़ें गहरी होती हैं और इन जड़ों से ही मैं अपने माता-पिता से जुड़ी हूं।

ऐसे दिवस हमें खुद के करीब लाते हैं और रिश्तों के मूल्यांकन का भी मौका देते हैं। नेटवर्किंग की चकमक में माता-पिता को ढूंढना आसान नहीं होता। इसलिए सोच रही हूं कि फादर्स डे के दिन एक पुत्री या पुत्र को अपने पिता की सुबह बननी चाहिए, जिससे कि उनका हर दिन 'फादर्स डे' बन सके। मतलब यह कि चाहे माता-पिता के साथ रहते हो, या दूर, लेकिन हमारे बेडरूम से माता-पिता के कमरे का सफर दुरूह और नीरस नहीं होना चाहिए। बल्कि कुछ ऐसा होना चाहिए, जैसे सिद्धार्थ से गौतम बनने का सफर। 

दुनिया कहती है कि बुजुर्गों को नींद कम ही आती है, या वें जल्दी सो जाते हैं, तो जल्दी उठ भी जाते हैं। मैं भी हमेशा जल्दी ही उठना चाहती हूं, पिताजी । सुबह की चाय साथ पीने या कभी साथ बनाने का मौका नहीं खोना चाहततीऔर सुबह का पहला घंटा आप दोनों (माँ-पापा) के संग बिताना चाहती हूं। मैं अन्य लोंगों से भी यहीं कहना चाहतती हूं कि अगर पैरेंट्स हों, भले हीं वें दूर हों या बहुत दूर हों, तब भी आप सुबह जल्दी ही उठ जाइए। सुबह के पहले घंटे को ऐसे दिन की तरह बिताइए, जिसमें माता-पिता अपने बेटे या बेटी से मिल सकें। फोन पर, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष (वीडियो कालिंग) आमने-सामने या यादों में। पर सुबह की पहली मुलाकात तो माता-पिता से ही बनती है। और मेरा यकीन मानिये  ये मुलाक़ात आपका पूरा दिन भी बना देती हैं।

अगर मैं जल्दी नहीं उठ पाती तो आपके साथ प्रतिदिन चलने या वॉक करने का मौका ही खो देती हूं, साथ चलना अच्छा होता है न पिताजी ! आजकल सभी फोन के साथ चलते हैं, पर मैं सुबह इसलिए उठना चाहती हूं, पिताजी कि आपके साथ चलूं और जीवन की सबसे बेहतरीन सलाह (आपके अनुभव) सुनती रहूं। मैं बस आपकी सुबह में शामिल रहना चाहती हूं। अगर मां घर की सुबह हैं, जो हमें जीवन का एहसास कराती है, तो आप उस सुबह का तेज हैं, जो हमें ऊर्जावान बनाता है।

जब हम अपने माता-पिता में दुनिया का सबसे अच्छा व बेहतरीन इन्सान पाते हैं, तो फिर घर में ही गुडनेस का दार्शनिक और व्यावहारिक दर्शन भी कर लेते हैं। मैं भी अपने समाज के लिए एक अच्छा इन्सान बनना चाहती हूं। अगर समाज मुझमें वह अच्छा इन्सान नहीं ढूंढ पाया, तो यह मेरी विफलता होगी। एक वक़्त था जब हमारी तीन पीढ़ियां एक साथ समाज सेवा करती थीं और दादाजी ने तों समाज के लिए इतना किया की वें सबको पछाड़ कर अवल्ल हों गए, उनका कहा एक-एक शब्द पत्थर की लकीर बनने लगा और देखते ही देखते  आसपास के अंचल में पिता जी के नाम का सिक्का चलने लगा, किन्तु कुदरत के नियमों के मुताबिक दादाजी कों अपनी यात्रा पूरी करके बैकुंठ लौटना पड़ा। पिताजी, मैं भी दादाजी और आपकी तरह फर्स्ट आना चाहती हूं, एक अच्छा इन्सान बनकर।

आज के खास दिन पर  एक मशहूर ग़ज़ल की चार पंक्तिया आप सब के बिच मेरे पिता जी कों याद करते हुए रखना चाहती हुँ कि

 घर की बुनियादें दीवारें बाम-ओ-दर थे बाबू जी,
सब को बाँध के रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी।

तीन मोहल्लों में उन जैसी क़द काठी का कोई न था,
अच्छे-ख़ासे ऊँचे पूरे क़द-आवर थे बाबू जी।

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