सरकार की इस दोहरी नीति को लेकर जनमानस में असमंजस
जांजगीर-चांपा,
छत्तीसगढ़ की सरकार एक ओर पूरे प्रदेश में शराब दुकानों की संख्या में लगातार इजाफा कर रही है, वहीं दूसरी ओर राज्य की पुलिस हाट-बाजारों, स्कूलों और गांव-गांव जाकर नशा मुक्ति अभियान चला रही है। यह विरोधाभासी तस्वीर अब जनता के बीच गंभीर सवालों को जन्म दे रही है।
शराब विक्री से राज्य सरकार को हर साल हजारों करोड़ की आमदनी होती है। हाल ही में कई नए क्षेत्रों में शराब दुकानें खोली गई हैं, जिससे राजस्व में बढ़ोत्तरी की बात की जा रही है। सरकार का तर्क है कि नियंत्रण में रहकर शराब की बिक्री करना बेहतर है, बजाय इसके कि अवैध शराब का कारोबार फले-फूले।
वहीं दूसरी तरफ, पुलिस और समाज कल्याण विभाग द्वारा हाट-बाजारों और शैक्षणिक संस्थानों में नशा मुक्ति को लेकर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। लोगों को नशे के दुष्परिणाम समझाए जा रहे हैं, गीत-संगीत और नुक्कड़ नाटकों के जरिए शराब से दूर रहने की अपील की जा रही है।
इस स्थिति पर सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्रामीण जनता ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि एक तरफ सरकार खराब शराब बेच रही है. दुसरी तरफ उसी शराब के वजह से कई बिमारियां भी हो रही है,
जनता की रायः सरकार को तय करना चाहिए कि वह क्या चाहती है राजस्व या समाज का भला। बच्चों के सामने शराब दुकानें खुल रही हैं और वहीं पुलिस उन्हें नशा से दूर रहने की सीख दे रही है। ये दोहरा मापदंड नहीं तो और क्या है?"
सरकार की इस दोहरी नीति को लेकर जनमानस में असमंजस है। सवाल यह है कि क्या यह नीति सिर्फ आर्थिक लाभ के लिए है या वास्तव में समाजहित में भी कोई ठोस सोच है? जब तक सरकार स्पष्ट रणनीति नहीं अपनाती, तब तक यह विरोधाभास चर्चा का विषय बना रहेगा।